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(पुण्यतिथि 16 अक्टूबर पर विशेष) पटना। इतिहास की परतों को उधेड़कर उसके भीतर छुपे यथार्थ को शब्दों में उतारने की अद्भुत क्षमता थी आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र में। वे उन पत्रकारों में थे, जिन्होंने पत्रकारिता को महज समाचार संकलन और प्रकाशन का माध्यम नहीं बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाने का एक सशक्त औजार माना। विचलन और विसंगतियों के दौर में भी उन्होंने मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता की मशाल जलाए रखी। जनपक्षधरता, निर्भीकता, सादगी और सामाजिक सरोकार उनकी पत्रकारिता के मूल आधार थे। उनके लिए कलम की सार्थकता इसी में थी कि वह समाज के सवालों को उठाए और व्यवस्था को उसकी जिम्मेदारियों का अहसास कराए। सादगी से अर्जित सम्मान आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र का स्मरण करते ही एक ऐसा व्यक्तित्व आंखों के सामने उभरता है, जिसकी वाणी में मिठास, व्यवहार में शालीनता और जीवन में अद्भुत सादगी थी। जीवन के लगभग आठ दशक पार करने के बाद भी वे नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बने रहे। मुंगेर में लोग उन्हें सम्मानपूर्वक ‘बाबा’ कहकर पुकारते थे। उनके व्यक्तित्व का प्रभाव ऐसा था कि प्रशासनिक अधिकारी हों या केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री, सभी उनके प्रति आदरभाव रखते थे। यह सम्मान किसी पद या सत्ता की निकटता से नहीं बल्कि उनके नैतिक आचरण, अनुभव और पत्रकारिता के प्रति निष्ठा से अर्जित हुआ था। संघर्षों में तपता बचपन आचार्य मिश्र का जीवन संघर्षों के बीच आकार लेता रहा। मुंगेर प्रमंडल के शाम्हो दियारा क्षेत्र में जन्मे श्री मिश्र के सिर से महज दो वर्ष की उम्र में पिता का साया उठ गया। बचपन से ही अभावों का सामना करना पड़ा। दियारा क्षेत्र में घर होने के कारण कई बार विस्थापन की पीड़ा भी झेलनी पड़ी। विपन्नता से भरे इस जीवन में गंगा उनकी सहचर बनी। गंगा के प्रवाह और दियारा की जिंदगी ने उन्हें जीवन की अनिश्चितताओं, संघर्षों और आम लोगों की कठिनाइयों को निकट से समझने का अवसर दिया। यही अनुभव आगे चलकर उनकी पत्रकारिता में जनजीवन की संवेदनाओं के रूप में दिखाई दिए। एक त्रासदी से जागी कलम उनके भीतर पत्रकारिता का बीज बहुत कम उम्र में ही अंकुरित हो गया था। वर्ष 1954 में प्रयागराज के महाकुंभ में भगदड़ से हुई मौतों की घटना ने उन्हें भीतर तक विचलित कर दिया। इस हादसे में सौ से अधिक लोगों की मौत होने की बात उनके लेखन के शुरुआती संदर्भों में उल्लिखित है। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी घटना के बाद इलाहाबाद पहुंचे थे। इस त्रासदी ने बालमन पर गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने ‘भवानी’ नामक हस्तलिखित पत्रिका निकाली, जिसमें इस घटना पर संपादकीय लिखा। यह प्रसंग बताता है कि पत्रकारिता उनके लिए केवल पेशा नहीं थी। किसी दुर्घटना में लोगों की मौत उन्हें सिर्फ एक खबर नहीं लगती थी बल्कि उसके पीछे की परिस्थितियों और व्यवस्था की जवाबदेही को समझना भी जरूरी लगता था। पत्रकारिता का लंबा सफर धीरे-धीरे उनका लेखन व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ा। वे ‘नवराष्ट्र’ से पत्रकार के रूप में जुड़े। इसके बाद साठ के दशक से पहले ही दैनिक ‘आर्यावर्त’ के साथ उनका जुड़ाव हो गया। अखबार के प्रकाशन की अवधि तक उन्होंने इससे अपना संबंध बनाए रखा। बाद में बिहार से दैनिक ‘आज’ का प्रकाशन शुरू हुआ तो वे उससे जुड़ गए। इस तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका लंबा अनुभव विकसित हुआ। उन्होंने बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को नजदीक से देखा और अपने समय की घटनाओं को दर्ज किया। सच से कभी समझौता नहीं उनकी पत्रकारिता की सबसे बड़ी विशेषता थी कि सच को बिना लाग-लपेट के सामने रखना। उन्होंने मान-सम्मान के लिए कलम से समझौता नहीं किया और न ही पत्रकारिता की गरिमा को निजी स्वार्थों के हाथों गिरवी रखा। उनके लिए पत्रकारिता समाज के प्रति जवाबदेही का माध्यम थी। वे अपनी लेखनी का इस्तेमाल किसी व्यक्ति या सत्ता को प्रसन्न करने के लिए नहीं बल्कि जनहित के प्रश्नों को सामने लाने के लिए करते थे इसीलिए उनका प्रभाव मुंगेर तक सीमित नहीं रहा। राष्ट्रीय स्तर के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनके आलेख प्रकाशित हुए। ‘दिनमान’, ‘दिनमान टाइम्स’ और ‘जनसत्ता’ जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों में उनकी उपस्थिति उनकी वैचारिक व्यापकता और लेखकीय क्षमता का प्रमाण थी। समाज और संस्कृति पर पैनी नजर आचार्य मिश्र की पत्रकारिता केवल राजनीति के इर्द-गिर्द नहीं घूमती थी। साहित्य, संस्कृति, समाज, आध्यात्म और जनजीवन के विविध पहलुओं पर उनकी पैनी नजर रहती थी। वे मानते थे कि समाज को समझने के लिए केवल राजनीतिक घटनाक्रम पर्याप्त नहीं है। उसकी सांस्कृतिक स्मृतियों, सामाजिक संबंधों और जीवन-मूल्यों को भी समझना जरूरी है। उनके आलेखों में इसीलिए यथार्थ के साथ संवेदना का मेल दिखाई देता था। वे घटनाओं का विवरण देने के साथ उनके व्यापक सामाजिक अर्थों को भी तलाशते थे। मुंगेर से व्यापक जुड़ाव मुंगेर में उनकी पत्रकारिता का दौर विशेष महत्व रखता है। उस समय मुंगेर जिला आज की तुलना में काफी बड़ा था। बेगूसराय, शेखपुरा, लखीसराय, खगड़िया और जमुई जैसे क्षेत्र भी इसके अंतर्गत आते थे। यह इलाका राजनीतिक चेतना, साहित्यिक प्रतिभा और सामाजिक आंदोलनों की दृष्टि से समृद्ध था। आचार्य मिश्र ने इस पूरे क्षेत्र की गतिविधियों को नजदीक से देखा और उन्हें पत्रकारिता के माध्यम से व्यापक पहचान दिलाने का प्रयास किया। परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती, रामधारी सिंह दिनकर, समाजवादी नेता मधु लिमये, कपिलदेव सिंह और राजो सिंह जैसी शख्सियतों से उनके संपर्क रहे। इन संबंधों ने उनके अनुभव संसार को व्यापक बनाया। वे व्यक्तियों को केवल उनके पद या प्रसिद्धि से नहीं बल्कि उनके विचारों और सामाजिक योगदान के संदर्भ में देखते थे। मुफस्सिल पत्रकारों की आवाज उनकी जनपक्षधरता का एक महत्वपूर्ण पक्ष पत्रकारों के अधिकारों के प्रति चिंता थी। खासकर मुफस्सिल के संवाददाताओं की कठिनाइयों से वे व्यथित रहते थे। राजधानी और बड़े शहरों में काम करने वाले पत्रकारों की तुलना में जिला तथा छोटे कस्बों के संवाददाताओं को संसाधनों, पारिश्रमिक और पेशेगत सुरक्षा की अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता था। समाचार जुटाने से लेकर उसे प्रकाशित कराने तक उनके सामने कई चुनौतियां रहती थीं। आचार्य मिश्र ने इन समस्याओं को व्यक्तिगत शिकायत मानकर छोड़ने के बजाय सामूहिक प्रयास का विषय बनाया। संगठन से अधिकारों की लड़ाई इसी उद्देश्य से उन्होंने बिहार राज्य संवाददाता संघ के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. ओमप्रकाश साह प्रियंवद, चांद मुसाफिर, मुकुटधारी अग्रवाल और रुद्रदत्त आर्य जैसे लोग इस अभियान में उनके साथ जुड़े। संगठन के माध्यम से उन्होंने राज्य के विभिन्न हिस्सों में कार्यरत संवाददाताओं को एकजुट करने और उनकी समस्याओं को संस्थागत स्तर पर उठाने का प्रयास किया। संघ के अधिवेशनों में सूचना मंत्री बी. एन. गाडगिल, मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर, बिहार विधानसभा के अध्यक्ष शिवचंद्र झा और पटना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रभा शंकर मिश्र जैसी हस्तियों की उपस्थिति रही। इन मंचों पर पत्रकारों की समस्याओं को मजबूती से उठाना आचार्य मिश्र की संगठन क्षमता और पेशे के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। स्वतंत्र पत्रकारिता की बुनियाद उनके लिए पत्रकारों की एकता केवल पेशेगत सुविधा का सवाल नहीं थी। वे जानते थे कि आर्थिक और संस्थागत रूप से कमजोर पत्रकार के लिए स्वतंत्र रहना अधिक कठिन होता है इसलिए मुफस्सिल पत्रकारों की समस्याओं को उठाना उनकी व्यापक पत्रकारिता-दृष्टि का हिस्सा था। आज जब पत्रकारिता में स्वतंत्रता, विश्वसनीयता और पेशेगत सुरक्षा को लेकर बहस होती है तब उनके प्रयासों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। साहित्य और समाज के प्रति समर्पण पत्रकारिता के साथ-साथ आचार्य मिश्र का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी अत्यंत सक्रिय था। वे आजीवन जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन, मुंगेर; पूर्वांचल संयुक्त सदाचार समिति; पूर्वांचल भारत सेवक समाज और ललित स्मृति मंच जैसी संस्थाओं से जुड़े रहे तथा कई संस्थाओं के अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाई। पूर्वांचल के साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी उपस्थिति महत्वपूर्ण मानी जाती थी। उनके लिए साहित्य और पत्रकारिता अलग-अलग संसार नहीं थे। दोनों का उद्देश्य मनुष्य और समाज को बेहतर बनाना था। यही कारण था कि सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दे उनकी लेखनी में लगातार जगह पाते रहे। आध्यात्म और सिनेमा से संवाद आध्यात्मिक जगत से उनका संबंध भी गहरा था। परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के साथ उनके निकट संबंध रहे। उन्होंने स्वामी सत्यानंद के जीवन और दर्शन को करीब से देखा तथा उनके साथ मुंबई की यात्रा भी की। योग आंदोलन से वे आजीवन जुड़े रहे। इस दौरान उन्हें फिल्म जगत की नरगिस, निरूपा राय, साधना, सुनील दत्त और लीला चिटनीस जैसी हस्तियों से मिलने का अवसर मिला। इन मुलाकातों और अनुभवों को उन्होंने अपने स्मरणों तथा साक्षात्कारों के माध्यम से शब्दों में दर्ज किया। उनके लेखन की यह विविधता बताती है कि वे जीवन को किसी एक वैचारिक या पेशेगत दायरे में सीमित करके नहीं देखते थे। नई पीढ़ी के नाम संदेश पत्रकारिता में आते बदलावों को लेकर वे चिंतित रहते थे। उन्हें लगता था कि पेशे की गरिमा से समझौता करने की प्रवृत्ति उसके मूल उद्देश्य को कमजोर करती है। वे युवा पत्रकारों से अपने अनुभव साझा करते और उन्हें पत्रकारिता की नैतिक विरासत बचाए रखने की सीख देते थे। उनका कहना था, “मैं जीवन की सांध्य बेला में हूं। आने वाला समय तुम्हारा है। अपनी विरासत को बचाए रखो।” यह कथन केवल एक वरिष्ठ पत्रकार की भावुक अभिव्यक्ति नहीं बल्कि नई पीढ़ी के लिए जिम्मेदारी का संदेश था। यादों में जीवित विरासत उन्होंने अपने लंबे पत्रकारिता जीवन के अनुभवों को पुस्तक ‘यादों का आईना’ में संजोया। यह पुस्तक उनके समय, समाज और पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उनकी स्मृति को सम्मान देने के लिए प्रथम पुण्यतिथि पर बिहार योग विद्यालय, मुंगेर के परमाचार्य परमहंस निरंजनानंद सरस्वती ने सूचना भवन में महोगनी का पौधा लगाया था। उनकी स्मृति में कई वर्षों तक आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र राष्ट्रीय सम्मान भी देश की प्रतिष्ठित हस्तियों को प्रदान किया जाता रहा। कलम की अमिट विरासत आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र का जीवन इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता की वास्तविक प्रतिष्ठा सत्ता के निकट होने से नहीं बल्कि समाज के प्रति ईमानदार होने से अर्जित होती है। उन्होंने सीमित संसाधनों और अनेक कठिनाइयों के बीच अपनी कलम की स्वतंत्रता बनाए रखी। उनकी सादगी, निर्भीकता, संगठन क्षमता और जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता आज भी पत्रकारिता के लिए मार्गदर्शक हैं। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक वरिष्ठ पत्रकार को श्रद्धांजलि देना नहीं बल्कि उन मूल्यों को फिर से स्मरण करना है, जिनके बिना पत्रकारिता अपना सामाजिक अर्थ खो देती है। आचार्य मिश्र की विरासत यही है कि कलम सच के साथ खड़ी रहे, समाज की पीड़ा को आवाज दे और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जिम्मेदारी का बोध कराती रहे।



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