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नई दिल्ली। गांधी को याद करना आसान है, गांधी की कसौटी पर अपने समय को परखना कठिन। हर साल दो अक्टूबर को गांधी हमारे आसपास फिर से दिखाई देने लगते हैं। सरकारी भवनों में उनकी तस्वीरों पर माल्यार्पण होता है, भाषण होते हैं, अहिंसा का स्मरण किया जाता है लेकिन दो अक्टूबर बीतते ही एक सवाल अपनी जगह खड़ा रह जाता है कि गांधी आखिर थे किसके लिए? गांधी का अंतिम व्यक्ति गांधी का उत्तर सत्ता के केंद्र में नहीं, समाज के उस किनारे पर मिलता है जहां आदमी के पास अपनी बात कहने के लिए न साधन है, न प्रभाव और कई बार अपनी जमीन तक नहीं। गांधी का अंतिम व्यक्ति कोई अमूर्त शब्द नहीं था। वह भूमिहीन किसान था, खेत मजदूर था, आदिवासी था, विस्थापित परिवार था और वह व्यक्ति था जिसकी आवाज व्यवस्था तक पहुंचने से पहले ही खो जाती थी। किताबों से बाहर गांधी की खोज राजगोपाल पी.वी. का महत्व इसी जगह से समझ में आता है। उन्होंने गांधी को किताबों, प्रतिमाओं और स्मारकों में सुरक्षित रखने के बजाय उन लोगों के बीच खोजा जिनके जीवन में जमीन, जंगल, पानी और आजीविका के सवाल रोज सामने आते हैं। उनके लिए गांधी अतीत का कोई महान अध्याय नहीं, बल्कि वर्तमान के अन्याय से जूझने की एक पद्धति हैं। हाल में राजगोपाल पी.वी. को जापान के निवानो शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके लंबे अहिंसक सामाजिक कार्य के लिए दिया गया है। राजगोपाल की गांधी से मुलाकात किसी पुस्तकालय में नहीं, संघर्ष की जमीन पर हुई। युवावस्था में चंबल के बीहड़ों में गांधीवादी समाजसेवी एस.एन. सुब्बाराव के साथ काम करते हुए उन्होंने हिंसा से घिरे उस समाज को करीब से देखा, जहां बंदूक केवल अपराध का साधन नहीं रह गई थी, बल्कि भय और अविश्वास की सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी थी। हिंसा के सामने संवाद का रास्ता ऐसे माहौल में उन्होंने हिंसा का जवाब दूसरी हिंसा से देने के बजाय संवाद का रास्ता चुना। डाकुओं और उनके परिवारों के बीच काम करते हुए यह अनुभव बना कि किसी हिंसक परिस्थिति को केवल बल से समाप्त नहीं किया जा सकता; उसके पीछे मौजूद मनुष्य तक पहुंचना भी जरूरी है। 1972 में जयप्रकाश नारायण के सामने चंबल के बागियों के आत्मसमर्पण की प्रक्रिया इसी विश्वास की एक महत्वपूर्ण परिणति थी। चंबल ने राजगोपाल को यह सिखाया कि संघर्ष का अर्थ हमेशा टकराव नहीं होता और शांति का अर्थ निष्क्रियता भी नहीं है। हिंसा से बाहर निकलने का रास्ता संवाद हो सकता है। यही अनुभव आगे उनके सामाजिक काम की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण बना। सवाल बदला, संघर्ष का सूत्र नहीं चंबल में सवाल था—बंदूक उठाने वाले व्यक्ति को हिंसा के रास्ते से कैसे वापस लाया जाए? बाद के वर्षों में सवाल बदलकर यह हो गया—जिस व्यक्ति के पास जमीन ही नहीं है, वह अपने जीवन पर अधिकार कैसे पाए? दोनों सवालों के बीच राजगोपाल ने एक साझा सूत्र देखा—मनुष्य को उसके सम्मान और अधिकार के साथ देखना। यहीं से उनका ध्यान भूमिहीन किसानों, आदिवासियों और ग्रामीण गरीबों की ओर गया। एकता परिषद के माध्यम से भूमि, जंगल, पानी और आजीविका के सवालों को उन्होंने जनसंगठन और अहिंसक संघर्ष से जोड़ा। यहां गांधी का सत्याग्रह किसी औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध इस्तेमाल किए गए पुराने हथियार के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में हाशिए के नागरिक की आवाज को केंद्र तक पहुंचाने की पद्धति के रूप में सामने आया। जमीन केवल जमीन नहीं भारत के गांव में जमीन केवल जमीन नहीं है। वह रोजी-रोटी है, सामाजिक पहचान है और परिवार के भविष्य की सुरक्षा भी। जिस परिवार के पास खेती की जमीन नहीं, उसके लिए जमीन की मांग किसी संपत्ति के टुकड़े की मांग भर नहीं है। यह अपने जीवन पर कुछ नियंत्रण हासिल करने की मांग है। आदिवासी समाज के लिए जमीन और जंगल का रिश्ता और भी गहरा है। वह अर्थव्यवस्था के साथ संस्कृति और सामुदायिक जीवन से भी जुड़ा है। इसलिए राजगोपाल का भूमि आंदोलन केवल भूमि-वितरण की मांग नहीं था। उसमें सत्ता और संसाधनों के संबंध पर सवाल था। पदयात्रा बनी संवाद की राह पदयात्रा इस सवाल को जनता के बीच ले जाने का माध्यम बनी। चंबल से शुरू हुए भूमि अधिकार के आंदोलनों से लेकर आगे के जनसत्याग्रहों तक भूमिहीनों और आदिवासियों के सवालों को उन्होंने अहिंसक जनसंघर्ष का स्वर दिया। गांधी के यहां यात्रा लोगों तक पहुंचने का जरिया थी; राजगोपाल के यहां भी पदयात्रा ने आंदोलन और संवाद, दोनों को एक साथ जोड़ा। लोग चलते थे, रास्ते में गांवों से जुड़ते थे, अपनी कहानियां साझा करते थे और धीरे-धीरे स्थानीय शिकायत एक व्यापक जनसवाल में बदलती जाती थी। यही वह प्रक्रिया थी जिसने आगे जनादेश और जनसत्याग्रह जैसी व्यापक पहलों के लिए जमीन तैयार की।वर्ष 2007 का जनादेश आंदोलन इस क्रम का बड़ा पड़ाव था। हजारों भूमिहीन और वंचित लोग ग्वालियर से दिल्ली की ओर चले। जमीन और आजीविका के अधिकार का सवाल राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश की गई। यह केवल एक पदयात्रा नहीं थी। यह उस लोकतांत्रिक सवाल को सामने ला रही थी कि विकास की प्रक्रिया में जिन लोगों के पास सबसे कम संसाधन हैं, उनके अधिकारों का स्थान कहां है। पैरों से बड़ी सवाल की ताकत पदयात्रा में असली शक्ति पैरों में नहीं, उस सवाल में होती है जिसे लेकर लोग चलते हैं। जब कोई भूमिहीन किसान सैकड़ों किलोमीटर चलता है तो वह केवल सड़क की दूरी नहीं तय करता। वह अपने गांव की उस सीमा को भी पार करता है जिसके भीतर उसकी आवाज शायद ही सुनी गई हो। दिल्ली की ओर बढ़ता उसका कदम सत्ता के दरवाजे तक पहुंचने की कोशिश है। जनसत्याग्रह में राजगोपाल के साथ चलना मेरे लिए किसी आंदोलन को बाहर से देखने जैसा नहीं था। हम उसी रास्ते पर थे, उन्हीं लोगों के बीच, जिनके लिए जमीन का सवाल किसी सरकारी फाइल का विषय नहीं, जीवन का सवाल था। सुबह यात्रा शुरू होने के बाद कुछ दूर तक लोगों की कतारें सड़क पर फैल जातीं। किसी के कंधे पर छोटा-सा झोला होता, कोई सिर पर सामान रखे चलता, महिलाएं बच्चों के साथ कदम मिलातीं। धीरे-धीरे धूप तेज होती और पैरों में थकान उतरने लगती, लेकिन बातचीत और नारों के बीच यात्रा आगे बढ़ती रहती। आंकड़ों के पीछे छुपी जिंदगियां चलते-चलते किसी किसान की कहानी सामने आती। उसके लिए भूमिहीन होना केवल खेत का न होना नहीं था। उसके पीछे वर्षों की मजदूरी, असुरक्षा, कर्ज और बच्चों के भविष्य की चिंता जुड़ी थी। किसी आदिवासी साथी से बात होती तो जमीन के साथ जंगल, पानी और पूरे सामुदायिक जीवन का रिश्ता सामने आता। आंकड़ों में छोटे दिखने वाले ये सवाल बातचीत में बहुत बड़े हो जाते थे। इन क्षणों में राजगोपाल की भूमिका केवल नेतृत्व करने की नहीं थी। वे लोगों की बात सुनते और सवाल पूछते—समस्या कहां है, किससे बात की, गांव में और कितने लोग ऐसी स्थिति में हैं? बातचीत धीरे-धीरे व्यक्तिगत शिकायत से सामूहिक प्रश्न की ओर चली जाती। किसी एक व्यक्ति की पीड़ा पूरे गांव के सवाल से जुड़ती और फिर गांव का सवाल भूमि और आजीविका के व्यापक अधिकार से। उनकी भूमिका मुझे सबसे अधिक यहीं दिखाई देती थी—लोगों की बिखरी हुई तकलीफों को एक साझा आवाज में बदलना। मंच से दूर भी नेतृत्व राजगोपाल का नेतृत्व मंच से दूर भी दिखाई देता था। किसी पड़ाव पर छोटी बैठक होती तो वे लोगों के बीच बैठते। कोई व्यक्ति अपनी बात कहने आगे आता तो उसे सुनते। कार्यकर्ताओं के बीच कोई व्यावहारिक समस्या होती तो उस पर बातचीत करते। वे लोगों की ओर से बोलने के बजाय उन्हें अपनी आवाज में बोलने के लिए तैयार करते दिखाई देते थे। यात्रा के दौरान थकान के क्षण भी आते थे। ऐसे समय में आंदोलन की असली परीक्षा होती है। केवल मंच पर खड़े होकर अहिंसा की बात करना आसान है; हजारों थके हुए लोगों के बीच उस अनुशासन को बनाए रखना कठिन। राजगोपाल के लिए संघर्ष की ताकत संख्या में जरूर थी, लेकिन उसकी विश्वसनीयता अहिंसा और अनुशासन में थी। यही अनुभव गांधी के सत्याग्रह को समझने की एक अलग कुंजी देता है। यहां अहिंसा कोई परिभाषा नहीं थी और सत्याग्रह इतिहास का अध्याय नहीं। हजारों लोग अपनी मांग लेकर चल रहे थे, लेकिन उनके हाथ में न पत्थर था, न हथियार। उनके पास अपनी बात थी, साथ चलने का साहस था और यह भरोसा था कि शांतिपूर्ण ढंग से उठाई गई आवाज सत्ता के दरवाजे तक पहुंच सकती है। 2012 का बड़ा जनसत्याग्रह 2012 का जनसत्याग्रह इसी प्रक्रिया का और बड़ा रूप था। बड़ी संख्या में भूमिहीन और आदिवासी लोग ग्वालियर से दिल्ली की ओर चले। भूमि सुधार, आवास और आजीविका से जुड़े सवालों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया। सरकार के साथ बातचीत हुई और नीतिगत पहल की प्रक्रिया आगे बढ़ी। लेकिन किसी भी बड़े सामाजिक प्रश्न की असली परीक्षा घोषणा के बाद शुरू होती है। नीति और उसके जमीन पर क्रियान्वयन के बीच की दूरी ही बताती है कि संघर्ष का असर कितना हुआ। राजगोपाल के काम में यही एक और महत्वपूर्ण पक्ष दिखाई देता है। वे आंदोलन को अंतिम लक्ष्य नहीं मानते। आंदोलन संवाद का रास्ता खोलता है। सत्ता को चुनौती दी जाती है, लेकिन बातचीत की संभावना खत्म नहीं की जाती। गांधीवादी संघर्ष की कठिनाई शायद यही है—दृढ़ता और संवाद दोनों को साथ रखना। विकास और आदिवासी जीवन का सवाल आदिवासी समाज के सवालों में भी यही दृष्टि दिखाई देती है। जंगल, जमीन और जल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं। वे आदिवासी जीवन की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और पहचान से जुड़े हैं। किसी परियोजना के कारण विस्थापन केवल घर बदलने की घटना नहीं है। उससे सामाजिक संबंध, आजीविका और जीवन-पद्धति प्रभावित होती है। इसलिए विकास की किसी भी बहस में उस समुदाय की आवाज को शामिल करना गांधी के अंतिम व्यक्ति की कसौटी से जुड़ता है। गांधी का अंतिम व्यक्ति कोई स्थायी सामाजिक श्रेणी नहीं था। समय के साथ उसका चेहरा बदलता है। आज वह भूमिहीन किसान हो सकता है, विस्थापित आदिवासी परिवार हो सकता है, खेत मजदूर हो सकता है या ऐसा नागरिक हो सकता है जिसके पास अपने अधिकार के पक्ष में कागज तो हैं, लेकिन उस अधिकार को वास्तविकता में बदलने की ताकत नहींराजगोपाल का काम इसी अदृश्यता को तोड़ने की कोशिश है। गांधी का ‘ताबीज’ इसी संदर्भ में आज भी असुविधाजनक सवाल पूछता है—किसी निर्णय के बारे में सोचते समय उस सबसे कमजोर व्यक्ति को याद करो, जिस पर उसका सबसे अधिक असर पड़ सकता है। यह कसौटी सरल लगती है, लेकिन उसे व्यवहार में उतारना कठिन है। क्योंकि विकास की चमक में सबसे पहले वही दिखाई नहीं देता जो सबसे पीछे खड़ा है। चारों ओर गांधी, नजर से बाहर अंतिम व्यक्ति आज गांधी हमारे चारों ओर हैं, फिर भी गांधी का अंतिम व्यक्ति अक्सर हमारी नजर से बाहर है। गांधी की प्रतिमा दिखाई देती है, लेकिन उसके पास बैठा भूमिहीन दिखाई नहीं देता। गांधी के नाम पर भाषण सुनाई देता है, लेकिन विस्थापित परिवार की शिकायत शायद ही सुनाई देती है। पाठ्यक्रम में गांधी पढ़ाए जाते हैं, लेकिन किसी आदिवासी गांव की ग्रामसभा में उसकी वास्तविक भागीदारी का प्रश्न अलग से खड़ा रहता है। राजगोपाल की यात्रा इसी दूरी को कम करने की कोशिश है इसलिए गांधी जयंती पर राजगोपाल पी.वी. को याद करना किसी व्यक्ति की प्रशंसा भर नहीं है। यह गांधी को फिर से पढ़ने का अवसर है—स्मारकों से बाहर, गांवों के भीतर; भाषणों से बाहर, संघर्षों के बीच; और सबसे बढ़कर उस व्यक्ति के पास, जिसे लोकतंत्र में सबसे अंत में सुना जाता है। गांधी की विरासत का असली सवाल शायद यही है कि हम उन्हें कहां खोजते हैं। तस्वीर, संग्रहालय या वर्तमान? अगर गांधी केवल तस्वीर में हैं तो वे अतीत हैं। अगर गांधी केवल संग्रहालय में हैं तो वे स्मृति हैं। लेकिन अगर गांधी उस भूमिहीन किसान के साथ खड़े हैं जो अपनी जमीन और आजीविका के अधिकार के लिए अहिंसक ढंग से आवाज उठा रहा है, तो गांधी अभी भी वर्तमान हैं। राजगोपाल की राह इसी वर्तमान गांधी की तलाश है और इस तलाश का अंतिम पड़ाव कोई स्मारक नहीं, बल्कि वह मनुष्य है जो आज भी न्याय, जमीन, आजीविका और सम्मान की तलाश में खड़ा है। गांधी को बचाने का सबसे कठिन तरीका उनकी तस्वीर बचाना नहीं, बल्कि उनके अंतिम व्यक्ति को दिखाई देना है। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)