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मोतिहारी। बच्चों के यौन शोषण के खिलाफ सबसे बड़ी चुनौती कई बार अपराध से ज्यादा उस डर और चुप्पी की होती है, जो बच्चों को अपनी पीड़ा बताने से रोकती है और इसी चुप्पी को तोड़ने एवं बच्चों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने के लिए बिहार में पूर्वी चंपारण जिले के कक्षा एक से आठ तक के विद्यालयों में बचपन बचाओ अभियान के तहत पॉक्सो अधिनियम पर विशेष जागरूकता कार्यक्रम चलाया जाएगा। इसके तहत प्रत्येक विद्यालय से एक शिक्षक और एक शिक्षिका को प्रशिक्षित किया जाएगा, जो हर महीने बच्चों को बाल सुरक्षा, अनुचित व्यवहार की पहचान और उसके खिलाफ आवाज उठाने के तरीके बताएंगे। जिला विधिक सेवा प्राधिकार के सचिव एवं न्यायाधीश नितिन कुमार त्रिपाठी ने गुरुवार को यहां महात्मा गांधी प्रेक्षागृह में आयोजित कार्यक्रम में विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों को संबोधित करते हुए बच्चों को पॉक्सो अधिनियम की जानकारी देने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को यह समझना जरूरी है कि उनके साथ किसी भी तरह का अनुचित व्यवहार होने पर चुप रहना उनकी मजबूरी नहीं है। उन्हें अपनी बात कहने और विश्वसनीय व्यक्ति से मदद मांगने का भरोसा दिया जाना चाहिए। नुक्कड़ नाटक और प्रतियोगिताओं से खुलेंगे जागरूकता के रास्ते अभियान के तहत प्रशिक्षित शिक्षक-शिक्षिकाएं प्रत्येक माह एक दिन विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करेंगे। नुक्कड़ नाटक, निबंध, वाद-विवाद और अन्य रचनात्मक गतिविधियों के जरिए बच्चों को उनकी उम्र के अनुरूप जानकारी दी जाएगी। इसका उद्देश्य केवल कानून से परिचित कराना नहीं बल्कि बच्चों को सुरक्षित और असुरक्षित व्यवहार के बीच अंतर समझाना तथा किसी परेशानी की स्थिति में बिना डर मदद मांगने के लिए तैयार करना है। जब लोक-लाज भारी पड़ती है, तब अपराध को मिलता है मौका बाल यौन शोषण के मामलों में डर, धमकी, संकोच और सामाजिक दबाव बच्चों की आवाज दबा सकते हैं। कई बार बच्चे अपने साथ हुई घटना माता-पिता या शिक्षकों को बताने से डरते हैं। वहीं, सामाजिक प्रतिष्ठा और लोक-लाज के भय से परिवार भी शिकायत करने से पीछे हट सकते हैं। ऐसी चुप्पी पीड़ित बच्चे को अकेला कर देती है और अपराध करने वालों के खिलाफ कार्रवाई में बाधा बन सकती है। बच्चों को यह भरोसा दिलाना जरूरी है कि किसी भी अनुचित व्यवहार के लिए वे दोषी नहीं हैं। अपनी परेशानी बताने पर उन्हें डांटने, डराने या अपमानित करने के बजाय उनकी बात गंभीरता से सुनी जानी चाहिए। अभिभावकों और शिक्षकों की संवेदनशीलता ही बच्चों को समय रहते सहायता दिलाने में निर्णायक साबित हो सकती है। अनजान ही नहीं, परिचित भी हो सकता है शोषण करने वाला बच्चों का लैंगिक अपराध से संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 अठारह वर्ष से कम आयु के बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण प्रदान करता है। विद्यालयों में बच्चों को सरल भाषा में समझाया जाएगा कि कोई व्यक्ति अनुचित तरीके से छूने, डराने-धमकाने, अश्लील सामग्री दिखाने या किसी असुरक्षित गतिविधि के लिए मजबूर करे तो उन्हें भरोसेमंद वयस्क को इसकी जानकारी देनी चाहिए। उन्हें यह भी बताया जाएगा कि अनुचित व्यवहार करने वाला व्यक्ति अनजान ही हो, यह जरूरी नहीं है; वह परिचित भी हो सकता है। कानून में बच्चों के अनुकूल तरीके से बयान दर्ज करने तथा जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उनकी गरिमा एवं गोपनीयता की रक्षा के प्रावधान हैं। ऐसे मामलों में बच्चे की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कानून के अनुरूप कार्रवाई जरूरी है। बच्चों की चुप्पी नहीं, उनकी सुरक्षा हो प्राथमिकता बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव, असामान्य भय, चुप्पी या किसी व्यक्ति के प्रति असहजता दिखने पर अभिभावकों और शिक्षकों को संवेदनशीलता से ध्यान देना चाहिए। हालांकि, ऐसे संकेत अपने आप में किसी अपराध का प्रमाण नहीं हैं, लेकिन बच्चे की बात सुनने और जरूरत पड़ने पर सहायता लेने की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। कार्यक्रम में जिला शिक्षा पदाधिकारी राजन गिरी, जिला कार्यक्रम पदाधिकारी तथा शिक्षा विभाग से रेयाज अहमद, शकील अहमद और अमरेश कुमार सहित मशाल मास्टर प्रशिक्षक सुनील कुमार, अरविंद कुमार, भानु प्रकाश, अमित कश्यप, अंशु यादव और रवि कुमार सिंह समेत अन्य पदाधिकारी एवं प्रशिक्षक उपस्थित थे। अभियान का संदेश स्पष्ट है कि बच्चों को डर में जीने के बजाय अपनी बात कहने का साहस मिले, उनकी शिकायत को गंभीरता से सुना जाए और किसी भी अनुचित व्यवहार पर समय रहते कार्रवाई हो। सुरक्षित बचपन केवल कानून से नहीं, बल्कि बच्चों के प्रति परिवार, विद्यालय और समाज की जवाबदेही से सुनिश्चित होगा।