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मुंबई। सिनेमा के पर्दे पर कुछ आवाजें सिर्फ संवाद नहीं बोलतीं, वे भीतर तक उतरती हैं.....नाना पाटेकर की आवाज ऐसी ही थी, जिसमें कभी व्यवस्था के खिलाफ उबलता गुस्सा सुनाई दिया, कभी टूटे हुए इंसान का दर्द, कभी खलनायक की सनक और कभी ऐसा हास्य जिसने दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर दिया; करीब पांच दशक की उनकी अभिनय यात्रा अब थम गई है लेकिन ‘अंकुश’, ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘खामोशी’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘वेलकम’ जैसे किरदारों में वह आवाज और वह चेहरा लंबे समय तक दर्शकों की स्मृतियों में जीवित रहेगा। वह चेहरा ‘हीरो’ जैसा नहीं था... शायद यही उसकी ताकत थी नाना पाटेकर उस दौर में आए, जब हिंदी सिनेमा के नायक की एक लगभग तय तस्वीर हुआ करती थी। लेकिन नाना उस तस्वीर में फिट होने नहीं आए थे। उनकी अपनी दुनिया थी। चेहरे पर खुरदरापन, आंखों में बेचैनी, आवाज में एक अजीब-सी धार और संवाद बोलने का ऐसा अंदाज, जिसमें कई बार लगता था कि अभिनेता सामने खड़ा नहीं है—कोई नाराज, परेशान या घायल इंसान आपसे सीधे बात कर रहा है। नाना ने नायक की परिभाषा बदलने की कोशिश नहीं की। उन्होंने बस उसकी परवाह नहीं की। यही उनकी ताकत बन गई। नाम विश्वनाथ था, दुनिया ने ‘नाना’ के नाम से याद रखा एक जनवरी 1951 को मुंबई के एक मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में जन्मे नाना का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। पिता दनकर पाटेकर चित्रकार थे। कला शायद घर से ही उनके साथ चली थी। मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई के दौरान वह नाटकों में हिस्सा लेने लगे। स्केचिंग में भी उनकी दिलचस्पी थी। वह अपराधियों की पहचान के लिए मुंबई पुलिस को उनके स्केच बनाकर दिया करते थे। तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि दूसरों के चेहरे कागज पर उतारने वाला यह युवक एक दिन अपने चेहरे के भावों से करोड़ों दर्शकों को कहानी सुनाएगा। कैमरा मिला, लेकिन पहचान के लिए आठ साल इंतजार करना पड़ा 1978 में ‘गमन’ से फिल्मी सफर शुरू हुआ। फिल्म आई और चली गई। नाना को वह पहचान नहीं मिली जिसकी तलाश थी। इसके बाद जो किरदार मिला, करते गए। ‘गिद्ध’, ‘भालू’, ‘शीला’ जैसी फिल्में आईं, लेकिन सफलता नहीं आई। यह सिलसिला करीब आठ साल चला। 1984 में ‘आज की आवाज’ में राज बब्बर के साथ मौका मिला। फिल्म राज बब्बर के इर्द-गिर्द थी, फिर भी नाना ने छोटे दायरे में बता दिया कि इस अभिनेता के पास अपना कुछ है लेकिन असली विस्फोट अभी बाकी था। ‘अंकुश’ में जैसे पर्दे पर फट पड़ा वर्षों का गुस्सा 1986 में एन. चंद्रा की ‘अंकुश’ आई। नाना बेरोजगार युवक बने। काम नहीं है। व्यवस्था से नाराजगी है। भीतर गुस्सा जमा है और जिंदगी धीरे-धीरे गलत रास्ते पर जा रही है। शायद यही वह किरदार था जिसमें दर्शकों ने पहली बार नाना के अभिनय की उस बेचैनी को पूरी ताकत से महसूस किया, जो आगे उनकी पहचान बनने वाली थी। अगले साल ‘प्रतिघात’ में पागल पुलिस वाले की छोटी-सी भूमिका मिली। स्क्रीन टाइम भले कम रहा, असर बड़ा था। नाना अब भीड़ में दिखने वाले अभिनेता नहीं रहे थे। भीड़ से अलग पहचान में आने लगे थे। फिर आया ‘परिंदा’... और नाना ने डर को चेहरा दे दिया 1989 की ‘परिंदा’ ने नाना पाटेकर के अभिनय का दूसरा सिरा दिखाया। इस बार सामने ऐसा किरदार था जो मानसिक रूप से विक्षिप्त भी था और अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह भी। उसमें हिंसा थी, सनक थी और ऐसा गुस्सा था जिसकी कोई सीमा नजर नहीं आती थी। यह किरदार सिर्फ चीखने से डरावना नहीं बन सकता था। नाना ने उसे आंखों से डरावना बनाया। चेहरे के भावों से बनाया। अचानक बदलते व्यवहार से बनाया। दर्शक समझ गए कि यह अभिनेता केवल गुस्सा दिखाता नहीं है—वह गुस्से के पीछे छिपी सनक भी दिखा सकता है। कैमरे के सामने मन नहीं भरा तो पीछे भी पहुंच गए 1991 में नाना ने ‘प्रहार’ का निर्देशन किया और उसमें अभिनय भी किया। इस फिल्म में उन्होंने माधुरी दीक्षित को ग्लैमर से अलग रूप में पेश किया। यह नाना के फिल्मी सफर का वह पड़ाव था, जहां अभिनेता के साथ निर्देशक भी सामने आया। फिर 1992 में ‘तिरंगा’ आई। सामने राजकुमार थे...वह अभिनेता जिनकी आवाज और संवाद अदायगी अपने आप में पहचान थी लेकिन नाना भी कहां दबने वाले थे। एक तरफ राजकुमार की संवाद शैली, दूसरी तरफ नाना का अपना तेवर। नतीजा यह हुआ कि ‘तिरंगा’ नाना के करियर की पहली सुपरहिट फिल्म बनी और उनकी संवाद अदायगी उनकी पहचान का बड़ा हिस्सा बनती चली गई। जिसकी आवाज पहचान थी, उसने ‘खामोशी’ में बिना बोले कमाल कर दिया फिर 1996 में ‘खामोशी’ आई। यहां नाना के पास उनकी सबसे बड़ी ताकत ही नहीं थी—संवाद। उन्हें गूंगे पिता का किरदार निभाना था। जो आदमी अपनी आवाज के उतार-चढ़ाव से दृश्य पर कब्जा कर लेता था, उसे अब आंखों और चेहरे से बात करनी थी और शायद यहीं नाना ने अपने अभिनय की सबसे खूबसूरत विडंबना रची। वह बोले नहीं, फिर भी सुनाई दिए। आंखों में दर्द आया तो संवाद की जरूरत नहीं पड़ी। चेहरे पर भाव बदले तो कहानी आगे बढ़ गई। जिस अभिनेता की आवाज उसकी पहचान थी, उसने खामोश होकर साबित किया कि असली ताकत आवाज में नहीं, अभिनय में थी। ‘क्रांतिवीर’ से ‘अब तक छप्पन’ तक—गुस्सा हर बार अलग था नाना के पर्दे वाले गुस्से को केवल ‘गुस्सा’ कहना शायद कम होगा। ‘क्रांतिवीर’ में वही तेवर प्रतिरोध बन गया। ‘परिंदा’ में सनक। ‘अब तक छप्पन’ में कठोरता। वह हर किरदार में ऊंची आवाज नहीं लगाते थे। कई बार उनका धीरे बोलना ज्यादा असर छोड़ता था। एक नजर....कुछ पल की चुप्पी....चेहरे पर हल्का-सा बदलाव....फिर एक वाक्य। नाना की अभिनय शैली का अपना व्याकरण था। और फिर ‘वेलकम’ ने पूरा खेल पलट दिया 2007 तक नाना की एक मजबूत छवि बन चुकी थी—गंभीर अभिनेता, तीखे संवाद, गुस्सा और भारी किरदार। फिर आई ‘वेलकम’ और नाना ने दर्शकों को हंसाना शुरू कर दिया। यह वही अभिनेता था जिसे देखकर कभी पर्दे पर तनाव पैदा होता था। अब उसी के हावभाव और कॉमिक टाइमिंग पर सिनेमाघरों में ठहाके लग रहे थे। उन्होंने हास्य भूमिका के जरिए दिखाया कि गंभीरता उनकी सीमा नहीं थी।एक तरफ ‘परिंदा’, दूसरी तरफ ‘वेलकम’....एक तरफ खौफ, दूसरी तरफ हंसी। दोनों के बीच की दूरी ही शायद नाना पाटेकर के अभिनेता होने की असली रेंज बताती है। नाना संवाद नहीं बोलते थे, संवाद ‘फेंकते’ भी नहीं थे... उसे जीते थे उनकी आवाज बेशक खास थी, लेकिन असली जादू शायद उस आवाज के इस्तेमाल में था। कब तेज बोलना है, कब शब्द को दबाकर कहना है, कब सामने वाले को घूरते रहना है और सबसे महत्वपूर्ण कि कब बिल्कुल चुप हो जाना है इसीलिए नाना के कई दृश्य केवल लिखे हुए संवादों की वजह से याद नहीं रहे। उनके बोलने के तरीके ने उन्हें यादगार बनाया। आक्रोश और संवेदना उनके अभिनय में विरोधी भाव नहीं थे। दोनों साथ चल सकते थे। यही वजह थी कि वह कठोर दिखते हुए भी कमजोर इंसान का दर्द दिखा सकते थे और गंभीर छवि के बावजूद दर्शकों को हंसा सकते थे। चमकती फिल्मी दुनिया में अपनी ही चाल चलते रहे नाना ने कभी खुद को किसी एक स्थापित फिल्मी ढांचे में कैद नहीं होने दिया। नायक बने...खलनायक बने, पुलिस अधिकारी बने...पिता बने, व्यवस्था से लड़ता आम आदमी बने और हास्य किरदार निभाया। फिल्मी चमक-दमक के बीच भी उनकी पहचान अपेक्षाकृत सहज और जमीन से जुड़े कलाकार की रही। सामाजिक सरोकारों से उनका जुड़ाव भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बना रहा। सिनेमा उनके लिए केवल मनोरंजन नहीं दिखा। उनके कई किरदारों में व्यवस्था, समाज, रिश्ते और इंसानी कमजोरियां बार-बार उभरती रहीं। तीन राष्ट्रीय पुरस्कार, चार फिल्मफेयर और पद्मश्री... मगर विरासत आंकड़ों से बड़ी नाना पाटेकर को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार और चार फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। वर्ष 2013 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। ये सम्मान उनकी उपलब्धियों का हिस्सा हैं लेकिन किसी अभिनेता की विरासत सिर्फ पुरस्कारों की संख्या से कहां तय होती है? नाना की विरासत शायद उस दर्शक की स्मृति में ज्यादा सुरक्षित है, जिसे ‘परिंदा’ देखते हुए उनसे डर लगा था, ‘खामोशी’ देखते हुए उनकी आंखों में दर्द दिखाई दिया था, ‘क्रांतिवीर’ में उनका आक्रोश महसूस हुआ था और ‘वेलकम’ में वही आदमी उसे हंसा गया था। पर्दा गिरा है, किरदार नहीं नाना पाटेकर की जीवन-यात्रा का अध्याय समाप्त हो गया लेकिन सिनेमा में कुछ कलाकार पर्दे से जाने के बाद भी पूरी तरह नहीं जाते।वे अपने किरदारों में रह जाते हैं...किसी संवाद के बीच अचानक आए ठहराव में....किसी गुस्से से भरी आंख में...किसी खामोश चेहरे के दर्द में और कभी किसी ऐसे दृश्य में, जिसे आपने वर्षों पहले देखा था लेकिन आज भी याद है। ‘अंकुश’ का आक्रोश रहेगा। ‘परिंदा’ का खौफ रहेगा। ‘क्रांतिवीर’ का प्रतिरोध रहेगा। ‘खामोशी’ की आंखें रहेंगी। ‘अब तक छप्पन’ का ठहराव रहेगा। ‘वेलकम’ की हंसी रहेगी और इन सबके बीच नाना पाटेकर भी रहेंगे—उस आवाज की तरह, जो खामोश होने के बाद भी सुनाई देती है।



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