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सीवान। देश के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का अपनी जन्मभूमि, अपनी मिट्टी और भारतीय संस्कृति से गहरा लगाव था। राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंचने के बाद भी वे अपनी जड़ों और धार्मिक परंपराओं को नहीं भूले। इसका जीवंत उदाहरण सीवान जिले के जीरादेई में देखने को मिलता है, जहां वर्ष 1953 में उनके द्वारा शुरू करायी गयी दुर्गापूजा की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभायी जा रही है। 1953 में शुरू हुई आस्था की ऐतिहासिक परंपरा समय बदला, पीढ़ियां बदलीं लेकिन मां दुर्गा की आराधना से जुड़ी यह परंपरा आज भी गांव की आस्था और ऐतिहासिक विरासत को संजोये हुए है। ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1953 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने पैतृक आवास के समीप मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर दुर्गापूजा की शुरुआत करायी थी। राष्ट्रपति बनने के बाद भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने वाले राजेंद्र बाबू की यह पहल आज जीरादेई की विशिष्ट पहचान बन गयी है। गांव के लोग इसे केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि देशरत्न की स्मृतियों से जुड़ी अमूल्य विरासत मानते हैं। जहां राजेंद्र बाबू ने की पूजा, आज भी वहीं सजता है मां का दरबार इस परंपरा की खास बात यह है कि जिस स्थान पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कराते थे, आज भी उसी स्थान पर प्रतिमा स्थापित की जाती है। पूजा समिति और ग्रामीण मिलकर पूरे उत्साह के साथ आयोजन की तैयारियों में जुटते हैं। पूजा समिति के अध्यक्ष धर्मेंद्र प्रसाद और सचिन छोटन साह ने बताया कि राजेंद्र बाबू द्वारा जिस स्थान पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती थी, उसी स्थान पर आज भी प्रतिमा स्थापित कर उनकी शुरू की गयी परंपरा को कायम रखा जा रहा है। मां दुर्गा की आराधना संग देशरत्न की स्मृतियों को नमन नवरात्र के दौरान जीरादेई में भक्ति और श्रद्धा का माहौल छा जाता है। मां दुर्गा की पूजा-अर्चना के साथ ग्रामीण देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद की स्मृतियों को भी नमन करते हैं। यह आयोजन गांव के लोगों को अपनी गौरवशाली ऐतिहासिक विरासत से जुड़ने का अवसर देता है। साथ ही, नयी पीढ़ी को भी यह जानने का मौका मिलता है कि देश के प्रथम राष्ट्रपति का अपनी जन्मभूमि और भारतीय परंपराओं के प्रति कितना गहरा जुड़ाव था। पीढ़ियां बदलती रहीं, देशरत्न की विरासत आज भी जीवंत डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जीवन सादगी, संस्कार और भारतीय परंपराओं के प्रति सम्मान का प्रतीक रहा है। जीरादेई में आज भी जारी दुर्गापूजा की परंपरा उनके इसी व्यक्तित्व की याद दिलाती है। यह आयोजन बताता है कि किसी महान व्यक्तित्व की पहचान केवल उसके पद और उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, संस्कृति और परंपराओं से उसके जुड़ाव से भी बनती है। जीरादेई के ग्रामीण मां दुर्गा की आराधना के साथ-साथ देशरत्न की विरासत को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं।



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