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(जन्मदिन 15 अक्टूबर पर विशेष) नई दिल्ली। कभी-कभी एक अधूरा सपना जीवन की सबसे बड़ी यात्रा की शुरुआत बन जाता है। डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का भारतीय वायुसेना में पायलट बनने का सपना पूरा नहीं हुआ लेकिन इस असफलता से उपजी निराशा उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनी, उन्होंने एक दूसरा रास्ता चुना, जो उन्हें भारत के वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों के शीर्ष तक ले गया और अंततः राष्ट्रपति भवन पहुंचाया। ऋषिकेश की वह निर्णायक मुलाकात इस कठिन दौर में ऋषिकेश में स्वामी शिवानंद सरस्वती से उनकी मुलाकात का विशेष महत्त्व माना जाता है। डिवाइन लाइफ सोसाइटी के संस्थापक और आध्यात्मिक गुरु स्वामी शिवानंद से हुई इस भेंट ने कलाम की परिस्थितियाँ तत्काल नहीं बदल दीं और न ही उनकी निराशा एक क्षण में समाप्त हो गई। लेकिन इस मुलाकात से उन्हें एक ऐसा दृष्टिकोण मिला, जिसने असफलता को देखने का नजरिया बदलने में मदद की। जीवन में किसी एक महत्त्वाकांक्षा का पूरा न होना, पूरे जीवन की विफलता नहीं है। विज्ञान के शिखर पर विनम्र व्यक्तित्व डॉ. कलाम को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम, मिसाइल विकास और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में उनके योगदान के लिए याद किया जाता है। उनकी विनम्रता, आध्यात्मिक अभिरुचि और बच्चों से आत्मीय संवाद करने की क्षमता ने भी उन्हें लोगों के बीच विशिष्ट पहचान दिलाई। उनके जीवन की यात्रा पर पीछे मुड़कर देखें तो ऋषिकेश की वह मुलाकात हमें यह समझने का अवसर देती है कि उन्होंने अनिश्चितता और निराशा का सामना करते हुए कर्म के प्रति अपनी प्रतिबद्धता कैसे बनाए रखी। रामेश्वरम की गलियों से निकला सितारा 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में जन्मे अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम एक साधारण परिवार से आते थे। उनके पिता जैनुलाब्दीन नाव चलाने का काम करते थे और माता आशियम्मा गृहिणी थीं। परिवार की सीमित आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद कलाम में सीखने और विज्ञान के प्रति गहरी रुचि विकसित हुई। उनका बचपन अनुशासन, सादगी और विभिन्न धार्मिक पृष्ठभूमियों के लोगों के साथ निकट संपर्क में बीता। आसमान छूने का सपना तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज से भौतिकी की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की। उनका सपना विमान उड़ाना और भारतीय वायुसेना में पायलट के रूप में देश की सेवा करना था। एक युवा इंजीनियर के लिए, जिसने अपनी शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण में वर्षों लगाए हों, वायुसेना में प्रवेश उसके सबसे प्रिय सपने की पूर्ति जैसा था।लेकिन जीवन हमेशा हमारी कल्पना के अनुसार आगे नहीं बढ़ता। 1950 के दशक के उत्तरार्ध में कलाम ने भारतीय वायुसेना में पायलट के चयन की प्रक्रिया में हिस्सा लिया। चयन के लिए आठ स्थान थे और वे नौवें स्थान पर रहे। अंतर केवल एक स्थान का था, लेकिन परिणाम निर्णायक था। वे वायुसेना में पायलट नहीं बन सके। जिस व्यक्ति ने अपनी आशाओं को एक लक्ष्य से जोड़ रखा हो, उसके लिए यह गहरा आघात था। इस घटना ने एक ऐसा प्रश्न खड़ा किया, जिसका सामना अनेक युवा करते हैं। जब वर्षों की तैयारी के बावजूद भविष्य की कल्पना साकार न हो, तब आगे क्या किया जाए? इसी अनिश्चितता के दौर में कलाम ऋषिकेश पहुँचे। वहाँ उनकी मुलाकात स्वामी शिवानंद सरस्वती से हुई। आध्यात्मिक गुरु ने युवा इंजीनियर की बात सुनी और उन्हें तत्काल मिली निराशा से आगे देखने की प्रेरणा दी। एक असफलता, पूरे जीवन की हार नहीं इस मुलाकात का केंद्रीय संदेश यह नहीं था कि महत्त्वाकांक्षा का कोई अर्थ नहीं है या असफलता को चुपचाप स्वीकार कर लेना चाहिए। इसका आशय था कि जीवन की किसी एक विफलता को अपने पूरे अस्तित्व की परिभाषा नहीं बनने देना चाहिए। जब एक रास्ता बंद हो जाए, तब अपनी क्षमताओं पर विश्वास बनाए रखते हुए किसी सार्थक उद्देश्य की ओर बढ़ते रहना जरूरी है। कलाम के लिए यह दृष्टिकोण उपयोगी साबित हुआ। निराशा वास्तविक थी, लेकिन वह उनके लिए स्थायी बाधा नहीं बनी। उन्होंने विज्ञान और इंजीनियरिंग में उपलब्ध अवसरों की ओर अपनी ऊर्जा केंद्रित की। स्वामी शिवानंद से मुलाकात उनके जीवन के उन अनुभवों में शामिल हो गई, जिनसे उन्होंने विपरीत परिस्थितियों का सामना करना और आगे बढ़ना सीखा। यह कहना उचित नहीं होगा कि कलाम की बाद की सभी उपलब्धियों का श्रेय केवल एक मुलाकात को दिया जा सकता है। उनका करियर निरंतर अध्ययन, तकनीकी दक्षता, सामूहिक प्रयास, संस्थागत सहयोग और वर्षों के कठिन परिश्रम से बना। फिर भी ऋषिकेश का वह प्रसंग उनके व्यक्तित्व के एक महत्त्वपूर्ण पक्ष को सामने लाता है कि असफलता पर विचार करना और उससे निकलने का रचनात्मक रास्ता खोजना। विज्ञान की दुनिया में पहला कदम कलाम ने रक्षा मंत्रालय से संबद्ध तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय में काम किया। इसके बाद वे भारत के उभरते अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े। वे उन वैज्ञानिकों की पीढ़ी का हिस्सा बने, जिन्होंने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बीच देश की तकनीकी क्षमताओं को विकसित करने का प्रयास किया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में उन्होंने सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल-3 (एसएलवी-3) के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1980 में इसी प्रक्षेपण यान के माध्यम से रोहिणी उपग्रह को कक्षा में स्थापित करना भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की एक बड़ी उपलब्धि थी। इससे देश की स्वदेशी प्रक्षेपण क्षमता का विकास सामने आया। बाद के वर्षों में उनका नाम भारत के निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम से जुड़ गया। रक्षा और एयरोस्पेस परियोजनाओं में उनके योगदान के कारण उन्हें लोकप्रिय रूप से ‘मिसाइल मैन ऑफ इंडिया’ कहा जाने लगा। वर्ष 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों के आसपास के दौर में भी उन्होंने देश के रणनीतिक वैज्ञानिक प्रतिष्ठान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सामूहिक मेहनत को बनाया ताकत ये उपलब्धियाँ किसी एक व्यक्ति के प्रयास का परिणाम नहीं थीं। इनके पीछे वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, तकनीशियनों और सार्वजनिक संस्थानों की सामूहिक मेहनत थी। कलाम के नेतृत्व की विशेषता यह थी कि वे सामूहिक प्रयास को प्रोत्साहित करते और तकनीकी काम को व्यापक राष्ट्रीय उद्देश्य से जोड़ते थे। उनके लिए विज्ञान केवल तकनीकी श्रेष्ठता हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की संभावनाओं का विस्तार करने का साधन था। वर्ष 2002 में कलाम भारत के राष्ट्रपति बने। वैज्ञानिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति का देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुँचना उल्लेखनीय था। राष्ट्रपति रहते हुए भी उनके व्यक्तित्व में एक शिक्षक की छवि बनी रही। वे विद्यार्थियों से मिलते, उनके प्रश्नों का उत्तर देते और उनमें जिज्ञासा, अनुशासन तथा आत्मविश्वास विकसित करने की प्रेरणा देते थे। सपनों को मेहनत से जोड़ने की सीख कलाम के लिए युवा केवल सलाह सुनने वाले नहीं थे। वे देश के भविष्य की कल्पना करने वाले सहभागी थे। वे सपने देखने की प्रेरणा देते थे, लेकिन उनके लिए सपना केवल कल्पना या इच्छा का नाम नहीं था। सपने को ज्ञान, कठिन परिश्रम, धैर्य और असफलताओं से सीखने की क्षमता का सहारा चाहिए। सीखने और आंतरिक अनुशासन पर उनका यह जोर उनकी आध्यात्मिक रुचि और योग के प्रति आकर्षण को समझने में भी मदद करता है। कलाम की आध्यात्मिक दृष्टि ने वैज्ञानिक विवेक को पीछे नहीं छोड़ा। वे वैज्ञानिक खोज और आंतरिक संतुलन को एक-दूसरे का विरोधी नहीं मानते थे। उनके जीवन में इन दोनों के बीच संवाद की संभावना दिखाई देती है। इस संदर्भ में बिहार के मुंगेर से उनका जुड़ाव विशेष महत्त्व रखता है। मुंगेर बिहार स्कूल ऑफ योग का केंद्र है। इस संस्थान की स्थापना स्वामी शिवानंद सरस्वती के शिष्य स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने की थी। बाद में परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के नेतृत्व में भी योग की शिक्षाओं के प्रसार और विकास का काम आगे बढ़ा। मुंगेर की दो यात्राएं, अमिट यादें डॉ. कलाम वर्ष 2002 और 2003 में मुंगेर आए थे। इन दोनों अवसरों पर मैं स्वयं उपस्थित था। उनकी यात्राएँ आज भी मुंगेर के साथ उनके संबंधों की महत्त्वपूर्ण स्मृतियों के रूप में मेरे मन में दर्ज हैं। उनके आगमन ने विज्ञान, शिक्षा, अध्यात्म और बच्चों के विकास में रुचि रखने वाले विभिन्न वर्गों के लोगों को एक साथ आने का अवसर दिया। 14 फरवरी 2003 को मुंगेर के पोलो ग्राउंड में एक विशेष कार्यक्रम हुआ, जिसमें डॉ. कलाम ने स्कूली बच्चों और स्थानीय लोगों से संवाद किया। उस समय कार्यक्रम के दौरान आनंद जनसंपर्क पदाधिकारी के रूप में तैनात थे। आनंद वर्तमान में झारखंड के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने बच्चों के साथ डॉ. कलाम के संवाद का समन्वय किया और इस मुलाकात को एक औपचारिक सार्वजनिक संबोधन से आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई। जब राष्ट्रपति ने सुने बच्चों के सवाल डॉ. कलाम ने सभा को संबोधित किया, बच्चों को शपथ दिलाई और उनके साथ प्रश्नोत्तर सत्र में भाग लिया। उन्होंने बच्चों के सवालों के जवाब दिए और उन्हें खुलकर अपनी बात रखने के लिए प्रोत्साहित किया। उन बच्चों के लिए यह एक दुर्लभ अवसर था—वे उस वैज्ञानिक से सीधे बातचीत कर रहे थे, जिसने भारत की तकनीकी क्षमताओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और जो उस समय देश के राष्ट्रपति थे। बच्चों के साथ उनका संवाद इसलिए भी यादगार था कि उन्होंने उन्हें केवल श्रोता बनाकर नहीं रखा। उन्होंने उनके प्रश्नों के लिए जगह बनाई और एक शिक्षक की तरह धैर्यपूर्वक उत्तर दिए। आनंद ने इस संवाद के समन्वय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह प्रसंग कलाम के सार्वजनिक जीवन की उस विशेषता को सामने लाता है, जिसमें शिक्षा, जिज्ञासा और आत्मविश्वास को लोगों से जुड़ने का आधार बनाया गया। योगनगरी में वैज्ञानिक की आध्यात्मिक छवि परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती को डॉ. कलाम की मुंगेर यात्राएं याद हैं। उनके अनुसार, कलाम केवल महान वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक व्यक्ति भी थे। मुंगेर के साथ उनका संबंध योग और उसके माध्यम से मानव विकास की संभावनाओं के प्रति उनकी रुचि को दर्शाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग की परंपरा के लिए पहचाने जाने वाले मुंगेर में वैज्ञानिक उपलब्धि, व्यक्तिगत अनुशासन और बच्चों के विकास से जुड़े कलाम के विचारों का एक स्वाभाविक संगम दिखाई देता था। हालांकि, मुंगेर में बिहार स्कूल ऑफ योग की उनकी यात्राओं और ऋषिकेश में स्वामी शिवानंद से हुई मुलाकात को एक ही घटना के रूप में नहीं देखना चाहिए। दोनों उनके जीवन के अलग-अलग पड़ावों से संबंधित हैं। ऋषिकेश की मुलाकात उस समय हुई थी, जब वे युवा इंजीनियर थे और पायलट बनने का सपना पूरा न होने से निराश थे। मुंगेर की यात्राएँ कई दशक बाद हुईं, जब वे एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और राष्ट्रीय व्यक्तित्व बन चुके थे। फिर भी, दोनों प्रसंग उनके जीवन में आध्यात्मिकता, आत्मचिंतन और मानवीय संवाद की निरंतर उपस्थिति को समझने में मदद करते हैं। आस्था और तर्क के बीच संतुलन स्वामी शिवानंद से उनके जुड़ाव के संदर्भ में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आध्यात्मिक विचार के संबंध पर भी विचार किया जा सकता है। सार्वजनिक विमर्श में कई बार दोनों को परस्पर विरोधी मान लिया जाता है। कलाम का जीवन एक अधिक सूक्ष्म दृष्टि प्रस्तुत करता है। वैज्ञानिक कार्य के लिए प्रमाण, प्रयोग और आलोचनात्मक विवेक आवश्यक हैं। वहीं, यदि आध्यात्मिक चिंतन को प्रमाण का विकल्प बनाने के बजाय आत्मपरीक्षण का माध्यम माना जाए, तो वह विनम्रता, धैर्य और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने में सहायक हो सकता है। कलाम के जीवन का महत्त्व इस विचार में नहीं है कि केवल आस्था के सहारे हर बाधा को पार किया जा सकता है। उनकी उपलब्धियों के लिए कठोर प्रशिक्षण, संस्थागत सहयोग और व्यावहारिक निर्णय जरूरी थे। ऋषिकेश की मुलाकात ने उन्हें निराशा का सामना इस तरह करने की प्रेरणा दी होगी कि वह उनके आत्मविश्वास को नष्ट न करे और संभावनाओं की दुनिया को सीमित न कर दे। बंद हुआ एक रास्ता, खुली नई मंजिल वायुसेना में पायलट बनने का सपना पूरा न होना उनकी यात्रा का अंत नहीं बना। इसने उन्हें एक दूसरे क्षेत्र की ओर मोड़ दिया, जहां उनकी प्रतिभा को अभिव्यक्ति मिली। यदि वे पायलट बन गए होते, तो संभव है कि उनका जीवन किसी दूसरी दिशा में आगे बढ़ता। इतिहास इस काल्पनिक संभावना का उत्तर नहीं दे सकता लेकिन यह स्पष्ट है कि उन्होंने जिस रास्ते को चुना, उसने उन्हें भारत के वैज्ञानिक विकास के केंद्र में पहुंचाया और बाद में देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक ले गया। 27 जुलाई 2015 को भारतीय प्रबंधन संस्थान, शिलांग में व्याख्यान देते समय कलाम का निधन हो गया। जीवन के अंतिम क्षणों में भी वे विद्यार्थियों से संवाद और शिक्षण के कार्य में लगे थे। उनका यह अंत उनके सार्वजनिक जीवन की मूल भावना के अनुरूप था...एक ऐसा जीवन, जिसमें सीखना केवल कक्षा तक सीमित नहीं था और नेतृत्व का अर्थ दूसरों को प्रेरित करने की जिम्मेदारी भी था। हर युवा के लिए उम्मीद का संदेश उनकी कहानी आज भी इसलिए प्रासंगिक है कि असफलता का अनुभव सार्वभौमिक है, लेकिन उसका रचनात्मक सामना करना अपने आप नहीं आता। युवाओं को परीक्षाओं, करियर और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं में निराशा का सामना करना पड़ता है। संस्थानों के लिए भी यह समझना जरूरी है कि किसी प्रयास की विफलता तरीकों की समीक्षा करने और नई दिशा खोजने का अवसर हो सकती है, न कि प्रयास छोड़ देने का कारण। ऋषिकेश की उस मुलाकात ने डॉ. कलाम का भविष्य लिखकर नहीं दिया था। उसने उन्हें उस क्षण का सामना करने में मदद की, जब उनका मूल सपना टूट गया था। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह जीवन भर के परिश्रम का परिणाम था कि वर्षों का वैज्ञानिक अनुसंधान, सार्वजनिक सेवा, निरंतर सीखना और युवाओं के साथ संवाद। अधूरे सपने भी लिख सकते हैं नया इतिहास डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यात्रा का स्थायी संदेश शायद यही है कि बंद हुआ एक दरवाजा पूरे जीवन की सीमा नहीं बन जाना चाहिए। कभी-कभी निराशा को स्वीकार करने का साहस और काम करते रहने का संकल्प हमें उस मंजिल तक पहुंचा सकता है, जिसकी हमने शुरुआत में कल्पना भी नहीं की थी। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)