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भागलपुर। गांधीवादी चिंतक पीवी राजगोपाल ने कहा कि वर्तमान वैश्विक संकटों और मानवता के सामने खड़ी चुनौतियों से निपटने में गांधी के विचार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और यही वजह है कि दुनिया के कई देशों में चरखा, खादी, कौशल विकास और स्वावलंबन से जुड़े उनके विचारों को समझने में रुचि बढ़ने के साथ शांति, सुरक्षा और मनुष्य के आंतरिक संकटों के समाधान के लिए भी गांधी का चिंतन प्रासंगिक बना हुआ है। श्री राजगोपाल गुरुवार को तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर गांधी विचार विभाग की ओर से आयोजित त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के दूसरे दिन ‘चरखा, खादी एवं कौशल विकास’ विषयक तकनीकी सत्र में बीज वक्तव्य दे रहे थे। उन्होंने कहा कि गांधी के चरखा और खादी के विचार को केवल कपड़े या उत्पादन से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके केंद्र में स्वावलंबन, श्रम की प्रतिष्ठा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की अवधारणा है। गांधीवादी चिंतक ने कहा कि गांधी के विचारों की प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि वे बाहरी संकटों के साथ मनुष्य के आंतरिक संकटों को भी संबोधित करते हैं। वर्तमान समय में वैश्विक शांति के लिए केवल राजनीतिक और संस्थागत प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। समाज में सत्य, अहिंसा, संवाद और सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत करना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि कौशल विकास को गांधी के स्वावलंबन के विचार से जोड़कर देखने की जरूरत है। व्यक्ति के श्रम और कौशल को सम्मान देने तथा स्थानीय स्तर पर रोजगार और उत्पादन को बढ़ावा देने से समाज की आत्मनिर्भरता मजबूत हो सकती है। दोपहर में आयोजित ‘ज्ञान-संश्लेषण एवं पुनरावलोकन सत्र’ में भी श्री राजगोपाल प्रमुख वक्ताओं में रहे। यहां संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका और उसकी व्यवस्थाओं पर चर्चा के साथ वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में गांधी के सत्य, अहिंसा, शांति, स्वावलंबन और मानवीय दृष्टिकोण की प्रासंगिकता पर मंथन हुआ। सेमिनार के दूसरे दिन छह तकनीकी सत्रों में 100 से अधिक शोध आलेख प्रस्तुत किए गए। चार ऑफलाइन और दो ऑनलाइन सत्रों में देश-विदेश के विश्वविद्यालयों और संस्थानों से जुड़े शिक्षकों, शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों ने शोध पत्र प्रस्तुत किए। सेमिनार के लिए छह प्रमुख विषयों पर 450 से अधिक शोध आलेख प्राप्त हुए हैं। शोध आलेखों के आधार पर ‘गांधी स्मृति : समसामयिक परिप्रेक्ष्य’ शीर्षक पुस्तक भी तैयार की गई। ‘आत्मकथा : सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ विषयक सत्र में डॉ. मिथिलेश तिवारी ने कहा कि गांधी ने अपनी उपलब्धियों के साथ अपनी कमजोरियों और कमियों को भी आत्मकथा में ईमानदारी से स्वीकार किया। वहीं ‘सामाजिक संगठन/संस्थाएं : चुनौतियां एवं संभावनाएं’ विषयक सत्र में 20 से अधिक शिक्षकों और शोधार्थियों ने शोध प्रस्तुत किए। गांधी जयंती की पूर्व संध्या पर शाम 6:30 बजे परिसर में दीप यज्ञ आयोजित किया गया, जिसमें एक हजार से अधिक मिट्टी के दीप प्रज्वलित किए गए।



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