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नई दिल्ली। दुनिया आज जिस दौर से गुजर रही है, उसमें गांधी को याद करना केवल किसी महापुरुष की स्मृति को जीवित रखना नहीं बल्कि अपने समय की जटिल समस्याओं के बीच कुछ बुनियादी सवालों की ओर लौटना है। युद्ध और हिंसा, धार्मिक कट्टरता, आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, महंगाई, पर्यावरण संकट, सामाजिक तनाव और नैतिक मूल्यों के क्षरण ने मनुष्य को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां विकास और विनाश के बीच अंतर करना लगातार कठिन होता जा रहा है। ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या गांधी के सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, अपरिग्रह, ग्राम स्वराज और सर्वधर्म समभाव जैसे विचार आज भी प्रासंगिक हैं? हमारे समय का आईना दरअसल, गांधी की प्रासंगिकता का प्रश्न जितना गांधी के बारे में है, उससे कहीं अधिक हमारे समय के बारे में है। जिस दुनिया में हिंसा समस्याओं का समाधान करने के बजाय उन्हें और जटिल बना रही हो, जहां आर्थिक विकास के बावजूद विषमता बढ़ रही हो और जहां तकनीकी प्रगति के बीच मनुष्य का अकेलापन और असुरक्षा बढ़ रही हो, वहां गांधी का चिंतन एक वैकल्पिक नैतिक दृष्टि उपलब्ध कराता है। गांधी को केवल स्वतंत्रता आंदोलन के नेता या भारतीय राजनीति के एक अध्याय के रूप में देखना उनके व्यापक व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। वे राजनीतिक नेता होने के साथ-साथ विचारक, चिंतक, समाज-सुधारक और अर्थचिंतक भी थे। उनका चिंतन मनुष्य और समाज के बीच संबंधों को केंद्र में रखता था। उनके लिए राजनीति सत्ता प्राप्त करने का माध्यम मात्र नहीं थी; राजनीति का अंतिम उद्देश्य मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाना था। गांधी का सत्य और अहिंसा का सिद्धांत इसी व्यापक मानवीय दृष्टि से जुड़ा था। अहिंसा उनके लिए केवल हिंसा न करने का नाम नहीं थी, बल्कि दूसरे मनुष्य के अस्तित्व, सम्मान और अधिकार को स्वीकार करने की जीवन-पद्धति थी। आज जब असहमति को संघर्ष और संवाद को टकराव में बदल देने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, तब गांधी का आग्रह विरोधी को समाप्त करने के बजाय उसके साथ संवाद करने का विशेष महत्व रखता है। अर्थव्यवस्था का गांधीवादी विकल्प गांधी की आर्थिक दृष्टि भी आज के दौर में गंभीर पुनर्विचार की मांग करती है। वैश्वीकरण ने दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को एक-दूसरे से जोड़ दिया है। पूंजी, तकनीक और बाजार की सीमाएं तेजी से समाप्त हुई हैं। इसके सकारात्मक परिणाम भी हैं, लेकिन इसके साथ आर्थिक असमानता, संसाधनों के अत्यधिक दोहन और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के कमजोर होने जैसी चुनौतियां भी सामने आई हैं। गांधी का स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का विचार ऐसे ही संदर्भ में नए अर्थ ग्रहण करता है। गांधी अंधाधुंध उपभोग के समर्थक नहीं थे। उनका आग्रह था कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच अंतर समझे। आज जब अधिकाधिक उपभोग को ही आर्थिक प्रगति का पर्याय बना दिया गया है, गांधी का अपरिग्रह हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि पृथ्वी के सीमित संसाधनों पर असीमित उपभोग का दबाव आखिर कब तक कायम रह सकता है। ग्राम स्वराज का सपना इसी तरह उनका ग्राम स्वराज केवल गांवों को प्रशासनिक इकाई के रूप में देखने का विचार नहीं था। वे ऐसे गांव की कल्पना करते थे जो आर्थिक रूप से सक्षम, सामाजिक रूप से सहयोगी और अपने आवश्यक संसाधनों के लिए अत्यधिक निर्भर न हो। उनका जोर विकेंद्रीकरण, स्थानीय उत्पादन और स्थानीय रोजगार पर था। बड़े पैमाने पर उत्पादन के स्थान पर वे ऐसी उत्पादन-व्यवस्था को महत्व देते थे जिसमें उत्पादन के साथ उत्पादक मनुष्य भी केंद्र में रहे। आज जब महानगरों का विस्तार विकास का प्रमुख पैमाना बन गया है, गांधी का यह सवाल महत्वपूर्ण हो उठता है कि क्या कुछ बड़े शहरों का विकास करोड़ों लोगों की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं का समाधान कर सकता है? शहरों की चमक के पीछे गांवों से लगातार हो रहा पलायन, कृषि संकट, बेरोजगारी और असंगठित श्रम की असुरक्षा भी दिखाई देती है। श्रमिकों की असुरक्षा प्रवासी श्रमिकों के अनुभव ने इस विरोधाभास को और स्पष्ट किया। जिन श्रमिकों ने महानगरों की इमारतें खड़ी कीं, सड़कों और पुलों का निर्माण किया और शहरों की अर्थव्यवस्था को गति दी, संकट के समय वही श्रमिक सबसे अधिक असुरक्षित दिखाई दिए। इस अनुभव ने विकास के उस मॉडल पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं, जिसमें श्रमिक शहर के लिए आवश्यक तो है, लेकिन शहर उसके जीवन की सुरक्षा और गरिमा की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं दिखता। गांधी का आर्थिक चिंतन इसलिए केवल उत्पादन बढ़ाने की बात नहीं करता। उसमें रोजगार, श्रम की गरिमा, स्थानीय अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भरता और मानवीय आवश्यकताओं का संतुलन शामिल है। उनका मानना था कि ऐसी अर्थव्यवस्था का कोई अर्थ नहीं जिसमें उत्पादन तो बढ़ता जाए, लेकिन मनुष्य की गरिमा घटती जाए। प्रकृति के साथ संतुलन पर्यावरण के प्रश्न पर भी गांधी का चिंतन आज विशेष रूप से प्रासंगिक दिखाई देता है। प्रकृति को केवल संसाधन मानकर उसके अंधाधुंध दोहन की प्रवृत्ति ने जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट और जैव-विविधता के क्षरण जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म दिया है। गांधी की जीवन-दृष्टि संयमित उपभोग और प्रकृति के साथ संतुलित संबंध पर आधारित थी। उनका चिंतन आज के पर्यावरणीय विमर्श को यह याद दिलाता है कि विकास का उद्देश्य केवल अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग नहीं हो सकता। साम्प्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता के दौर में गांधी का सर्वधर्म समभाव भी महत्वपूर्ण हो उठता है। वे धर्म को विभाजन का आधार बनाने के बजाय नैतिकता और आत्मानुशासन का माध्यम मानते थे। उनके लिए विभिन्न धर्मों के बीच सह-अस्तित्व केवल राजनीतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सभ्यता की बुनियादी शर्त थी। आज जब धार्मिक पहचानें अनेक बार सामाजिक तनाव का कारण बनती हैं, गांधी का संवाद, सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान का आग्रह लोकतांत्रिक समाज के लिए उपयोगी संदर्भ प्रस्तुत करता है। शांति की बुनियाद दुनिया में स्थायी शांति केवल हथियारों की संख्या घटाने से संभव नहीं होगी। इसके लिए आर्थिक और सामाजिक न्याय भी जरूरी है। गरीबी, भुखमरी, निरक्षरता, बेरोजगारी और आर्थिक विषमता से जूझते समाजों में असंतोष और अस्थिरता की संभावनाएं बनी रहती हैं। गांधी का चिंतन इसी कारण राजनीतिक स्वतंत्रता को सामाजिक और आर्थिक न्याय से अलग करके नहीं देखता। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न नैतिकता का है। सार्वजनिक जीवन में जब साधन और साध्य के बीच का संबंध कमजोर पड़ने लगे, तब गांधी की राजनीति हमें फिर याद आती है। गांधी के लिए साध्य जितना महत्वपूर्ण था, साधन भी उतना ही महत्वपूर्ण था। वे मानते थे कि गलत साधनों से प्राप्त सही लक्ष्य भी अंततः समाज के लिए संकट पैदा कर सकता है। आज राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है। ऐसे समय में गांधी का जीवन यह प्रश्न सामने रखता है कि क्या सार्वजनिक जीवन केवल सत्ता, सफलता और उपलब्धि का नाम है, या उसमें नैतिक उत्तरदायित्व भी शामिल होना चाहिए? विचार और जीवन का संगम गांधी की सबसे बड़ी शक्ति शायद यही थी कि उन्होंने अपने विचारों को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया। इसलिए गांधी को समझने के लिए केवल उनके राजनीतिक निर्णयों को देखना पर्याप्त नहीं है; उनके प्रयोगों, असफलताओं, आत्मालोचन और जीवन-पद्धति को भी समझना होगा। गांधी से असहमति हो सकती है। उनके विचारों की आलोचना भी हो सकती है और होनी भी चाहिए। किसी भी विचारक को आलोचना से परे रख देना उसके विचारों को जीवंत नहीं, बल्कि जड़ बना देता है। लेकिन गांधी को अप्रासंगिक मानकर खारिज कर देना शायद उस गहरे मानवीय संकट को नजरअंदाज करना होगा जिसका सामना आज पूरी दुनिया कर रही है। एक वैकल्पिक दृष्टि गांधी की प्रासंगिकता इस बात में नहीं है कि आज की हर समस्या का कोई तैयार समाधान उनके पास मौजूद था। उनकी प्रासंगिकता इस बात में है कि वे हमें समस्याओं को देखने की एक अलग दृष्टि देते हैं। हिंसा के स्थान पर अहिंसा, घृणा के स्थान पर संवाद, असीमित उपभोग के स्थान पर संयम, केंद्रीकरण के स्थान पर विकेंद्रीकरण, निर्भरता के स्थान पर आत्मनिर्भरता और सत्ता-केंद्रित राजनीति के स्थान पर नैतिक राजनीति की दृष्टि। इसीलिए गांधी को संग्रहालय में रखी हुई किसी पुरानी स्मृति की तरह नहीं, बल्कि निरंतर संवाद के विषय के रूप में देखना होगा। बदलती दुनिया में गांधी के विचारों की उपयोगिता अपरिहार्य हैं! गांधी की बढ़ती जरूरत वैश्विक स्तर पर व्याप्त हिंसा, मतभेद, बेरोजगारी, महंगाई तथा तनावपूर्ण वातावरण में आज बार-बार यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि गांधी के सत्य व अहिंसा पर आधारित दर्शन और विचारों की आज कितनी प्रासंगिकता महसूस की जा रही है। यूं तो गांधीवाद का विरोध करने वालों ने जिनमें दुर्भाग्यवश और किसी देश के लोग नहीं बल्कि अधिकांशतय: केवल भारतवासी ही शामिल हैं, ने गांधी के विचारों की प्रासंगिकता को तब भी महसूस नहीं किया था जबकि वे जीवित थे। गांधी से असहमति के इसी उन्माद ने उनकी हत्या तो कर दी परन्तु आज गांधी के विचारों से मतभेद रखने वाली उन्हीं शक्तियों को भली-भांति यह महसूस होने लगा है कि गांधी अपने विरोधियों के लिए दरअसल जीते जी उतने हानिकारक नहीं थे जितना कि हत्या के बाद साबित हो रहे हैं। और इसकी वजह केवल यही है कि जैसे-जैसे विश्व हिंसा, आर्थिक मंदी, भूख, बेरोजगारी और नफरत जैसे तमाम हालात में उलझता जा रहा है, वैसे-वैसे दुनिया को न केवल गांधी के दर्शन याद आ रहे हैं बल्कि गांधीदर्शन को आत्मसात करने की आवश्यकता भी बड़ी शिद्दत से महसूस की जाने लगी है। सीमाओं से परे विचार गांधी एक विचारक, चिंतक, अर्थशास्त्री के साथ ही मानवता के प्रकाश-स्तम्भ, युगात्मा, युगदृष्टा और प्रेरणा स्रोत हैं। उनके विचार देश-काल में सीमित न होकर सीमाओं से परे है। आज उदारीकरण के प्रभाव से दुनिया के सभी देशों की अर्थव्यवस्था एक दूसरे से जुड़ी हुई है। इस तरह के माहौल में अपने देश के हितों की रक्षा गांधीवादी मूल्यों से ही सम्भव है। ग्लोबल विलेज और अधिकाधिक लाभ कमाने की संस्कृति में गांधी के अपरिग्रह का पालन उत्तम है। साम्प्रदायिकता कट्टरता और आतंकवाद के दौर में गांधी का धार्मिक सदभाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पर्यावरण के मुद्दे पर गांधी सजग नजर आते हैं, उनका मानना है कि अंधाधुंध शहरीकरण हमारे वातावरण को दूषित कर रहा है। वह कुशल और आत्मनिर्भर गांवों की स्थापना की बात करते हैं। वे स्वदेशी को प्राथमिकता देते थे, उनका मानना था कि स्वदेशी से हमारा देश आत्मनिर्भर बन सकता है। न्याय से ही शांति दुनिया में शांति और सद्भाव बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है की विभिन्न देशों की आर्थिक असमानता और असन्तु्लन को कम किया जाय। कई देशों में गरीबी, निरक्षरता, भुखमरी, कुपोषण और आर्थिक विषमता दिखाई देती है जो औपनिवेशिक शोषण का नतीजा है। इन देशों के हालातों में अगर सुधार नहीं किया गया तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक असन्तुलन पैदा होगा जो अशांति की वजह बन सकता है। आज के हिंसात्मक माहौल में न्याय, स्वतत्रता, समानता और भाईचारे की भावनाओं पर आधारित एक धर्मनिरपेक्ष तथा लोकतांत्रिक राष्ट्र अपना अस्तित्व कायम रख सकता है? विकास मॉडल पर पुनर्विचार हाल की महामारी ने हमारी आंखों को वास्तविकताओं से परिचित कराया है। शहर और शहरी क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक असुरक्षित हैं। हमारा विकास मॉडल मौलिक रूप से कैसे गलत है। इस संदर्भ में, हम गांधी द्वारा प्रस्तावित विकास के विचारों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर हैं। उनका आर्थिक दर्शन स्थिर नहीं, बल्कि जीवंत और व्यापक रहा है। यह तकनीक केंद्रित नहीं है, बल्कि जन केंद्रित है। मुट्ठी भर शहरों का विकास हमारी आर्थिक समस्याओं को हल नहीं कर सकता है। वास्तव में यह हमारी समस्याओं को और बढ़ाएगा। इसलिए गांधी ने गांवों के आर्थिक विकास पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। बड़े पैमाने पर उत्पादन की बजाय, उन्होंने छोटे पैमाने पर उत्पादन का सुझाव दिया। केंद्रीकृत उद्योगों के बजाय, उन्होंने विकेंद्रीकृत छोटे उद्योगों का सुझाव दिया। बड़े पैमाने पर उत्पादन केवल उत्पाद से संबंधित होता है, जबकि जनता द्वारा उत्पादन का संबंध उत्पाद के साथ-साथ उत्पादकों से भी है और इसमें शामिल प्रक्रिया से भी है। उनका एक आदर्श गांव का सपना था। बड़े पैमाने पर उत्पादन से लोग अपने गांव, अपनी जमीन, अपने शिल्प को छोड़कर कारखानों में काम करने पर मजबूर हो जाते हैं। गरिमामय जिंदगी और एक स्वाभिमानी ग्राम समुदाय के सदस्यों के बजाय, लोग मशीन के चक्रव्यू में फंस कर रह जाते हैं और मालिकों की दया पर जिंदगी गुजरबसर करने लगते हैं। मनुष्यता को केंद्र में मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने गांधी के प्रभाव को मानवता की प्रगति और शांति की खोज से जोड़ा था। यह बात आज और भी महत्वपूर्ण लगती है। जब हिंसा को शक्ति और उपभोग को विकास का पर्याय मानने का दबाव बढ़ रहा हो, तब गांधी हमें मनुष्य और मनुष्यता को केंद्र में रखने की याद दिलाते हैं इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि गांधी आज कितने प्रासंगिक हैं। असली सवाल यह है कि क्या हिंसा, असमानता, अतिउपभोग, पर्यावरण संकट और नैतिक विघटन से घिरी दुनिया गांधी की मानवीय चेतना के बिना अपने भविष्य की कल्पना कर सकती है? शायद इसी प्रश्न के भीतर गांधी की सबसे बड़ी प्रासंगिकता छिपी हुई है। गांधी को मानना आवश्यक नहीं, लेकिन गांधी के सवालों से बचना कठिन है। (लेखक, तेज नारायण बनैली महाविद्यालय भागलपुर में इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष हैं)



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