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मोतिहारी। चंपारण की मिट्टी में पले-बढ़े सुरों ने जब वायलिन के तारों पर अंगड़ाई ली तो उनकी गूंज गांव की गलियों से निकलकर देश-दुनिया के संगीत मंचों तक पहुंच गई.... यह कहानी है सुरों से मोहब्बत, संगीत की अनवरत साधना और समर्पण से गढ़ी गई एक ऐसी पहचान की, जिसने बिहार की धरती को गौरवान्वित किया है। पूर्वी चंपारण जिले के कोटवा थाना क्षेत्र के तलवा पोखर गांव से ताल्लुक रखने वाले और बेतिया में जन्मे हिंदुस्तानी शास्त्रीय वायलिन वादक एवं संगीतकार डॉ. रंजन कुमार ने वायलिन को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। तीन दशकों से अधिक समय से उनकी उंगलियां वायलिन के तारों पर सुरों की ऐसी दुनिया रच रही हैं, जिसकी गूंज भारतीय संगीत परंपरा को राष्ट्रीय मंचों से लेकर अंतरराष्ट्रीय फलक तक पहुंचा रही है। उनकी उपलब्धियों का उल्लेखनीय पड़ाव वर्ष 2019 में सामने आया, जब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से जाम्बिया के तत्कालीन राष्ट्रपति एडगर सी. लुंगु के सम्मान में आयोजित विशेष संगीत कार्यक्रम में वायलिन वादन किया। उनके उपलब्ध परिचय के अनुसार, प्रस्तुति के बाद प्रधानमंत्री श्री मोदी और राष्ट्रपति लुंगु ने आगे आकर उन्हें सम्मानित किया। जनवरी 2026 में भारत-यूरोपीय संघ की उच्चस्तरीय सहभागिता के दौरान सांस्कृतिक प्रतिनिधि के रूप में उनकी भागीदारी ने भी उनकी सांगीतिक यात्रा को अंतरराष्ट्रीय संदर्भ प्रदान किया। उस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन उपस्थित थे। गायकी के भावों को वायलिन पर उतारने की विशिष्ट शैली डॉ. रंजन कुमार की पहचान केवल मंचीय प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं है। उनके वादन में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की बारीकियों के साथ गायकी अंग की विशेषताएं दिखाई देती हैं। इस शैली में वायलिन के स्वरों के माध्यम से गायन की भावात्मक गहराई, स्वर-विस्तार और सूक्ष्म उतार-चढ़ाव को अभिव्यक्त किया जाता है। उनकी संगीत साधना को पंडित टी. एम. पटनायक, पद्म भूषण डॉ. एम. एस. गोपालकृष्णन और डॉ. श्रीराम परसुराम जैसे प्रतिष्ठित गुरुओं का मार्गदर्शन मिला है। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के श्रेणीबद्ध कलाकार होने के साथ वह भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद और संगीत नाटक अकादमी के सूचीबद्ध कलाकार भी हैं। भारत के अलावा इंग्लैंड, फ्रांस, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, नेपाल और लक्जमबर्ग में उनकी सांगीतिक प्रस्तुतियां हो चुकी हैं। ‘संवाद’ से शास्त्रीय वाद्ययंत्रों के बीच संगीतात्मक प्रयोग डॉ. कुमार की सांगीतिक यात्रा में प्रयोगधर्मिता का भी स्थान है। वर्ष 2011 से 2013 के दौरान उनकी संगीत परियोजना ‘संवाद’ को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से उत्पादन अनुदान मिला। इस परियोजना के माध्यम से विभिन्न भारतीय शास्त्रीय वाद्ययंत्रों के बीच संगीतात्मक संवाद और पारस्परिक अभिव्यक्ति की संभावनाओं को सामने लाने का प्रयास किया गया। बिहार सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा कार्य विभाग ने वर्ष 2003 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ कलाकार के रूप में सम्मानित किया था। वर्ष 2006 में संगीत नाटक अकादमी के एक विशेष आयोजन में उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी उन्हें सम्मानित किया। वर्ष 2022 में ‘विदुषी महादेवी वर्मा स्मृति सम्मान’ और वर्ष 2025 में ‘इंटरनेशनल जे. पी. अवॉर्ड’ सहित उन्हें कई सम्मान मिलने की जानकारी उनके परिचय में दी गई है। ‘संगीत कला रत्न’, ‘कला प्रतिभा सम्मान’ और ‘राष्ट्रीय कला सम्मान’ भी उनके नाम से जुड़े सम्मानों में शामिल हैं। संगीत की प्रतिष्ठित हस्तियों के बीच पहचान प्रख्यात गजल गायक उस्ताद गुलाम अली ने भी डॉ. रंजन कुमार को सम्मानित किया है। संगीतविद् पद्मश्री गजेन्द्र नारायण सिंह की पुस्तकों ‘सुरीले लोगों की संगत’ और ‘संगीत परंपरा’ में भी उनकी संगीत प्रस्तुतियों एवं व्यावसायिक गतिविधियों का उल्लेख होने की जानकारी दी गई है। बेतिया, पटना और चेन्नई में शिक्षा तथा सांगीतिक प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले डॉ. कुमार वर्तमान में दिल्ली और पुणे-मुंबई में रहते हैं। उनके पिता स्वर्गीय महेश प्रसाद सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में अधिकारी थे जबकि उनकी माता मीना प्रसाद इसी बैंक से सेवानिवृत्त हुईं। उनके एक छोटे भाई डॉ. राकेश कुमार वर्मा दिल्ली में हृदय रोग विशेषज्ञ हैं और दूसरे भाई रितेश कुमार कनाडा के टोरंटो में मीडिया क्षेत्र से जुड़े हैं। चंपारण की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी उपलब्धि डॉ. रंजन कुमार की यात्रा इस बात का उदाहरण है कि शास्त्रीय संगीत की साधना किस तरह क्षेत्रीय सांस्कृतिक जड़ों को व्यापक पहचान से जोड़ सकती है। तलवा पोखर से जुड़ी उनकी पारिवारिक जड़ें, प्रतिष्ठित गुरुओं से मिला प्रशिक्षण और देश-विदेश के मंचों पर उनकी सक्रियता चंपारण की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान देने वाली उपलब्धियों में शामिल हैं। तीन दशकों से अधिक की उनकी साधना भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को आगे बढ़ाने के निरंतर प्रयास की कहानी कहती है।



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