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मोतिहारी। कुछ लोग अपनी जन्मभूमि से दूर जाकर पहचान बनाते हैं लेकिन उनकी आत्मा में अपनी मिट्टी की गंध हमेशा जीवित रहती है। पूर्वी चम्पारण के ढाका की धरती से निकलकर हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले गीतकार कौशल किशोर की कहानी भी इसी आत्मीय जुड़ाव की कहानी है। बॉलीवुड की चकाचौंध के बीच अपनी सादगी, संवेदनशील लेखनी और सांस्कृतिक जड़ों से रिश्ता बनाए रखने वाले कौशल ने अपना जन्मदिन अपनी जन्मभूमि मोतिहारी में सादगीपूर्ण ढंग से मनाया और पत्रकारों से रू-ब-रू हुए। इस अवसर पर उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय चम्पारण की ऊर्जावान मिट्टी और अपने माता-पिता को दिया। उन्होंने कहा कि यह तो अभी शुरुआत है। मंजिलें अभी और भी हैं, जिन्हें शुभचिंतकों की दुआओं और आशीर्वाद से हासिल करना है। उनके इन शब्दों में सफलता का उत्साह तो था ही, उस कलाकार की विनम्रता भी थी, जो अपनी उपलब्धियों के बीच अपनी जड़ों को नहीं भूलता। इसी मुलाकात में कौशल किशोर ने बॉलीवुड के महान कलाकार नाना पाटेकर के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि नाना पाटेकर एक महान कलाकार थे, जिनके जीवन और कला-साधना में भारतभूमि की मिट्टी की ऐसी खुशबू थी, जो सदैव लोगों के दिलों में बसी रहेगी। उनके शब्दों में एक ऐसे कलाकार के प्रति सम्मान और संवेदना झलकी, जिसकी कला ने दर्शकों के मन पर गहरी छाप छोड़ी। ‘कंधार’ से ‘टॉक्सिक’ तक, संघर्ष से सफलता का सफर सिकरहना अनुमंडल मुख्यालय ढाका के प्रतिष्ठित समाजसेवी पुष्पा किशोर और किशोर कुमार के पुत्र कौशल किशोर ने वर्ष 2010 में फिल्म ‘कंधार’ से बॉलीवुड में अपने गीतकार सफर की शुरुआत की थी। मुंबई में पहचान बनाने की राह आसान नहीं थी। वर्षों तक उन्होंने संघर्ष किया, अपने शब्दों को अनुभवों की आंच में तपाया और भावनाओं को गीतों में ढालने की अपनी शैली विकसित की। वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के कठिन दौर में विशाल मिश्रा के संगीत निर्देशन में तैयार ‘मुस्कुराएगा इंडिया’ ने उनकी लेखनी को देशभर में पहचान दिलाई। निराशा और अनिश्चितता के बीच उम्मीद का संदेश देने वाले इस गीत की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सराहना की थी। यह गीत कौशल किशोर के करियर का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ और विशाल मिश्रा के साथ उनकी रचनात्मक साझेदारी को नई ऊंचाई मिली। इसके बाद ‘आज भी’ और ‘आज भी 2’ जैसे लोकप्रिय गैर-फिल्मी गीतों के साथ ‘मिशन रानीगंज’ का ‘कीमती’ और ‘योद्धा’ का ‘जिंदगी तेरे नाम’ जैसे फिल्मी गीतों ने उनकी पहचान को और मजबूत किया। अब फिल्म ‘टॉक्सिक’ के ‘वक्त’ और ‘वक्त (सोल वर्जन)’ गीतों के जरिए उनकी लेखनी एक नए पड़ाव पर है। इन गीतों को विशाल मिश्रा ने अपनी आवाज और संगीत से सजाया है। वक्त, रिश्तों और भावनाओं के बीच शब्दों की भूमिका को उकेरने वाली उनकी शैली ने उन्हें समकालीन हिंदी फिल्म संगीत के सक्रिय गीतकारों में जगह दिलाई है। फिल्मी गीतों में भावनाओं की दुनिया कौशल किशोर की लेखनी का दायरा केवल एक तरह के गीतों तक सीमित नहीं है। फिल्म ‘हक’ के ‘दिल तोड़ गया तू’, ‘हक है मेरा’ और ‘कुबूल’ जैसे गीतों में उन्होंने प्रेम, बिछोह और रिश्तों की जटिलताओं को शब्द दिए। उनके लोकप्रिय गीत ‘आखिर’ के लिए उन्हें ‘लिरिसिस्ट ऑफ द ईयर’ सम्मान भी मिल चुका है। उन्होंने जीत गांगुली, राघव सचर, बापी-टुटुल, समीर टंडन और विशाल मिश्रा जैसे संगीतकारों के साथ काम किया है। वहीं, अरिजीत सिंह, कैलाश खेर, जुबिन नौटियाल, मीका सिंह, शान और मोहित चौहान जैसे प्रसिद्ध गायकों के लिए गीत लिखकर अपनी रचनात्मक बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया है। उनकी लेखनी की विशेषता सहज शब्दों में गहरी अनुभूति व्यक्त करना है। उनके गीतों में प्रेम की कोमलता, विरह की टीस, जीवन की उम्मीद और मानवीय संवेदनाओं के कई रंग दिखाई देते हैं। बॉलीवुड की फिल्म में पहली बार छठी मैया का गीत अपनी जन्मभूमि और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े कौशल किशोर ने छठ महापर्व को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने अपनी फिल्म "द वन" की चर्चा करते हुए बताया कि पहली बार बॉलीवुड की किसी फिल्म में छठी मैया से जुड़ा गीत (छठी मईया सुन ली ना विनती हमार) शामिल किया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि दुर्गापूजा के अवसर पर उनका एक नया गीत आने वाला है।छठ जैसे लोकआस्था के महापर्व को फिल्मी संगीत के माध्यम से व्यापक मंच तक पहुंचाने की यह पहल बिहार की सांस्कृतिक पहचान के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। कौशल किशोर की रचनात्मक यात्रा में लोकविश्वास और आधुनिक संगीत का यह मेल उनकी मिट्टी से आत्मीयता को रेखांकित करता है। विशाल मिश्रा के साथ उनका छठ गीत ‘छठी मैया बुलाये’ भी इसी सांस्कृतिक जुड़ाव का उदाहरण है। फिल्मी गीतों की दुनिया में सक्रिय रहते हुए अपनी लोकपरंपराओं के लिए जगह बनाना उनकी रचनात्मक पहचान का अहम पक्ष है। अपनी मिट्टी से जुड़ाव ही असली पहचान कौशल किशोर की कहानी केवल एक गीतकार की सफलता का वृत्तांत नहीं, बल्कि छोटे शहर से निकलकर बड़े मंच तक पहुंचने वाले उस सपने की कहानी है, जिसकी जड़ें अपनी जमीन में गहरी होती हैं। चम्पारण की मिट्टी ने उन्हें संस्कार दिए, परिवार ने संबल दिया और संघर्ष ने उनकी लेखनी को अनुभवों की गहराई दी। जन्मदिन पर अपनी जन्मभूमि लौटना और उपलब्धियों के बीच सादगी बनाए रखना उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को सामने लाता है, जो चमक-दमक से अधिक रिश्तों और जड़ों को महत्व देता है। कौशल किशोर के लिए मोतिहारी केवल जन्मस्थान नहीं, बल्कि उस रचनात्मक यात्रा का आधार है, जहां से उनके सपनों ने उड़ान भरी। उनके शब्दों में अभी बहुत-सी मंजिलें बाकी हैं। ऐसे में चम्पारण की मिट्टी से निकली यह कलम आने वाले दिनों में किन नई कहानियों को गीतों में ढालेगी, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल, ‘मुस्कुराएगा इंडिया’ से ‘वक्त’ तक का उनका सफर इस बात की गवाही देता है कि जब शब्दों में संवेदना और मन में अपनी मिट्टी के प्रति सम्मान हो, तो स्थानीय पहचान भी राष्ट्रीय फलक पर अपनी जगह बना सकती है।



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