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पटना। द्वारिका नदी की लहरों के किनारे श्मशान की रहस्यमयी निस्तब्धता के बीच आस्था की एक ऐसी ज्योति सदियों से जगमगा रही है, जहां भक्तों को मां की ममता का भरोसा मिलता है और साधकों को शक्ति की साधना का संबल। यह है पश्चिम बंगाल का तारापीठ, जहां काली स्वरूपा आद्या शक्ति मां तारा के चरणों में श्रद्धा, भक्ति और तंत्र साधना का अनूठा संगम दिखाई देता है। मान्यता है कि इस जाग्रत शक्तिपीठ में मां अपने भक्तों की पुकार सुनती हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य, आरोग्य और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी के दर्शन की आस लिए बिहार, बंगाल, झारखंड समेत देश के कोने-कोने से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। कोई मन में उम्मीदों का दीप जलाए आता है तो कोई अपनी पीड़ा लेकर मां के दरबार में सिर झुकाता है। विश्वास ऐसा कि श्मशान की निस्तब्धता भी यहां भय नहीं, बल्कि मां के स्नेह, शक्ति और संरक्षण का एहसास कराती है। द्वारिका नदी के तट पर बसा तारापीठ तारापीठ बंगाल का एक प्रमुख शक्ति-स्थल है, जो पटना-हावड़ा लूप रेल-लाईन पर झारखंड-बंगाल की सीमा पर रामपुर हाट स्टेशन (बीरभूम जिला, पश्चिम बंगाल) से करीब आठ किलोमीटर दूर द्वारिका नदी के तट पर स्थित है। यहां से कोलकाता 213 किलोमीटर और पटना (वाया जमालपुर-भागलपुर) 389 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भागलपुर (बिहार) से भी वाया दुमका होकर यह रेल मार्ग से जुड़ा हुआ है। रेल के अलावा यहां सड़क मार्ग से भी देश के किसी कोने से पहुंचा जा सकता है। त्रयोदशी पर उमड़ता आस्था का सैलाब पूर्वोत्तर भारत के इस सुप्रसिद्ध पीठ में आम दिनों में प्रतिदिन करीब 20 हजार से ऊपर श्रद्धालु आते हैं। दुर्गा पूजा के दिनों में यहां खास चहल-पहल रहती है जब यहां आनेवालों की संख्या 50 हजार तक पहुंच जाती है। त्रयोदशी के दिन मां तारा का विशिष्ट पूजा-अनुष्ठान होता है जिसमें शरीक होने के लिये अनुमानतः 3 लाख लोग आते हैं। देवी के नेत्रों से जुड़ी शक्तिपीठ की कथा शक्तिपीठ तारापीठ के बारे में ऐसी मान्यता है कि यहां देवी की आंखों के तारे गिरे थे, जिसकी कथा दक्ष प्रजापति के यज्ञ और माता पार्वती के हवनकुंड में दाह से जुड़ी है। जब पिता दक्ष द्वारा अपने पति शंकर की अवहेलना से व्यथित पार्वती ने हवन-कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया और इससे उन्मत्त होकर शिव उनके शव को लेकर तीनों लोक में फिरने लगे तो भगवान विष्णु ने श्रृष्टि के नियमों की रक्षा के लिए देवी के शव को सुदर्शन चक्र से काट डाले, जिसके 51 टुकड़े होकर अलग-अलग 51 स्थानों में गिरे जिनकी मान्यता 51 शक्तिपीठों में हुई। तारापीठ में देवी की आंखों के तारे गिरे थे, इस कारण इसकी प्रसिद्धि तारापीठ के नाम से हुई। ऐसी एक मान्यता यह भी है कि यह स्थल बिहार के महेशी में है। दश महाविद्याओं में देवी तारा का स्थान देवी तारा की गणना दश महाविद्याओं में होती है, जो शक्ति के रूप में देवी का तांत्रिक अवतार मानी जाती हैं जिनका निवास-स्थान श्मशान होता है। अपने भक्तों की आराधना एवं तंत्र साधकों की साधना से देवी शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं। देवी तारा के आविर्भाव के संबंध में 'कालिका पुराण' में वर्णित है कि शुंभ और निशुंभ दानवों से पराजय के बाद जब देवतागण हिमालय में जाकर देवी मातंगी का आह्वान करने लगे तो देवी के शरीर से महासरस्वती स्वरूप श्वेत वरण वाली कौशिकी के साथ काले वरण वाली काली अथवा उग्रतारा प्रकट हुई थीं। देवी तारा नील वरण की चार भुजाओं वाली होती हैं तथा वे तलवार, खप्पर, कटार और नील कमल धारण करती हैं। मां तारा के आठ दिव्य स्वरूप धार्मिक ग्रंथों में करुणामयी तथा कल्याणमयी तारा मां के आठ रूपों की चर्चा है, जो उग्रतारा, नील सरस्वती, एकजटा भवानी, महोग्रा, कामेश्वरी, चामुण्डा, वज्र और भद्रकाली आदि नामों से भी जानी जाती हैं। वशिष्ठ मुनि द्वारा पूजित होने के कारण मां का एक नाम वशिष्ठ आराधित तारा भी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वशिष्ठ मुनि ने तारा मंदिर के निकट द्वारिका नदी के तट पर स्थित श्मशान में तारा मां की आराधना की थी जिसके कारण ये वशिष्ट आराधित तारा के नाम से भी जानी जाती हैं। डेविड आर. किंसले कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से प्रकाशित अपनी पुस्तक 'तांत्रिक विज़न ऑफ द डिवाइन फेमिनिन:द टेन महाविद्यास' में बताते हैं कि स्थानीय परम्परा के अनुसार मुनि वशिष्ठ ने इस स्थान को इस कारण अपनी साधना के लिये चुना क्योंकि इसकी प्रसिद्धि सिद्ध पीठ के रूप में थी। तीन लाख मंत्रों के जाप और मातृरूप में दर्शन की कथा किंसले बताते हैं कि वशिष्ट मुनि ने यहां कठोर तपस्या करते हुए तीन लाख तारा मंत्रों के जाप किये थे, जिससे प्रसन्न होकर देवी तारा उनके समक्ष प्रकट हुई। वशिष्ठ के अनुरोध पर देवी ने उन्हें भगवान शिव को दुग्ध-पान कराते हुए मातृ स्वरूप में दर्शन दिये जिसके बाद वे शिलामूर्ति में परिवर्तित हो गईं। बाद में द्वारिका नदी के तट पर स्थित श्मशान, जहां वशिष्ट मुनि ने तपस्या की थी, से प्राप्त तारा मां की इस शिलामयी प्रस्तर मूर्ति को मुख्य तारा मंदिर में लाकर प्रतिष्ठित किया गया है। इसके ऊपर देवी की चांदी की मुखाकृति आवेष्ठित कर दी गई है, जिसका दर्शन-पूजन श्रद्धालुगण करते हैं। प्रतिदिन देर रात्रि में भक्तों को देवी तारा के शिलारुप का दर्शन कराया जाता है। जब मां ने शिव को कराया दुग्धपान देवी के द्वारा मातृरूप में भगवान शिव के दुग्धपान कराने का प्रसंग देवताओं और दानवों द्वारा किये गये पौराणिक समुद्र मंथन की घटना से जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि समुद्र मंथन से निकले विष का पान करने से जब उसकी ज्वाला से भगवान शंकर विह्वल हो उठे तो देवी पार्वती ने उनको मातृस्वरूप धारण कर दुग्धपान कराया था, जिसके बाद उनके कंठ की ज्वाला शांत हुई थी। ऐसी मान्यता है कि जिस मंदार पर्वत से समुद्र मंथन किया गया था वह तारापीठ से करीब 137 किलोमीटर (वाया दुमका-हंसडीहा) की दूरी पर बौंसी ( बांका जिला, बिहार) में अवस्थित है। मुख्य तारा मंदिर के निकट स्थित श्मशान में, जहां वशिष्ट मुनि ने तपस्या की थी, परिसर में वशिष्ठ मंदिर तथा पंचमुंडी मंदिर निर्मित है जहां साधना करते साधकों को देखा जा सकता है। जाने-माने इतिहासकार विलियम डेलरिंपल ने भी अपनी पुस्तक 'नाईन लाइव्स: द लेडी ट्वीलाईट' में तारापीठ की इस तरह की अनेक अलौकिक कहानियों के उल्लेख किया है। हिंदू और बौद्ध परंपराओं में तारा की महिमा हिंदू धर्मावलंबियों की तरह बौद्ध धर्म में भी देवी तारा का अत्यंत महात्म्य है। बौद्ध धर्म में भी ये शाक्त देवी के रूप में पूजी जाती हैं। बौद्ध धर्म में शाक्त धर्म से ही देवी तारा का प्रवेश हुआ है। 'डेवलपमेंट ऑफ बुद्धिस्ट आईकोनोग्राफी इन इस्टर्न इंडिया' में मल्लार घोष कहते हैं कि तारा का आविर्भाव पुराणों में वर्णित देवी दुर्गा से हुआ है। वे शाक्त धर्म के साथ बौद्ध धर्म में भी दश महाविद्याओं में एक मानी जाती हैं। बौद्ध धर्म की तिब्बती मान्यताओं में आर्यतारा को महायान में नारी बोधिसत्व और वज्रयान में नारी बुद्ध के रूप में पूजा की जाती है, जो मुक्ति और सफलता प्रदान करती हैं। वज्रयान और तंत्रयान के विशिष्ट केंद्र के रूप में प्रसिद्ध विक्रमशिला बौद्ध महाविहार के आचार्य दीपंकर श्रीज्ञान अतिश की आराध्य देवी तारा ही थीं। बामाखेपा: मां तारा के अनन्य भक्त मां तारा के अनन्य भक्त बामाखेपा अर्थात बामदेव का उल्लेख किये बिना तारापीठ की चर्चा अधूरी है। उनका जन्म तारापीठ से आठ किलोमीटर की दूरी पर आठला ग्राम में हुआ था। कहते हैं उन्हें मां का दर्शन प्राप्त हुआ था। तारापीठ में मां के मंदिर परिसर में ही बामदेव का भी मंदिर है। ऐसा विरले होता है कि एक ही स्थान पर भक्त के साथ उनके भगवान की भी पूजा होती हो। तारापीठ का मुख्य मंदिर अत्यंत भव्य और आकर्षक है तथा बं गाल की पारम्परिक चाला रीति में निर्मित है। लाल सूर्ख ईंटों से बने इस मंदिर की दीवारों पर विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियों के अलावे रामायण के प्रसंग अंकित हैं। पुराने दिनों तारापीठ नाटोर स्टेट के अन्तर्गत आता था, जो तत्कालीन पूर्व बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) के जैसोर जिला में पड़ता था। 34 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले डेढ़ करोड़ के राजस्व वाले नाटोर स्टेट की रानी भवानी कुशल शासक के साथ बहुत ही धार्मिक स्वभाव की थी और मां तारा के मंदिर के निर्माण, जीर्णोद्धार तथा प्रबंधन-व्यवस्था में उनका विशेष योगदान था। मां से पुत्रवत प्रेम करने वाले सिद्ध साधक मां तारा के अनन्य भक्त बामाखेपा एक सिद्ध तांत्रिक थे जो मंदिर के बगल में स्थित श्मशान रहकर साधना करते थे। बामा मां तारा को देवी की तरह नहीं, वरन् मां के रूप में आराधना करते थे तथा उनके साथ पुत्रवत उन्मुक्त व्यहवार करते थे जिसके कारण मंदिर के पुजारी उन्हें बीच-बीच में प्रताड़ित करते रहते थे। इस संबंध में अपनी पुस्तक में डेविड आर.किंसले एक घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं कि एक बार बामा ने तारा मां को भोग लगाने के पहले ही उसके फल को उठाकर खा लिया जिससे क्रोधित होकर पुजारियों ने उन्हें मंदिर से निकाल बाहर कर दिया। मां के वियोग में बामा बगल के श्मशान में एक एक पेड़ के नीचे मां की रट लगाते हुए विलाप करने लगे। भक्त की भूख और देवी के स्वप्न की कथा कहते हैं अपने पुत्र की इस दशा से मां तारा ने विह्वल होकर नाटोर स्टेट की रानी को स्वप्न दिया है कि मेरा पुत्र श्मशान में भूखा पड़ा है, तो मैं तुम्हारा भोग कैसे स्वीकार कर सकती हूं, पहले उसको भोजन दो। देवी के आदेश का रानी ने तत्काल पालन किया और तब से देवी को भोग लगाने के पूर्व बामा को भोजन देने की परिपाटी चल पड़ी। ऐसी मान्यता है कि मां तारा ने बामा खेपा को दर्शन दिये थे। तारापीठ में मुख्य मंदिर के सामने एक पोखर है जो जीवंतो पोखर कहलाता है। इस सरोवर में जीवनदायिनी शक्ति है। कहते हैं पुराने जमाने में एक व्यापारी का मृत पुत्र इस पोखर में स्नान कराने से जी उठा था। तारा पीठ में पूजा करने के पूर्व भक्तगण इस सरोवर में स्नान करते हैं। नवरात्रि के अनुष्ठान और त्रयोदशी का महापर्व दुर्गा पूजा के अवसर पर तारापीठ का पूरा परिवेश शक्ति स्वरूपा मां तारा के पूजनोत्सव में लीन हो जाता है। नवरात्रि में षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी की तिथियों में यज्ञ-अनुष्ठान सम्पन्न किये जाते हैं। महा अष्टमी के दिन तारा मंदिर में 22 पंडितों के द्वारा विशेष अनुष्ठान किये जाते हैं। त्रयोदशी को मां तारा के विग्रह को मंदिर के बाहर लाकर विशेष वेदी पर विराजमान किया जाता है जिनका मुख मलूटी ग्राम की रहता जिसके बारे में मान्यता है कि वहां तारा मां की बड़ी बहन मौलिक्षा मां विराजती हैं। इस दिन यहां बहुत बड़ा मेला लगता है। मां तारा को जवा, कमल और नीले अपराजिता के फूल अत्यंत प्रिय हैं, इस कारण श्रद्धालुगण इन फूलों को आवश्यक रूप से मां को अर्पित करते हैं। (शिव शंकर सिंह पारिजात- पूर्व जनसंपर्क उपनिदेशक एवं इतिहासकार)