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(डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की जयंती 21 अक्टूबर पर विशेष) पटना। बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की 21 अक्टूबर को जयंती पर उन्हें याद करना केवल उनके राजनीतिक योगदान और प्रशासनिक उपलब्धियों का स्मरण करना नहीं है बल्कि यह उनके विचारों को वर्तमान की कसौटी पर परखने का अवसर भी है। 26 नवंबर 1955 को मुंगेर के बासुदेवपुर स्थित नंद कुमार उच्च विद्यालय के शिलान्यास के अवसर पर दिया गया उनका भाषण इसी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। जाति के आधार पर मनुष्य का वर्गीकरण करने और चुनावी राजनीति में सामाजिक पहचान के इस्तेमाल पर उनकी टिप्पणी आज भी भारतीय समाज और लोकतंत्र के सामने खड़े सवालों से जुड़ती है। संविधान के आदर्श और जाति की चुनौती स्वतंत्रता के बाद भारत एक नए सामाजिक-राजनीतिक ढांचे का निर्माण कर रहा था। संविधान लागू हो चुका था और समानता, स्वतंत्रता, न्याय एवं बंधुता को राष्ट्रजीवन के आदर्श के रूप में स्वीकार किया जा चुका था लेकिन संवैधानिक घोषणा से सदियों पुरानी सामाजिक विषमताएं समाप्त नहीं हो सकती थीं। जातिगत ऊंच-नीच, भेदभाव और जन्म के आधार पर व्यक्ति का मूल्यांकन समाज की गहरी चुनौतियां बनी हुई थीं। ऐसे संक्रमणकाल में मुंगेर के बासुदेवपुर में विद्यालय के शिलान्यास जैसे अवसर पर श्रीकृष्ण सिंह का जाति और मनुष्यता का प्रश्न उठाना शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन से जोड़ने वाला संदेश था। उन्होंने कहा था, “आदमी-आदमी का वर्गीकरण आदमी को आदमी जानकर किया जाना चाहिए, न कि उसकी जाति को जानकर।” मनुष्य की गरिमा सबसे ऊपर इस कथन का आशय स्पष्ट है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसकी जाति तक सीमित नहीं की जा सकती। उसकी गरिमा, क्षमता और अधिकार जन्म से निर्धारित नहीं होते। आज भी सामाजिक संबंधों, विवाह, स्थानीय नेतृत्व और सार्वजनिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में जाति का प्रभाव दिखाई देता है। संविधान ने समानता का अधिकार दिया है लेकिन उसे रोजमर्रा के व्यवहार में उतारना समाज की निरंतर जिम्मेदारी है। कानून भेदभाव को रोक सकता है; मनुष्य की दृष्टि बदलने के लिए शिक्षा, सामाजिक चेतना और व्यक्तिगत आचरण भी जरूरी हैं। श्रीकृष्ण सिंह ने जाति के प्रश्न को राजनीति से जोड़ते हुए कहा था, “आज वोट का युग है। वोट के विभिन्न रूप हैं। हिन्दू के सामने हिन्दू जैसा, मुसलमान के सामने मुसलमान जैसा, कहीं जाति की बात, कहीं दूसरी जाति की बात।” सामाजिक न्याय और जातिवाद का अंतर वर्ष 1955 में कही गई यह बात आज की चुनावी राजनीति पर विचार करने का अवसर देती है। लोकतंत्र में मतदाता की पहचान को जाति और समुदाय के खांचों में सीमित कर देने का खतरा हमेशा बना रहता है। हालांकि इस संदर्भ में एक अंतर समझना आवश्यक है। ऐतिहासिक वंचना और असमान अवसरों से जूझ रहे समुदायों की प्रतिनिधित्व संबंधी मांग को केवल जातिवाद कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। सामाजिक न्याय का उद्देश्य उन असमानताओं को दूर करना है, जिन्होंने लोगों को शिक्षा, संसाधनों और सत्ता में भागीदारी से वंचित रखा है। चुनावी गणित से आगे नागरिकता समस्या तब पैदा होती है, जब प्रतिनिधित्व की मांग दूसरे समुदायों के प्रति घृणा में बदल जाए या नागरिक को केवल चुनावी गणित का हिस्सा मान लिया जाए। लोकतंत्र में सामाजिक पहचान की चर्चा और जातिगत विद्वेष के बीच फर्क बनाए रखना जरूरी है। चुनाव केवल जातियों की संख्या गिनने का अभ्यास नहीं बल्कि जनसमस्याओं पर जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया भी है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और सार्वजनिक सेवाओं जैसे मुद्दे किसी एक जाति तक सीमित नहीं हैं। मतदाता की पहचान उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि से बनती है लेकिन उसकी नागरिकता उससे कहीं व्यापक है। शिक्षा से मनुष्यता का निर्माण मुंगेर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के बीच स्थित बासुदेवपुर का यह प्रसंग शिक्षा के सामाजिक महत्त्व को भी रेखांकित करता है। विद्यालय केवल परीक्षा, अंक और प्रमाणपत्र हासिल करने की जगह नहीं है। वह बच्चों में विवेक, संवेदना और सह-अस्तित्व की समझ विकसित करने का सामाजिक केंद्र भी है। यदि शिक्षा व्यक्ति को रोजगार के योग्य तो बनाए लेकिन उसमें दूसरों की गरिमा का सम्मान न जगा सके तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। शिक्षा का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होता है, जब वह बच्चों को यह समझने में मदद करे कि किसी व्यक्ति की क्षमता और भविष्य का निर्धारण उसकी जाति या जन्म से नहीं होता। विद्यालयों में समानता की सीख आज सरकारी विद्यालयों में संसाधन, शिक्षकों की उपलब्धता और शिक्षा की गुणवत्ता जैसे प्रश्नों पर विचार करते समय इस ऐतिहासिक प्रसंग को याद करना उपयोगी है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सामाजिक समानता की बुनियाद है। विद्यालय का वातावरण ऐसा होना चाहिए, जहां किसी बच्चे को उसकी जाति, धर्म, भाषा या आर्थिक स्थिति के कारण हीनता का अनुभव न हो। पाठ्यपुस्तकों के साथ विद्यालयी व्यवहार भी समानता सिखाए। शिक्षा तभी सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनेगी, जब वह ज्ञान देने के साथ पूर्वाग्रहों को चुनौती देने की क्षमता भी विकसित करे। श्रीकृष्ण सिंह ने आपसी सद्भाव पर जोर देते हुए कहा था, “प्रेम करो, आपस में घृणा-द्वेष का भाव दूर करो।” यह आग्रह केवल नैतिक उपदेश नहीं, विविधता वाले समाज में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की बुनियादी शर्त है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं। विचारों, हितों और सामाजिक अनुभवों में अंतर भी रहेंगे लेकिन असहमति को दुश्मनी में बदल देना समाज को कमजोर करता है। किसी व्यक्ति या समुदाय के प्रति अपमान और घृणा को सामान्य बना देने से संवाद की जगह अविश्वास लेने लगता है। डिजिटल दौर में संवाद की जरूरत आज सोशल मीडिया और डिजिटल संचार के दौर में भ्रामक सूचनाएं तथा समुदायों के बारे में पूर्वाग्रह तेजी से फैल सकते हैं। ऐसे समय में तथ्य की जांच करना, संयमित भाषा का इस्तेमाल करना और किसी संदेश को आगे बढ़ाने से पहले उसकी विश्वसनीयता परखना नागरिक जिम्मेदारी है। श्रीकृष्ण सिंह के भाषण और आज की परिस्थितियों में अंतर अवश्य है लेकिन घृणा के स्थान पर संवाद और सामाजिक पहचान के स्थान पर मानवीय गरिमा को प्राथमिकता देने का प्रश्न अब भी प्रासंगिक है। संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्श भी इसी दिशा की ओर ले जाते हैं। समानता का अर्थ केवल कानून की नजर में बराबरी नहीं बल्कि ऐसी परिस्थितियां बनाना भी है, जिनमें प्रत्येक व्यक्ति सम्मान के साथ जीवन जी सके। बंधुता का अर्थ अपनी पहचान मिटा देना नहीं बल्कि विभिन्न पहचानों के बावजूद साझा नागरिकता को स्वीकार करना है इसलिए जातिगत भेदभाव का विरोध और वंचित समुदायों के लिए समान अवसरों का विस्तार एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि न्यायपूर्ण समाज के पूरक लक्ष्य हैं। 1955 के भाषण की आज भी प्रासंगिकता श्रीकृष्ण सिंह की जयंती पर उनके भाषण को याद करने का अर्थ अतीत को वर्तमान पर जस का तस लागू करना नहीं है। वर्ष 1955 का सामाजिक और राजनीतिक परिवेश आज से अलग था लेकिन इतिहास की सार्थकता इसी में है कि वह हमें उन प्रश्नों की पहचान कराए, जो समय बदलने के बाद भी बने रहते हैं। मुंगेर के बासुदेवपुर में विद्यालय के शिलान्यास के अवसर पर दिया गया यह भाषण बताता है कि शिक्षा और सामाजिक सुधार को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। विद्यालय की इमारत खड़ी करना जरूरी है लेकिन उससे भी जरूरी है ऐसा सामाजिक वातावरण बनाना, जिसमें ज्ञान के साथ समानता और संवेदना भी विकसित हो। विचारों को व्यवहार में उतारना ही श्रद्धांजलि किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को सच्ची श्रद्धांजलि उसके नाम पर समारोह आयोजित करने भर से नहीं मिलती। उसके विचारों को सामाजिक व्यवहार और सार्वजनिक जीवन में जगह देना भी जरूरी है। आज आवश्यकता है कि जाति की सामाजिक वास्तविकता को समझते हुए मनुष्य की गरिमा को उससे बड़ा माना जाए; सामाजिक न्याय की मांग को स्वीकार करते हुए घृणा और भेदभाव से बचा जाए; और चुनावी प्रतिस्पर्धा के बीच नागरिकों की वास्तविक समस्याओं को प्राथमिकता मिले। शिक्षा को भी केवल नौकरी पाने का साधन नहीं बल्कि स्वतंत्र सोच और मानवीय संवेदना विकसित करने का माध्यम बनाना होगा। लोकतंत्र की असली ताकत है बंधुता श्रीकृष्ण सिंह को 21 अक्टूबर को याद करते हुए उनके 1955 के भाषण का संदेश यही है कि लोकतंत्र केवल मतपत्र से नहीं चलता; वह समानता, विश्वास और बंधुता से मजबूत होता है। मुंगेर के बासुदेवपुर से दिया गया उनका संदेश आज भी सामाजिक जीवन के लिए एक कसौटी प्रस्तुत करता है। किसी समाज की प्रगति का आकलन केवल उसकी आर्थिक उपलब्धियों से नहीं बल्कि इस बात से भी होना चाहिए कि वह अपने हर नागरिक को कितनी गरिमा और समान अवसर देता है। जाति पूछने से पहले इंसान को पहचानना, सामाजिक न्याय को घृणा से अलग रखना और शिक्षा को मनुष्यता से जोड़ना—यही उस ऐतिहासिक भाषण की आज के भारत के लिए सार्थक सीख है। श्रीकृष्ण सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब उनका संदेश केवल स्मृति में नहीं, हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे: जाति नहीं, इंसान बनाइए।



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