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काठमांडू/रक्सौल: नेपाल के रसुवा जिले में बुधवार सुबह भोटेकोशी नदी में तिब्बत की ओर से आए अचानक तेज जलप्रवाह ने भारी तबाही मचा दी, जिसमें मृतकों की संख्या बढ़कर 162 हो गई जबकि 400 लोगों के लापता होने के बीच निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजना के 60 से अधिक इंजीनियरों-कर्मचारियों और 26 पुलिसकर्मियों की तलाश जारी है तथा संभावित जलवृद्धि को देखते हुए बिहार में गंडक किनारे बसे क्षेत्रों को अलर्ट पर रखा गया है। बाढ़ ने रसुवा से लेकर नुवाकोट, धादिंग, चितवन, गोरखा, तनहुन और पूर्वी नवलपरासी तक जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त होने से कई इलाकों का संपर्क टूट गया है, जिससे राहत एवं बचाव अभियान में मुश्किलें आ रही हैं। सुबह नौ बजे आया सैलाब, संभलने का नहीं मिला मौका बुधवार सुबह करीब नौ बजे भोटेकोशी का जलस्तर और बहाव अचानक तेजी से बढ़ गया। पानी और मलबे का सैलाब इतनी रफ्तार से नीचे आया कि लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने का समय नहीं मिला। तिमुरे बाजार, रसुवागढ़ी सीमा क्षेत्र और आसपास के इलाकों में भारी नुकसान हुआ। बाढ़ की चपेट में सड़कें, पुल, मकान, व्यापारिक प्रतिष्ठान और दूसरे महत्वपूर्ण ढांचे आए हैं। सात जिलों तक पहुंची त्रासदी जारी आंकड़ों के अनुसार, अलग-अलग जिलों से कुल 72 शव मिलने की बात कही गई है। इनमें चितवन से 28, धादिंग से 18, नुवाकोट से 11, गोरखा से नौ, तनहुन से चार, रसुवा से एक और पूर्वी नवलपरासी से एक शव बरामद होने की सूचना है। कई मृतकों की पहचान अभी नहीं हो सकी है। पहले भूकंप की आशंका, बाद में सामने आई असली वजह शुरुआत में माना जा रहा था कि बाढ़ से पहले भूकंप आया था लेकिन अब अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे (यूएसजीएस) की रिपोर्ट में इसका अलग कारण सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की ओर ल्हेंदे नदी में पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा खिसककर नदी में गिर गया था। इसी विशाल भूस्खलन के कारण 5.2 तीव्रता के भूकंप जैसा झटका महसूस हुआ। भूस्खलन के बाद नदियों में आया मलबे और पानी का सैलाब भूस्खलन के बाद ल्हेंदे नदी से भारी मात्रा में पानी और मलबा भोटेकोशी तथा त्रिशूली नदियों में पहुंचा, जिससे विनाशकारी बाढ़ आ गई। बाढ़ का बहाव इतना तेज था कि लोगों और मलबे को करीब 150 किलोमीटर दूर चितवन तक बहा ले गया। अब तक चितवन से 33 शव बरामद किए जा चुके हैं। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है। हालांकि खराब मौसम और कई जगह रास्ते टूट जाने के कारण राहतकर्मियों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। टीमें मलबे में दबे लोगों की तलाश में जुटी हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रियों पर भी पड़ा असर इस आपदा की चपेट में कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जा रहे कई श्रद्धालु भी आ गए। प्रशासन प्रभावित यात्रियों और अन्य लोगों की तलाश तथा राहत कार्यों में तेजी लाने का प्रयास कर रहा है। सुरंग में काम कर रहे थे 60 से ज्यादा कर्मचारी स्याब्रुबेसी में निर्माणाधीन 20 मेगावाट की लांगटांग खोला जलविद्युत परियोजना भी सैलाब की चपेट में आ गई। बाढ़ आने के समय 60 से अधिक इंजीनियर और कर्मचारी सुरंग में कंक्रीट लाइनिंग का काम कर रहे थे। परियोजना के प्रबंध निदेशक एवं नेपाल के स्वतंत्र विद्युत उत्पादक संघ के सचिव बिजय मोहन भट्टराई के मुताबिक, नदी के सामान्य जलस्तर से करीब 10 मीटर ऊपर स्थित सुरंग भी प्रभावित हुई है। परियोजना के बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचा है। लापता कर्मचारियों के साथ विभिन्न स्थानों पर तैनात 26 पुलिसकर्मियों की भी तलाश की जा रही है। हेलीकॉप्टर बने उम्मीद की उड़ान दुर्गम क्षेत्रों में सड़क संपर्क टूटने के बाद हेलीकॉप्टर राहत अभियान का सबसे बड़ा सहारा बने हैं। विज्ञप्ति के मुताबिक कुल 114 लोगों को एयरलिफ्ट किया गया है। इनमें नेपाली हेलीकॉप्टरों से 85 और निजी कंपनियों के हेलीकॉप्टरों से 29 लोगों को निकालने की जानकारी दी गई है। एनसी हेलीकॉप्टर ने तिमुरे-धुंचे से 60, तिमुरे-त्रिशुली से 13, मैलुंग से पांच, बेत्रावती से चार और त्रिशुली-काठमांडू से तीन लोगों को निकाला। कैलाश, सिमरिक, अन्नपूर्णा, प्रभु, फिशटेल और एवरेस्ट हेलीकॉप्टरों ने भी फंसे एवं घायल लोगों को काठमांडू के अस्पतालों और सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया। सेना-पुलिस का संयुक्त ऑपरेशन, ड्रोन से तलाश नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाल पुलिस ने संयुक्त राहत एवं बचाव अभियान शुरू किया है। चिकित्सा दल, वाहन, राहत सामग्री और विशेष उपकरण प्रभावित क्षेत्रों में भेजे गए हैं। कटे हुए इलाकों और मलबे के नीचे दबे लोगों का पता लगाने के लिए ड्रोन से निगरानी की जा रही है। रसुवागढ़ी के सीमा शुल्क परिसर और आसपास के क्षेत्रों में खोज अभियान पर विशेष ध्यान दिया गया है। हिमस्खलन या हिमनदी झील? कारण पर रहस्य कायम भोटेकोशी में अचानक इतना पानी कैसे आया, इसकी आधिकारिक वजह अभी स्पष्ट नहीं है। हिमस्खलन से नदी का रास्ता बंद होने, हिमनदी झील फटने या किसी जल संरचना के टूटने जैसी संभावनाओं की जांच की जा रही है। काठमांडू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं जलवायु शोधकर्ता रिजन भक्त कायस्थ के मुताबिक, बाढ़ की प्रकृति सामान्य नहीं है और हिमस्खलन या हिमनदी झील फटने की आशंका अधिक है। अंतिम निष्कर्ष वैज्ञानिक जांच के बाद ही सामने आएगा। नेपाल की तबाही से बिहार में भी बजा अलार्म नेपाल से आने वाले पानी में अचानक वृद्धि होने पर वाल्मीकिनगर बैराज पर दबाव बढ़ सकता है। बैराज से ज्यादा पानी छोड़े जाने की स्थिति में गंडक का जलस्तर तेजी से ऊपर जाने का खतरा है। पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी सौरभ सुमन यादव ने अरेराज, पहाड़पुर, संग्रामपुर और केसरिया अंचलों में विशेष सतर्कता के निर्देश दिए हैं। नदी के तटबंधों और निचले इलाकों की लगातार निगरानी की जा रही है। एनडीआरएफ-एसडीआरएफ मैदान में, निकासी की तैयारी अंचलाधिकारियों और थाना प्रभारियों को नदी किनारे रहने वाले लोगों को सतर्क करने की जिम्मेदारी दी गई है। आपात स्थिति में प्रभावित आबादी को तुरंत सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की तैयारी रखने को कहा गया है। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमों को पेट्रोलिंग के निर्देश दिए गए हैं। स्वास्थ्य और पशुपालन विभाग को पर्याप्त दवाओं के साथ मेडिकल टीमें तैयार रखने को कहा गया है। मलबे में जिंदगी की तलाश, बढ़ सकता है आंकड़ा नेपाल के कई दुर्गम इलाकों में अभी पूरी स्थिति साफ नहीं है। संपर्क बाधित होने और बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने के कारण मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। एक ओर नेपाल में मलबे के बीच जिंदगी की तलाश चल रही है, वहीं दूसरी ओर बिहार में हर नजर गंडक नदी और वाल्मीकिनगर बैराज के जलस्तर पर टिकी है। फिलहाल राहत एजेंसियों की सबसे बड़ी चुनौती लापता लोगों को ढूंढना, फंसे लोगों को निकालना और सीमावर्ती इलाकों तक समय पर चेतावनी पहुंचाना है।



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