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मोतिहारी। अंधेरी रात, सिर पर मिट्टी का छिद्रदार घड़ा और उसके भीतर जलती एक छोटी-सी लौ। घड़े के छिद्रों से छनकर निकलती रोशनी के साथ जब ढोलक की थाप पर बालिकाओं के कदम थिरकते हैं और लोकगीतों में देवी की आराधना गूंजती है तब चंपारण का ग्रामीण जीवन अपनी उस सांस्कृतिक स्मृति से साक्षात्कार करता है, जिसे समय की धूल भी पूरी तरह ढक नहीं सकी है। झिझिया महज एक लोकनृत्य नहीं बल्कि लोकविश्वास, स्त्री-सृजनशीलता और सामुदायिक जीवन की वह जीवंत अभिव्यक्ति है, जिसमें मिट्टी का साधारण पात्र आस्था का प्रतीक और उसकी टिमटिमाती लौ पीढ़ियों की विरासत का उजास बन जाती है। बिहार के उत्तरवर्ती भोजपुरी और मिथिला सांस्कृतिक अंचलों से लेकर नेपाल के सीमावर्ती तराई क्षेत्रों तक प्रचलित झिझिया का चंपारण के ग्रामीण समाज में विशिष्ट स्थान है। शारदीय नवरात्र के दौरान महिलाएं और बालिकाएं समूह में यह अनुष्ठानिक लोकनृत्य करती हैं। उनके सिर पर संतुलित छिद्रदार घड़ा, भीतर जलता दीपक और बाहर झिलमिलाती रोशनी इस परंपरा को विशिष्ट पहचान देते हैं। यह दृश्य जितना सहज है, उसके भीतर समाई लोकआस्था और सांस्कृतिक अनुभूति उतनी ही गहरी है। मिट्टी के घड़े में रोशनी, लोकविश्वास में सुरक्षा की कामना झिझिया की सबसे विशिष्ट पहचान उसका छिद्रदार मिट्टी का घड़ा है। कुम्हार की मिट्टी से आकार पाता यह पात्र चारों ओर बने छोटे-छोटे छिद्रों और भीतर जलते दीपक के कारण अंधेरी रात में रोशनी का अनूठा संसार रचता है। सिर पर घड़े को संतुलित कर गोल घेरे में नृत्य करती महिलाएं और बालिकाएं जब लयबद्ध गति से आगे बढ़ती हैं, तो घड़े से निकलती किरणें मानो अंधकार के बीच असंख्य छोटी लौ जला देती हैं। लोकमान्यता में झिझिया परिवार, बच्चों और पूरे गांव को बुरी नजर तथा अनिष्ट से बचाने की कामना से जुड़ी है। ग्रामीण विश्वास के अनुसार, घड़े के छिद्रों को गिन लेने से दीपक बुझने और अनिष्ट होने की आशंका रहती है। इसी मान्यता के चलते नृत्य के दौरान घड़े को लगातार गतिशील रखा जाता है। यह विश्वास वैज्ञानिक तथ्य नहीं, बल्कि लोकमानस में रची-बसी उस सांस्कृतिक धारणा का हिस्सा है, जिसमें देवी के प्रति समर्पण और अपने परिवार की कुशलता की कामना एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं। इस अनुष्ठान का अर्थ केवल भय से मुक्ति की कामना में नहीं सिमटता। इसके भीतर अनिश्चितताओं से भरे ग्रामीण जीवन में सुरक्षा की आकांक्षा, सामूहिक विश्वास और स्त्रियों की सांस्कृतिक भागीदारी के कई स्तर एक साथ दिखाई देते हैं। लोकगीतों में सांस लेती आस्था और पीढ़ियों की स्मृति झिझिया की असली आत्मा उसके लोकगीतों में बसती है। पीढ़ियों से कंठ-दर-कंठ आगे बढ़ते इन गीतों में देवी की वंदना, परिवार की मंगलकामना और अनिष्टकारी शक्तियों से रक्षा की प्रार्थना सहज लोकभाषा में अभिव्यक्त होती है। “तोहरे भरोसे बरहम बाबा, झिझिया बनवलिन हो” और “डाकिनी के नजरिया ना लागे, साकिनी के बाण ना लागे” जैसे पारंपरिक गीत लोकसमाज की आस्थाओं, आशंकाओं और सांस्कृतिक अनुभवों को स्वर देते हैं। इन गीतों की शक्ति उनकी सादगी में है। न शब्दों का आडंबर, न भावों की कृत्रिमता। गांव की बोली, घरेलू जीवन की चिंता और सामूहिक प्रार्थना मिलकर ऐसा लोकसंसार रचते हैं, जिसमें व्यक्तिगत कामना सामुदायिक स्वर बन जाती है। गीत गाती महिलाएं केवल देवी से रक्षा की प्रार्थना नहीं करतीं, बल्कि अपने समय के अनुभवों, लोकमान्यताओं और पूर्वजों से मिली सांस्कृतिक स्मृतियों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाती हैं। यही मौखिक परंपरा झिझिया को लोकसाहित्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। लिखित अभिलेखों से बाहर भी संस्कृति जीवित रहती है, कभी किसी बुजुर्ग महिला के कंठ में, कभी किसी पुरानी धुन में और कभी उस गीत की अधूरी पंक्ति में, जिसे नई पीढ़ी अपनी स्मृति से पूरा करना सीखती है। गांव की गलियों में लोककला की पाठशाला चंपारण के अनेक ग्रामीण इलाकों में नवरात्र के दौरान बालिकाओं के समूह घर-घर जाकर झिझिया खेलते हैं। सप्तमी से विजयादशमी तक चलने वाली इस परंपरा में ग्रामीण परिवार उन्हें अनाज, दक्षिणा अथवा शगुन देते हैं। यह आदान-प्रदान केवल पारिश्रमिक या उपहार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोकअनुष्ठान के प्रति सामुदायिक सहभागिता और पारस्परिक संबंधों की अभिव्यक्ति बन जाता है। झिझिया की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसमें महिलाएं और बालिकाएं केवल सहभागी नहीं, बल्कि परंपरा की वाहक हैं। घड़े को संतुलित करना, लय के साथ कदम मिलाना, सामूहिक स्वर में गीत गाना और अनुष्ठान की विधियों को सीखना, इन सबके माध्यम से नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित होती है। यहां लोककला सीखने के लिए किसी औपचारिक पाठशाला की जरूरत नहीं पड़ती। गांव की गलियां, घरों के आंगन और सामूहिक आयोजन ही इसकी पाठशाला बन जाते हैं। बड़ी उम्र की महिलाओं से छोटी बालिकाओं तक पहुंचती धुनें और विधियां इस बात का प्रमाण हैं कि लोकसंस्कृति का सबसे पुराना विद्यालय लोकसमाज की अपनी स्मृति है। अंधविश्वास से परे झिझिया का व्यापक सांस्कृतिक अर्थ झिझिया को केवल तंत्र-मंत्र, बुरी नजर अथवा अनिष्ट से बचाव की मान्यताओं तक सीमित कर देना इसकी सांस्कृतिक व्यापकता को संकुचित करना होगा। इसके भीतर लोकगीतों की मौखिक परंपरा, मिट्टी के शिल्प का उपयोग, स्त्रियों की सामूहिक कलात्मक अभिव्यक्ति, धार्मिक आस्था और ग्रामीण समाज की सहभागिता एक साथ मौजूद हैं। इस परंपरा में मिट्टी, दीपक, गीत और नृत्य अलग-अलग वस्तुएं नहीं रह जाते, बल्कि एक साझा सांस्कृतिक अनुभव के अंग बन जाते हैं। मिट्टी का घड़ा शिल्प की स्मृति को जीवित रखता है, दीपक दृश्यात्मक सौंदर्य रचता है, गीत लोकभाषा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाते हैं और सामूहिक नृत्य गांव के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करता है। इसी समन्वय में झिझिया की विशिष्टता और उसकी सांस्कृतिक प्रासंगिकता निहित है। परंपरा की लौ को सहेजने की चुनौती समय के साथ बदलती जीवनशैली और मौखिक परंपराओं पर बढ़ती निर्भरता के बीच झिझिया के सामने संरक्षण की चुनौती भी है। अलग-अलग गांवों में प्रचलित गीतों, धुनों, स्थानीय शब्दों और अनुष्ठान की विविध शैलियों के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण के अभाव में सांस्कृतिक विरासत के कुछ महत्वपूर्ण अंश लुप्त हो सकते हैं। इस विरासत को बचाने के लिए बुजुर्ग लोकगायिकाओं के अनुभवों और गीतों का संकलन, स्थानीय धुनों की ध्वनि एवं दृश्य अभिलेखागार में सुरक्षित रखने की व्यवस्था, विद्यालयों में क्षेत्रीय लोककलाओं से परिचय तथा सांस्कृतिक आयोजनों में झिझिया को सम्मानजनक स्थान देना उपयोगी कदम हो सकते हैं। संरक्षण का उद्देश्य इसे केवल मंचीय प्रदर्शन में बदल देना नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिवेश को भी समझना और सहेजना होना चाहिए, जिसमें यह परंपरा स्वाभाविक रूप से विकसित हुई है। चंपारण की सांस्कृतिक पहचान केवल ऐतिहासिक स्थलों और स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों से नहीं बनी है। गांवों में पीढ़ियों से निभाई जा रही लोकपरंपराएं भी उसकी पहचान की आधारशिला हैं। झिझिया इसी विरासत का ऐसा अध्याय है, जिसमें स्त्रियों की सामूहिक सृजनशीलता, लोकभाषा की मिठास, मिट्टी के शिल्प की उपयोगिता और आस्था की निरंतरता एक साथ दिखाई देती हैं। नवरात्र की रात जब बालिकाएं सिर पर झिझिया रखकर लोकगीत गाती हैं, तब अतीत किसी पुराने दस्तावेज की तरह निष्क्रिय नहीं पड़ा रहता, बल्कि वर्तमान के बीच जीवंत हो उठता है। घड़े के छिद्रों से छनकर निकलती रोशनी मानो यह संदेश देती है कि संस्कृति की लौ को जलाए रखने के लिए भव्य साधनों की नहीं, पीढ़ियों के बीच जीवित संबंधों की जरूरत होती है। झिझिया की असली रोशनी मिट्टी के घड़े में जलते दीपक तक सीमित नहीं है। वह उन कंठों में है, जो लोकगीतों को विस्मृत नहीं होने देते; उन कदमों में है, जो पुरानी लय को आगे बढ़ाते हैं; और उस सामूहिक स्मृति में है, जो समय बदलने के बावजूद अपनी जड़ों से संबंध बनाए रखती है। चंपारण की रातों में टिमटिमाती यह लौ आज भी याद दिलाती है कि लोकसंस्कृति का उजास किसी संग्रहालय में बंद होकर नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में सांस लेते हुए पीढ़ियों तक पहुंचता है।



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