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यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए नई दिल्ली। संसद का मानसून सत्र सरकार और विपक्ष के बीच टकराव, छात्र प्रदर्शनों, महत्त्वपूर्ण विधेयकों और सीमित चर्चा के कारण सुर्खियों में रहा। इन घटनाओं ने एक बुनियादी प्रश्न खड़ा किया कि क्या संसद केवल संख्या बल के आधार पर राजनीतिक जीत दर्ज करने का स्थान है, या राष्ट्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श और समाधान खोजने का साझा मंच? संसद को सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच युद्ध का मैदान नहीं बनना चाहिए। लोकतंत्र में सरकार को बहुमत के आधार पर कानून बनाने का अधिकार मिलता है, लेकिन इसके साथ विपक्ष की बात सुनने, राज्यों से परामर्श करने और जनता के प्रति जवाबदेह रहने की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। छात्र आंदोलन और सरकार की जवाबदेही मानसून सत्र के दौरान छात्रों का आंदोलन एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बन गया। प्रदर्शनकारी परीक्षा और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं को लेकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। प्रदर्शनकारी छात्रों के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई के वीडियो सामने आने से सरकार की आलोचना बढ़ी। कुछ पुलिसकर्मियों पर मारपीट और दुर्व्यवहार जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच और जवाबदेही आवश्यक है क्योंकि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का अधिकार है। यह घटना बताती है कि युवाओं से जुड़े मुद्दों को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना उचित नहीं है। सरकार को उनकी शिकायतों को सुनना और उनका संस्थागत समाधान करना चाहिए। कानून पारित हुए, लेकिन पर्याप्त बहस नहीं हुई सत्र में कई विधेयक पारित किए गए लेकिन उन पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो पाई, जो चिंता का कारण है। संसद का कार्य केवल कानून पारित करना नहीं है। उसका उद्देश्य प्रस्तावित कानूनों की कमियों, उनके सामाजिक प्रभाव और उन्हें लागू करने में आने वाली कठिनाइयों पर विचार करना भी है। यदि विधेयक जल्दबाजी में पारित किए जाते हैं, तो तीन समस्याएं पैदा हो सकती हैं— कानून में व्यावहारिक कमियां रह सकती हैं। प्रभावित राज्यों और समुदायों की चिंताएं अनसुनी हो सकती हैं। जनता का संसदीय प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर हो सकता है। इसलिए महत्त्वपूर्ण विधेयकों को संसदीय समितियों के पास भेजना, विशेषज्ञों की राय लेना और सदन में पर्याप्त बहस कराना आवश्यक है। खनन कानून और संघवाद की चिंता सत्र में खान और खनिज क्षेत्र से संबंधित संशोधन विधेयक भी विपक्ष के विरोध के बीच पारित किया गया। इस विधेयक को लेकर केंद्र और राज्यों के अधिकारों तथा स्थानीय समुदायों के हितों पर सवाल उठे। संघवाद क्या है? संघवाद ऐसी शासन-व्यवस्था है जिसमें संविधान केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बंटवारा करता है। भारत में राष्ट्रीय महत्त्व के विषय केंद्र के पास हैं, जबकि कई स्थानीय और क्षेत्रीय विषयों पर राज्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। खनिज संसाधनों का संबंध केवल आर्थिक विकास से नहीं होता। उनका सीधा प्रभाव इन क्षेत्रों पर भी पड़ता है— राज्यों के राजस्व पर पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर आदिवासी तथा स्थानीय समुदायों के अधिकारों पर भूमि अधिग्रहण और विस्थापन पर स्थानीय रोजगार और आजीविका पर इसलिए खनन कानूनों में बदलाव करते समय राज्यों और प्रभावित समुदायों से परामर्श जरूरी है। यदि केंद्र सरकार बिना पर्याप्त चर्चा के अपनी शक्तियां बढ़ाती है तो इससे संघीय संतुलन कमजोर हो सकता है। क्या कठोर कानून से परीक्षा व्यवस्था सुधर जाएगी सत्र में परीक्षाओं में नकल, प्रश्नपत्र लीक और अन्य गड़बड़ियों को रोकने के लिए कठोर प्रावधानों वाला कानून भी लाया गया। इसका उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में छात्रों का भरोसा बहाल करना था। हालांकि केवल कठोर सजा से परीक्षा व्यवस्था की सभी समस्याएं दूर नहीं होंगी। इसके लिए व्यापक संस्थागत सुधार जरूरी हैं, जैसे— प्रश्नपत्र तैयार करने और पहुंचाने की सुरक्षित व्यवस्था भर्ती एवं परीक्षा संस्थाओं की जवाबदेही शिकायतों की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच परिणामों को समय पर घोषित करना तकनीकी एवं प्रशासनिक निगरानी दोषी अधिकारियों और संगठित गिरोहों पर कार्रवाई परीक्षार्थियों को नियमित और स्पष्ट सूचना देना इस प्रकार, कानून आवश्यक हो सकता है लेकिन वह पारदर्शी और सक्षम प्रशासन का विकल्प नहीं है। परिसीमन पर विवाद क्यों सरकार के महत्त्वपूर्ण प्रस्तावों में परिसीमन से जुड़ा विषय भी शामिल था। परिसीमन का अर्थ परिसीमन का अर्थ लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों का दोबारा निर्धारण करना है। इसमें सामान्यतः जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक सुविधा जैसे आधारों को ध्यान में रखा जाता है। परिसीमन राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय है क्योंकि इससे— राज्यों की सीटों की संख्या बदल सकती है। संसद में अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। उत्तर और दक्षिण अथवा अधिक और कम जनसंख्या वाले राज्यों के बीच संतुलन का प्रश्न उठ सकता है। राजनीतिक दलों की चुनावी स्थिति बदल सकती है। इसलिए परिसीमन पर निर्णय केवल केंद्र सरकार या संसदीय बहुमत के आधार पर नहीं होना चाहिए। राज्यों, मुख्यमंत्रियों, राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और नागरिक समाज से व्यापक चर्चा आवश्यक है। एफसीआरए क्या है और यह महत्त्वपूर्ण क्यों है एफसीआरए यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम विदेश से मिलने वाले चंदे को नियंत्रित करता है। इसके अंतर्गत गैर-सरकारी संगठनों, शैक्षिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और अन्य पात्र संस्थाओं को मिलने वाली विदेशी सहायता की निगरानी की जाती है। एफसीआरए का उद्देश्य विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकना है। साथ ही यह भी जरूरी है कि कानून इतना कठोर न हो जाए कि वैध सामाजिक और विकास संबंधी गतिविधियों में अनावश्यक बाधा उत्पन्न होने लगे। इस कानून में बदलाव करते समय दो उद्देश्यों के बीच संतुलन जरूरी है— 1. राष्ट्रीय सुरक्षा और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना। 2. वैध गैर-सरकारी तथा सामाजिक संस्थाओं को काम करने की उचित स्वतंत्रता देना। क्या संयुक्त संसदीय समिति पर्याप्त है किसी विवादित विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के पास भेजना उपयोगी कदम हो सकता है। जेपीसी में संसद के दोनों सदनों के सदस्य शामिल होते हैं और वह किसी विषय या विधेयक की विस्तार से जांच कर सकती है। लेकिन, केवल समिति बनाना पर्याप्त नहीं है। समिति की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और वास्तविक विचार-विमर्श पर आधारित होनी चाहिए। उसे केवल बहुमत के आधार पर निर्णय देने वाली संस्था नहीं बनना चाहिए। महत्त्वपूर्ण विधेयकों पर सरकार को— सभी दलों की बैठक बुलानी चाहिए। विधेयक का मसौदा सार्वजनिक करना चाहिए। विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों की राय लेनी चाहिए। राज्यों से औपचारिक परामर्श करना चाहिए। संसदीय समिति की सिफारिशों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। विपक्ष की भी जिम्मेदारी है संसद को प्रभावी बनाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। विपक्ष की भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। विपक्ष का काम सरकार से प्रश्न पूछना, नीतियों की कमियां बताना और नागरिकों की चिंताओं को संसद में उठाना है। लेकिन केवल सदन की कार्यवाही रोकना या हर मुद्दे पर विरोध करना पर्याप्त नहीं है। एक जिम्मेदार विपक्ष को— तथ्यों और तर्कों के आधार पर आलोचना करनी चाहिए। सरकार की नीतियों के व्यावहारिक विकल्प प्रस्तुत करने चाहिए। संसदीय बहस और समितियों में सक्रिय भागीदारी करनी चाहिए। राजनीतिक सफलता को अंतिम विजय नहीं समझना चाहिए। राष्ट्रीय हित के विषयों पर सहयोग करना चाहिए। राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं। आज का विपक्ष भविष्य में सरकार बन सकता है और आज की सरकार विपक्ष में जा सकती है। इसलिए दोनों पक्षों को संसदीय परंपराओं की रक्षा करनी चाहिए। बहुमत का अर्थ मनमानी नहीं संसदीय लोकतंत्र में सरकार बहुमत से बनती है। यह बहुमत उसे नीतियां बनाने और कानून पारित करने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं होता। सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह— विपक्ष के सवालों का उत्तर दे। संसद में नियमित रूप से उपस्थित रहे। विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा कराए। संसदीय समितियों को महत्त्व दे। राज्यों और स्थानीय समुदायों से सलाह करे। असहमति का सम्मान करे। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। इसमें जवाबदेही, पारदर्शिता, विचार-विमर्श और संवैधानिक मर्यादा भी उतनी ही आवश्यक हैं। यूपीएससी के लिए यह विषय क्यों महत्त्वपूर्ण है यह मुद्दा यूपीएससी के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र–II के कई विषयों से जुड़ा है— संसद और राज्य विधानमंडल संसदीय समितियां कार्यपालिका की जवाबदेही विपक्ष की भूमिका केंद्र-राज्य संबंध और संघवाद कानून निर्माण की प्रक्रिया चुनाव और परिसीमन नागरिक अधिकार और शांतिपूर्ण विरोध शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही निबंध और एथिक्स के प्रश्नपत्र में इसे संवाद, सहमति, लोकतांत्रिक आचरण और सार्वजनिक संस्थाओं में विश्वास जैसे विषयों से भी जोड़ा जा सकता है। मेन्स के उत्तर में शामिल किए जा सकने वाले बिंदु संसदीय लोकतंत्र की चुनौतियां— विधेयकों पर कम चर्चा बार-बार व्यवधान संसदीय समितियों का सीमित उपयोग सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ता अविश्वास केंद्र-राज्य के बीच परामर्श की कमी राजनीतिक ध्रुवीकरण जनहित के मुद्दों पर दलगत राजनीति सुधार के उपाय— विधेयकों की पूर्व-विधायी समीक्षा संसदीय समितियों को अधिक समय और अधिकार विपक्ष के लिए पर्याप्त चर्चा का अवसर प्रधानमंत्री और मंत्रियों की नियमित संसदीय भागीदारी राज्यों और संबंधित पक्षों से परामर्श सदन के कामकाज के लिए न्यूनतम वार्षिक दिवस तय करना व्यवधान के स्थान पर नियमबद्ध बहस को बढ़ावा देना मुख्य परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न “संसद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संघर्ष का अखाड़ा नहीं, बल्कि संवाद और राष्ट्रीय सहमति का मंच है।” भारतीय संसदीय लोकतंत्र की वर्तमान चुनौतियों के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए। उत्तर लिखने की रूपरेखा भूमिका: संसद को कानून निर्माण, प्रतिनिधित्व, बहस और कार्यपालिका की जवाबदेही का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच बताइए। मुख्य भाग: विधेयकों पर सीमित चर्चा, संसदीय व्यवधान, समितियों की भूमिका, विपक्ष की जिम्मेदारी, संघवाद और राज्यों से परामर्श जैसे पक्षों का विश्लेषण कीजिए। सुझाव: संवाद, समिति प्रणाली, पूर्व-विधायी परामर्श और संसदीय नियमों के पालन को मजबूत करने के उपाय बताइए। निष्कर्ष: बहुमत और असहमति—दोनों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के आवश्यक अंग बताते हुए सहमति आधारित कानून निर्माण पर जोर दीजिए।