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पटना/जमुई। शाम ढल रही थी.. दो बच्चे अपने रास्ते पर थे। उनके पास अपनी छोटी-सी दुनिया थी, कोचिंग से लौटने के दौरान मौसम और पर्यटन का मन में आनन्द था, भविष्य के सपने और शायद एक-दूसरे से जुड़ी कोई सामान्य बातचीत लेकिन रास्ते में उन्हें कुछ लोगों ने रोक लिया। इसके बाद जो हुआ, वह केवल दो नाबालिगों के साथ कथित अश्लील अभद्रता और मारपीट की घटना नहीं थी, वह उस क्षण समाज की संवेदना, कानून के शासन और हमारी सामूहिक नैतिकता, इन तीनों के सामने खड़ा एक आईना था। जमुई में दो नाबालिग किशोर-किशोरी के साथ कथित मारपीट, अश्लील अभद्रता और आपत्तिजनक व्यवहार का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की। एसआईटी गठित की गयी और आरोपियों की पहचान के लिए वीडियो तथा अन्य डिजिटल साक्ष्यों का सहारा लिया गया। पुलिस ने कई आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारियों की जानकारी दी है। वीडियो के सोशल मीडिया पर प्रसार को लेकर भी कार्रवाई की बात सामने आयी है। कार्रवाई जरूरी है। दोषियों को कानून के सामने लाना भी जरूरी है लेकिन इस घटना की सबसे बड़ी सीख गिरफ्तारी की संख्या में नहीं छुपी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई, जिसमें किसी बच्चे की गरिमा बचाने के लिए कानून को वायरल वीडियो का इंतजार करना पड़ा? नैतिकता के नाम पर अनैतिकता समाज में नैतिकता जरूरी है। परिवार जरूरी है। संस्कार जरूरी हैं। बच्चों को सही और गलत का फर्क समझाना भी जरूरी है। लेकिन नैतिकता का अर्थ किसी दूसरे के जीवन पर अपना अधिकार जमा लेना नहीं है। किसी लड़के और लड़की को साथ देखकर किसी को उन्हें रोकने, धमकाने, मारने, अपमानित करने या उनके साथ आपत्तिजनक व्यवहार करने का अधिकार नहीं मिल जाता। यदि कोई अपराध हो रहा है तो पुलिस को सूचना देना नागरिक का अधिकार और कर्तव्य है; सड़क पर अदालत लगाना और भीड़ को दंडाधिकारी बना देना कानून के शासन का अपमान है। जमुई की घटना का सबसे पीड़ादायक पक्ष यही है कि कथित ‘नैतिक निगरानी’ का दावा करने वाले लोग स्वयं उस सीमा को पार करते दिखाई दिए, जिसे सभ्य समाज में कोई व्यक्ति किसी दूसरे की गरिमा के साथ पार नहीं कर सकता। और जब सामने दो नाबालिग हों, तब यह सीमा और भी पवित्र हो जाती है। बच्चे अपराध की वस्तु नहीं, संरक्षण के अधिकारी हैं किसी बच्चे की सुरक्षा का अर्थ केवल उसे अपराधी से बचाना नहीं है। उसे भीड़ से, कैमरे से, सोशल मीडिया से, सार्वजनिक चर्चा से और दोबारा होने वाले मानसिक आघात से भी बचाना कानून और समाज की जिम्मेदारी है। पॉक्सो कानून की पूरी भावना बाल-केंद्रित न्याय व्यवस्था पर आधारित है। बच्चे की पहचान की रक्षा, संवेदनशील तरीके से बयान, चिकित्सकीय सहायता और न्यायिक प्रक्रिया में उसे अनावश्यक मानसिक आघात से बचाना इसी सोच का हिस्सा है। इसलिए, प्रशासन के लिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि आरोपियों को कब पकड़ा गया। सवाल यह भी होना चाहिए, क्या बच्चों को तत्काल सुरक्षित वातावरण मिला? क्या उनका बयान प्रशिक्षित और संवेदनशील अधिकारी ने लिया? क्या उनकी पहचान सोशल मीडिया से सुरक्षित रखी गयी? क्या परिवार पर किसी तरह का दबाव या भय तो नहीं है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या घटना के बाद बच्चों को यह महसूस कराया गया कि समाज उनके खिलाफ नहीं, उनके साथ खड़ा है? प्रशासन से सबसे बड़ा सवाल: घटना से पहले क्या हुआ किसी भी घटना के बाद पुलिस की कार्रवाई दिखाई देती है। गिरफ्तारी दिखाई देती है। प्राथमिकी दिखाई देती है। प्रेस विज्ञप्ति दिखाई देती है। लेकिन सुशासन की असली परीक्षा उससे पहले शुरू होती है। जमुई जैसे मामले प्रशासन को यह सोचने का अवसर देते हैं कि क्या संवेदनशील और अपेक्षाकृत सुनसान स्थानों की सुरक्षा का नियमित ऑडिट होता है? क्या वहां पर्याप्त प्रकाश है? क्या सीसीटीवी काम कर रहे हैं? क्या शाम के समय पुलिस पेट्रोलिंग होती है? क्या छात्र-छात्राओं के आवागमन वाले रास्तों की जोखिम-मैपिंग की गयी है? घटना के बाद पहुंचने वाली पुलिस जरूरी है, लेकिन घटना से पहले दिखाई देने वाली पुलिस उससे भी ज्यादा जरूरी है। जिला प्रशासन को ऐसे स्थानों का सुरक्षा ऑडिट कराना चाहिए जहां शाम के बाद आवाजाही कम होती है। पुलिस को पेट्रोलिंग का समय और स्थान केवल कागज पर नहीं, डिजिटल लॉग और जीपीएस आधारित निगरानी से भी सत्यापित करना चाहिए। स्कूल और कोचिंग संस्थानों के आसपास सुरक्षित मार्ग विकसित किये जा सकते हैं। आपात सूचना मिलने पर पुलिस कितनी देर में पहुंचती है, इसका नियमित ऑडिट होना चाहिए। क्योंकि कानून का डर केवल धाराओं से नहीं बनता। कानून का भरोसा उसकी त्वरित और निष्पक्ष मौजूदगी से बनता है। अगर वीडियो वायरल नहीं होता तो यह प्रश्न असुविधाजनक है, लेकिन जरूरी है। यदि घटना का वीडियो सामने नहीं आता तो क्या पुलिस को घटना की जानकारी मिलती? यदि पीड़ित परिवार सामाजिक दबाव या भय के कारण तत्काल शिकायत नहीं करता तो क्या बाल संरक्षण तंत्र स्वयं सक्रिय होता? यहीं पुलिसिंग की पारंपरिक व्यवस्था को नई तकनीकी और सामाजिक वास्तविकता के साथ जोड़ने की जरूरत है। आज अपराध के दो चरण हो सकते हैं, पहला, घटनास्थल पर, दूसरा, मोबाइल स्क्रीन पर। घटना का वीडियो बनाना, उसे प्रसारित करना और पीड़ित की पहचान उजागर करना पीड़ित को दूसरी बार चोट पहुंचा सकता है। इसलिए डिजिटल फॉरेंसिक अब जांच का वैकल्पिक हिस्सा नहीं, बल्कि कई मामलों में अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। पुलिस को मूल वीडियो, उसके स्रोत, प्रसार की श्रृंखला, उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित करना चाहिए। साथ ही पीड़ितों की पहचान बताने वाले कंटेंट को रोकने के लिए साइबर इकाई को तत्काल सक्रिय होना चाहिए। कैमरा अपराध को रिकॉर्ड कर सकता है, लेकिन न्याय नहीं कर सकता। न्याय केवल कानून कर सकता है। दस साल की तस्वीर: आंकड़ों का अभाव भी एक सवाल सार्वजनिक समाचार अभिलेखों में अलग-अलग जिलों से युवक-युवतियों या किशोर-किशोरियों के साथ तथाकथित ‘मोरल पुलिसिंग’, सार्वजनिक अपमान और हिंसा के मामले सामने आते रहे हैं। जून 2018 में नालंदा जिले के हिलसा क्षेत्र से एक युवक-युवती के साथ कथित अभद्रता का वीडियो सामने आया था और पुलिस ने कार्रवाई शुरू की थी। ऐसी घटनाओं की समीक्षा के लिए एकीकृत वार्षिक कंदीन की जरूरत होती है। प्रदर्शित के लिए उन्हें सार्वजनिक भी किया जाना चाहिए। लेकिन आलोचनाओं से बचने के लिए या तो ऐसे मामले दबा दिए जाते हैं या फिर उनकी वास्तविक संख्या सार्वजनिक नहीं हो पाती। यदि किसी समस्या का अलग से आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं है तो उसकी व्यापकता, भौगोलिक पैटर्न और रोकथाम की रणनीति कैसे तय होगी? बिहार पुलिस और गृह विभाग को पिछले दस वर्षों के मामलों का एक अलग डेटाबेस तैयार करना चाहिए, जिले, थाना, घटना का प्रकार, पीड़ित की उम्र, प्राथमिकी, गिरफ्तारी, आरोपपत्र और न्यायिक परिणाम सहित। जिस समस्या को गिना नहीं जाता, उसे व्यवस्थित रूप से रोका भी नहीं जा सकता। क्या कानून कमजोर पड़ रहा है एक घटना के आधार पर पूरे बिहार के कानून-व्यवस्था तंत्र को कमजोर कहना उचित नहीं होगा। लेकिन ऐसी घटनाएं कानून के प्रभावी होने के बारे में एक गंभीर सवाल जरूर खड़ा करती हैं। कानून की ताकत केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने अपराधियों को गिरफ्तार किया गया। कानून की असली ताकत तब दिखाई देती है जब आम आदमी किसी दूसरे नागरिक की गरिमा का उल्लंघन करने से पहले यह सोचता है, “मुझे यह अधिकार नहीं है।” यदि भीड़ स्वयं पूछताछ करने लगे, स्वयं फैसला करने लगे और स्वयं सजा देने लगे तो कानून की औपचारिक मौजूदगी के बावजूद उसके सामाजिक प्रभाव पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जमुई की घटना में बाद की पुलिस कार्रवाई यह दिखाती है कि राज्य का औपचारिक तंत्र सक्रिय हो सकता है। लेकिन शासन की अगली जिम्मेदारी इससे आगे है, ऐसी मानसिकता को रोकना, जिसमें नागरिक कानून पर भरोसा करने के बजाय भीड़ पर भरोसा करने लगते हैं। क्या हमारी आजादी संवेदनाओं से खाली होती जा रही है यह प्रश्न किसी एक वर्ग, पीढ़ी या विचारधारा पर आरोप लगाने के लिए नहीं है। आजादी का अर्थ अपनी पसंद से जीना है, लेकिन दूसरे की गरिमा का सम्मान करते हुए। नैतिकता का अर्थ अपने संस्कारों को जीना है, लेकिन दूसरे पर अपने संस्कार थोपना नहीं। संस्कृति का अर्थ अपनी परंपरा को बचाना है, लेकिन किसी दूसरे की स्वतंत्रता का अपमान करना नहीं। और कानून का अर्थ यह है कि किसी को भी अपनी नैतिकता की निजी व्याख्या के आधार पर दूसरे व्यक्ति को दंड देने का अधिकार नहीं है। जमुई की घटना हमें इसी बुनियादी अंतर को समझने के लिए मजबूर करती है। हो सकता है समाज में कई लोगों को किसी युवक-युवती का साथ घूमना पसंद न हो। हो सकता है किसी को उनका व्यवहार अपने संस्कारों के अनुरूप न लगे। लेकिन असहमति का अधिकार, हिंसा का अधिकार नहीं है। संस्कार किसी को रोक सकते हैं, संस्कार किसी को तोड़ने की अनुमति नहीं देते। आम आदमी के लिए भी है एक आईना हर घटना के बाद हम पुलिस से सवाल करते हैं। प्रशासन से सवाल करते हैं। सरकार से सवाल करते हैं। करना भी चाहिए। लेकिन समाज से भी एक सवाल होना चाहिए। यदि हमारे सामने किसी युवक-युवती को कुछ लोग घेर लें तो क्या हम भीड़ में शामिल होंगे या पुलिस को फोन करेंगे? यदि किसी बच्चे का आपत्तिजनक वीडियो हमारे मोबाइल पर आए तो क्या हम उसे आगे भेजेंगे या वहीं रोक देंगे? यदि कोई व्यक्ति गलती करता दिखाई दे तो क्या हम कानून को सूचना देंगे या स्वयं दंड देने निकल पड़ेंगे? यही छोटे-छोटे फैसले समाज का चरित्र बनाते हैं। किसी की तस्वीर आगे न भेजना भी नैतिकता है। किसी कमजोर को घेरने के बजाय उसके पक्ष में खड़ा होना भी नैतिकता है। अपराध देखकर पुलिस को सूचना देना भी नागरिक धर्म है। और किसी की निजी जिंदगी को सार्वजनिक तमाशा न बनाना भी संस्कार है। जमुई से निकलनी चाहिए एक नई व्यवस्था इस घटना को केवल एक प्राथमिकी, कुछ गिरफ्तारियों और एक वायरल वीडियो के रूप में दर्ज करके भूल जाना सबसे आसान रास्ता होगा। लेकिन बेहतर रास्ता यह है कि जमुई को एक मॉडल केस बनाया जाए। जिले के संवेदनशील स्थानों का सुरक्षा ऑडिट हो। स्कूल और कोचिंग मार्गों की मैपिंग हो। शाम की पेट्रोलिंग को डेटा आधारित बनाया जाए। सीसीटीवी और प्रकाश व्यवस्था की समीक्षा हो। बाल संरक्षण इकाई और पुलिस के बीच त्वरित समन्वय हो। पॉक्सो मामलों में प्रशिक्षित अधिकारियों की उपलब्धता सुनिश्चित हो। साइबर पुलिस को डिजिटल साक्ष्य और पीड़ित की पहचान की सुरक्षा के लिए सक्रिय किया जाए। और प्रत्येक ऐसे मामले की जांच के बाद ‘क्या हुआ’ के साथ ‘क्यों हुआ’ और ‘अगली बार कैसे रोका जाएगा’ की प्रशासनिक रिपोर्ट तैयार हो क्योंकि अच्छी पुलिसिंग केवल अपराधी पकड़ने की कला नहीं है। अच्छी पुलिसिंग वह व्यवस्था है जिसमें अपराध होने की संभावना घटती जाए। अंतिम सवाल हम सबके सामने है जमुई के उन दो बच्चों के साथ जो हुआ, उसका दर्द शायद कुछ दिनों बाद समाचारों की भीड़ में दब जाएगा। वीडियो भी किसी नए वीडियो के नीचे खो जाएगा। अदालत अपना रास्ता चलेगी। पुलिस अपनी जांच करेगी। लेकिन समाज को यह तय करना है कि वह इस घटना से क्या लेकर आगे जाएगा। एक और वायरल वीडियो? कुछ गिरफ्तारियां? या एक ऐसी सीख कि किसी की गरिमा हमारे मनोरंजन से बड़ी है, किसी बच्चे का भविष्य हमारी जिज्ञासा से बड़ा है और कानून हमारी निजी नाराजगी से बड़ा है। हम अपने बच्चों को आजादी देना चाहते हैं। उन्हें सुरक्षित भी रखना चाहते हैं लेकिन सुरक्षा का अर्थ उनके चारों ओर भय की दीवार खड़ी करना नहीं है। उन्हें यह सिखाना होगा कि स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी आती है और हमें, बड़ों को, यह सीखना होगा कि बच्चों की रक्षा करने और बच्चों की जिंदगी पर पहरा देने में बहुत बड़ा अंतर है, जमुई की घटना इसी अंतर की पुकार है। भीड़ से समाज नहीं बनता। कानून से व्यवस्था बनती है। संवेदना से मनुष्य बनता है। और जब कानून और संवेदना साथ खड़े हों, तभी आजादी सुरक्षित रहती है। शायद इस घटना के बाद बिहार को यही संकल्प लेना चाहिए, नैतिकता के नाम पर किसी की गरिमा नहीं छीनी जाएगी। कानून के नाम पर भीड़ को अधिकार नहीं मिलेगा। और किसी बच्चे की आंखों में डर देखकर समाज अपनी आंखें नहीं फेर लेगा क्योंकि किसी सभ्य समाज की सबसे बड़ी पहचान उसके बड़े भवन, चौड़ी सड़कें या कठोर कानून नहीं होते। उसकी पहचान यह होती है कि जब कोई कमजोर पड़ता है, तब उसके चारों ओर खड़ी भीड़ तमाशबीन नहीं बनती, इंसान बनकर उसका बचाव करती है।