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(सिविल सर्विसेज अभ्यर्थियों के लिए विशेष) नई दिल्ली। भारत ने 26 अगस्त 2026 को मॉस्को में आयोजित रूस-भारत गोलमेज सम्मेलन में हिम तेंदुए के संरक्षण से जुड़ी अपनी विज्ञान आधारित उपलब्धियां प्रस्तुत कीं। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने जनसंख्या आकलन, रेडियो टेलीमेट्री और आनुवंशिक विश्लेषण जैसी तकनीकों के माध्यम से इस दुर्लभ प्रजाति की निगरानी में हुई प्रगति की जानकारी दी। यह सम्मेलन दिसंबर 2025 में अंतरक्षेत्रीय संघ ‘इरबिस’ और अंतरराष्ट्रीय बिग कैट एलायंस (आईबीसीए) के बीच हुए साझेदारी समझौते के अंतर्गत आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य हिम तेंदुए के अनुसंधान, निगरानी और संरक्षण में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना है। हिम तेंदुए का पारिस्थितिक महत्त्व हिम तेंदुआ (Panthera uncia) उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का शीर्ष शिकारी और प्रमुख संकेतक प्रजाति है। इसकी मौजूदगी से किसी क्षेत्र में स्वस्थ खाद्य शृंखला, पर्याप्त शिकार प्रजातियों और बेहतर प्राकृतिक आवास का संकेत मिलता है। इसका संरक्षण केवल एक वन्यजीव को बचाने तक सीमित नहीं है। इसके आवास की रक्षा से हिमालयी जैव विविधता, चरागाहों, हिमनदों और एशिया की बड़ी आबादी को पानी देने वाली नदियों के जलग्रहण क्षेत्र भी सुरक्षित होते हैं। इसलिए, हिम तेंदुए को एक ‘अंब्रेला स्पीशीज’ भी माना जा सकता है। यह अफगानिस्तान, भूटान, चीन, भारत, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, मंगोलिया, नेपाल, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान सहित 12 देशों में पाया जाता है। इस सीमा-पार वितरण के कारण इसका संरक्षण बहुपक्षीय सहयोग की मांग करता है। भारत में हिम तेंदुओं की स्थिति भारत के पहले वैज्ञानिक राष्ट्रव्यापी स्नो लेपर्ड पॉपुलेशन असेसमेंट इन इंडिया (एसपीएआई) के अनुसार देश में अनुमानित 718 हिम तेंदुए हैं। राज्य/केंद्रशासित प्रदेश अनुमानित संख्या लद्दाख 477 उत्तराखंड 124 हिमाचल प्रदेश 51 अरुणाचल प्रदेश 36 सिक्किम 21 जम्मू-कश्मीर 9 कुल 718 वर्ष 2019 से 2023 के बीच हुए आकलन में लगभग 1.20 लाख वर्ग किलोमीटर उच्च हिमालयी क्षेत्र को कवर किया गया। सर्वेक्षण के दौरान 13,450 किलोमीटर मार्गों का अध्ययन, 1,971 स्थानों पर कैमरा ट्रैप और लगभग 1.80 लाख ट्रैप-नाइट का उपयोग किया गया। कैमरों से 241 अलग-अलग हिम तेंदुओं की पहचान हुई। विज्ञान आधारित संरक्षण की भूमिका 1. जनसंख्या आकलन कैमरा ट्रैप, पदचिह्न, मल, बाल और चट्टानों पर खरोंच जैसे संकेतों से हिम तेंदुए की उपस्थिति एवं अनुमानित संख्या का पता लगाया जाता है। इससे संरक्षण संसाधनों को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में लगाया जा सकता है। 2. रेडियो टेलीमेट्री रेडियो अथवा सैटेलाइट कॉलर के जरिए हिम तेंदुए के विचरण क्षेत्र, प्रवास मार्ग, शिकार व्यवहार और मानव बस्तियों के आसपास उसकी गतिविधियों का अध्ययन होता है। यह वन्यजीव गलियारों की पहचान और विकास परियोजनाओं की योजना बनाने में उपयोगी है। 3. आनुवंशिक विश्लेषण बाल या मल से प्राप्त डीएनए के जरिए अलग-अलग जीवों की पहचान, लिंग अनुपात, आनुवंशिक विविधता और विभिन्न आबादियों के बीच संपर्क का पता चलता है। इससे छोटे एवं अलग-थलग समूहों में अंतःप्रजनन के खतरे को समझा जा सकता है। 4. भू-स्थानिक तकनीक जीआईएस, रिमोट सेंसिंग और उपग्रह चित्रों से आवास परिवर्तन, बर्फ के आवरण, वनस्पति, सड़क निर्माण तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का आकलन किया जा सकता है। भारत की प्रमुख संरक्षण पहलें प्रोजेक्ट स्नो लेपर्ड भारत ने हिम तेंदुए के संरक्षण के लिए परिदृश्य आधारित दृष्टिकोण अपनाया है। इसका उद्देश्य संरक्षित क्षेत्रों के साथ उन सामुदायिक और चरागाही क्षेत्रों को भी संरक्षण व्यवस्था में शामिल करना है, जहां हिम तेंदुए विचरण करते हैं। एसपीएआई और एसपीएआई 2.0 पहले एसपीएआई ने देश में हिम तेंदुए की आधारभूत संख्या उपलब्ध कराई। वन्यजीव सप्ताह 2025 में शुरू किया गया एसपीएआई 2.0 आबादी में बदलाव और संरक्षण उपायों के परिणामों की दीर्घकालीन निगरानी को मजबूत करेगा। एसईसीयूआरई हिमालय यह पहल उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और हिम तेंदुए जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा को स्थानीय समुदायों की आजीविका से जोड़ती है। अंतरराष्ट्रीय बिग कैट एलायंस भारत द्वारा शुरू किया गया आईबीसीए सात बड़ी बिल्ली प्रजातियों के संरक्षण के लिए देशों, वैज्ञानिक संस्थानों और संरक्षण संगठनों को साझा मंच प्रदान करता है। कानूनी संरक्षण हिम तेंदुए को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह आईयूसीएन की रेड लिस्ट में वल्नरेबल श्रेणी में शामिल है। संरक्षण के सामने प्रमुख चुनौतियां जलवायु परिवर्तन बढ़ते तापमान से हिमरेखा और वृक्षरेखा ऊपर की ओर खिसक रही है। इससे हिम तेंदुए के ठंडे, खुले पर्वतीय आवास सिकुड़ सकते हैं और सामान्य तेंदुए जैसी दूसरी प्रजातियों के साथ प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। आवास का विखंडन सड़क, सुरंग, जलविद्युत परियोजना, खनन और पर्यटन सुविधाओं का अनियोजित विकास हिम तेंदुए के आवास तथा प्राकृतिक गलियारों को विभाजित करता है। मानव-वन्यजीव संघर्ष प्राकृतिक शिकार कम होने पर हिम तेंदुए पालतू पशुओं का शिकार करते हैं। आर्थिक नुकसान के कारण पशुपालकों द्वारा जवाबी हत्या का खतरा पैदा होता है। शिकार प्रजातियों में कमी भरल, आइबेक्स, तहर और कस्तूरी मृग जैसी प्राकृतिक शिकार प्रजातियों का अवैध शिकार हिम तेंदुए के लिए भोजन की उपलब्धता कम करता है। अवैध वन्यजीव व्यापार हिम तेंदुए की खाल, हड्डियों और शरीर के दूसरे अंगों के लिए होने वाला शिकार एक गंभीर चुनौती है। दुर्गम सीमावर्ती क्षेत्र अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई को कठिन बनाते हैं। आंकड़ों और संस्थागत क्षमता की कमी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, कम घनत्व और हिम तेंदुए के छिपे व्यवहार के कारण नियमित निगरानी महंगी एवं तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है। स्थानीय समुदाय संरक्षण की कुंजी क्यों हैं? हिम तेंदुए के अधिकांश आवास संरक्षित क्षेत्रों के बाहर सामुदायिक भूमि और चरागाहों में स्थित हैं। इसलिए केवल पुलिसिंग या दंड आधारित व्यवस्था से संरक्षण सफल नहीं हो सकता। स्थानीय समुदायों की भागीदारी निम्न उपायों से बढ़ाई जा सकती है— पशुधन बीमा और नुकसान का समयबद्ध मुआवजा शिकारी-रोधी सुरक्षित पशु बाड़े स्थानीय युवाओं को वन्यजीव निगरानी में रोजगार समुदाय आधारित इको-टूरिज्म चरागाहों और प्राकृतिक शिकार प्रजातियों का प्रबंधन पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ना इससे संरक्षण की आर्थिक लागत स्थानीय लोगों पर डालने के बजाय उन्हें इसका भागीदार और लाभार्थी बनाया जा सकता है। भारत-रूस सहयोग का महत्त्व भारत और रूस दोनों हिम तेंदुए के प्राकृतिक वितरण वाले देश हैं। दोनों के बीच सहयोग से रेडियो टेलीमेट्री, आनुवंशिक डेटा, कैमरा ट्रैप तकनीक और सीमा-पार संरक्षण का अनुभव साझा किया जा सकता है। इसका व्यापक महत्त्व तीन स्तरों पर है— 1. वैज्ञानिक: तुलनात्मक अनुसंधान और मानकीकृत निगरानी पद्धति। 2. पारिस्थितिक: जुड़े हुए पर्वतीय आवासों एवं गलियारों की सुरक्षा। 3. कूटनीतिक: पर्यावरण और जैव विविधता को भारत की सॉफ्ट पावर एवं बहुपक्षीय नेतृत्व से जोड़ना। आगे की राह भारत को हिम तेंदुआ संरक्षण के लिए निम्न कदम उठाने चाहिए— डबल्यूआईआई में समर्पित हिम तेंदुआ प्रकोष्ठ स्थापित करना। निश्चित अंतराल पर वैज्ञानिक जनसंख्या आकलन कराना। महत्त्वपूर्ण आवासों और वन्यजीव गलियारों का कानूनी संरक्षण बढ़ाना। विकास परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन में संचयी प्रभाव और जलवायु जोखिम शामिल करना। सीमा-पार डीएनए और टेलीमेट्री डेटाबेस तैयार करना। पशुधन मुआवजा एवं बीमा प्रक्रिया को सरल और तेज बनाना। स्थानीय समुदायों, विशेषकर महिलाओं और युवाओं को संरक्षण आधारित आजीविका से जोड़ना। जीसीएलईपी और आईबीसीए जैसे मंचों से अनुसंधान, वित्त एवं तकनीक जुटाना। अवैध शिकार रोकने के लिए सीमा-पार खुफिया सहयोग मजबूत करना। निष्कर्ष मॉस्को सम्मेलन में भारत की भागीदारी दर्शाती है कि देश का वन्यजीव संरक्षण मॉडल अब केवल संरक्षित क्षेत्र और कानूनी सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, स्थानीय समुदाय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित हो रहा है। हिम तेंदुए का संरक्षण हिमालय की जैव विविधता, जल सुरक्षा और जलवायु स्थिरता से सीधा जुड़ा है। अतः ‘पहाड़ों के भूत’ को बचाना वास्तव में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और उस पर निर्भर करोड़ों लोगों के भविष्य को सुरक्षित करना है। यूपीएससी मुख्य परीक्षा में उपयोग यह विषय जीएस पेपर-III के पर्यावरण, जैव विविधता, वन्यजीव संरक्षण और विज्ञान-प्रौद्योगिकी खंड तथा जीएस पेपर-II के अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जोड़ा जा सकता है। सैंपल प्रश्न: “हिम तेंदुए का संरक्षण एक प्रजाति केंद्रित कार्यक्रम न होकर संपूर्ण उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा का माध्यम है।” विज्ञान आधारित निगरानी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के संदर्भ में विवेचना कीजिए।