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माटी का श्रृंगार : श्रृंखला–9 नोएडा (यूपी)। भारतीय मृद्भांड परंपरा केवल अतीत की विरासत नहीं बल्कि वर्तमान की जीवंत अर्थव्यवस्था भी है। यदि राजस्थान की ब्लू पॉटरी रंगों की शाही संस्कृति का प्रतीक है, खुर्जा भारतीय सिरेमिक की ऐतिहासिक राजधानी है और गोरखपुर अपनी प्राकृतिक लाल टेराकोटा के लिए प्रसिद्ध है, तो गुजरात का खावड़ा और मोरबी भारतीय मिट्टी की दो विपरीत, किंतु एक-दूसरे की पूरक यात्राओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक ओर कच्छ के रण में सदियों पुरानी लोककला आज भी हाथों की ऊष्मा से जीवित है, तो दूसरी ओर मोरबी की आधुनिक भट्टियाँ भारतीय सिरेमिक उद्योग को विश्व के मानचित्र पर स्थापित कर रही हैं। गुजरात की यही विशेषता है कि यहाँ मिट्टी केवल चाक पर नहीं घूमती, बल्कि संस्कृति, विज्ञान, तकनीक और वैश्विक व्यापार के साथ आगे बढ़ती है। खावड़ा की लाल-भूरी पॉटरी भारतीय लोकस्मृति का दस्तावेज़ है, जबकि मोरबी की चमकदार सिरेमिक टाइलें आधुनिक भारत की औद्योगिक शक्ति का प्रतीक हैं। खावड़ा : जहां मिट्टी में अब भी सुनाई देती है हड़प्पा की प्रतिध्वनि भुज से लगभग 70 किलोमीटर उत्तर और धोलावीरा से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर, महान रण की सीमा पर स्थित छोटा-सा खावड़ा गांव भारतीय लोक-पॉटरी की सबसे विशिष्ट परंपराओं में गिना जाता है। यद्यपि इस कला को अभी तक भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) प्राप्त नहीं हुआ है, फिर भी गुजरात हस्तशिल्प विकास निगम, खमीर, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिज़ाइन तथा आईआईसीडी जैसे संस्थानों के सहयोग से यह कला विश्वभर में पहचान बना चुकी है। इतिहासकार वर्तमान खावड़ा पॉटरी को सीधे हड़प्पा सभ्यता से नहीं जोड़ते, किंतु धोलावीरा में प्राप्त लाल पृष्ठभूमि पर काले चित्रांकन वाले पात्र और खावड़ा की वर्तमान शैली के बीच आश्चर्यजनक समानताएं दिखाई देती हैं। यही कारण है कि यह कला भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन मृद्भांड परंपराओं की जीवित उत्तराधिकारी मानी जाती है। रण की मिट्टी, परिवार का श्रम खावड़ा की आत्मा उसकी स्थानीय चिकनी मिट्टी है, जो रण के किनारों और झील क्षेत्रों से प्राप्त होती है। मिट्टी को कई दिनों तक भिगोया जाता है, छाना जाता है और बार-बार गूंथकर अत्यंत मुलायम बनाया जाता है। पुरुष कारीगर पारंपरिक चाक पर आकार देते हैं, लकड़ी और गोबर से चलने वाली भट्ठियों में बर्तन पकाए जाते हैं और फिर महिलाएं बांस की पतली कलम से काले तथा सफेद प्राकृतिक रंगों में हजारों सूक्ष्म बिंदुओं के माध्यम से चित्रांकन करती हैं। यही डॉट पेंटिंग शैली खावड़ा पॉटरी को भारत की अन्य सभी पॉटरी परंपराओं से अलग पहचान देती है। लुप्त होती विरासत, फिर भी जीवित उम्मीद एक समय खावड़ा में लगभग 40–50 कारीगर परिवार इस शिल्प से जुड़े थे। आज सक्रिय परिवारों की संख्या घटकर लगभग 15–20 रह गई है और कुल मिलाकर केवल 70 से 100 कारीगर ही इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। पूरा परिवार इस कला में सहभागी होता है—पुरुष चाक चलाते हैं, महिलाएं चित्रांकन करती हैं और युवा विपणन व डिज़ाइन का दायित्व संभालते हैं। यहां घड़े, सुराहियाँ, दीये, फूलदान, प्लांटर, वॉल प्लेट, कॉफी मग, टाइलें, लैंपशेड और आधुनिक गृह-सज्जा की अनेक वस्तुएं बनाई जाती हैं। यद्यपि इसका निर्यात सीमित है, फिर भी अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के अनेक देशों तक इसके उत्पाद पहुंच रहे हैं। रण उत्सव में आने वाले हजारों विदेशी पर्यटक भी इस कला को विश्व के विभिन्न देशों तक ले जाते हैं। मोरबी : जहां मिट्टी ने उद्योग का रूप लिया यदि खावड़ा लोककला की आत्मा है, तो मोरबी आधुनिक भारत की औद्योगिक चेतना है। कभी पारंपरिक कुम्हारों का क्षेत्र रहा मोरबी आज भारत की सिरेमिक राजधानी और विश्व के सबसे बड़े सिरेमिक क्लस्टरों में से एक बन चुका है। यहां वर्तमान में 1,000 से अधिक टाइल एवं सिरेमिक निर्माण इकाइयां कार्यरत हैं। भारत के कुल सिरेमिक टाइल उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत अकेले मोरबी क्लस्टर से होता है। इस उद्योग से 5 से 6 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त है। मोरबी का वार्षिक सिरेमिक कारोबार ₹50,000 करोड़ से अधिक आंका जाता है, जिसने इसे देश के सबसे बड़े एमएसएमई औद्योगिक क्लस्टरों में शामिल कर दिया है। मिट्टी से विश्व बाज़ार तक मोरबी में अब केवल घड़े और सुराहियां नहीं बनतीं। यहां विट्रिफाइड टाइलें, पोर्सिलेन स्लैब, सैनिटरीवेयर, टेबलवेयर, विद्युत इन्सुलेटर और औद्योगिक सिरेमिक सहित अनेक उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार किए जाते हैं। आधुनिक गैस आधारित भट्टियाँ, डिजिटल प्रिंटिंग तकनीक और स्वचालित उत्पादन प्रणाली ने इस उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अग्रणी बना दिया है। मोरबी से निर्मित उत्पाद आज 150 से अधिक देशों, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, अफ्रीका, यूरोप और लैटिन अमेरिका सहित निर्यात किए जाते हैं। भारत के कुल सिरेमिक निर्यात में सबसे बड़ी हिस्सेदारी इसी क्लस्टर की है। दो नगर, एक संदेश खावड़ा और मोरबी... दोनों गुजरात की मिट्टी की दो अलग-अलग यात्राएं हैं। एक यात्रा लोककला की है, जहां हर बिंदु में इतिहास सांस लेता है। दूसरी यात्रा उद्योग की है, जहां वही मिट्टी आधुनिक तकनीक के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी बन जाती है। एक ओर खावड़ा की भट्ठी हमें हमारी सांस्कृतिक जड़ों की याद दिलाती है, दूसरी ओर मोरबी की आधुनिक भट्टियां बताती हैं कि परंपरा यदि विज्ञान और उद्यमिता से जुड़ जाए, तो वही मिट्टी विश्व बाज़ार का नेतृत्व कर सकती है। माटी का संदेश धरती की गोद से निकली मिट्टी कभी घड़ा बनती है, कभी दीपक, कभी कलाकृति और कभी विश्वस्तरीय सिरेमिक। रूप बदलते हैं, पर उसकी आत्मा वही रहती है। गुजरात की यह कहानी बताती है कि सभ्यता केवल स्मारकों से नहीं बनती, वह उन हाथों से बनती है जो मिट्टी को आकार देते हैं। जब खावड़ा का लाल-भूरा पात्र किसी घर की शोभा बढ़ाता है और मोरबी की सिरेमिक टाइल किसी आधुनिक भवन की दीवार बनती है, तब दोनों मिलकर एक ही सत्य कहते हैं... भारतीय माटी केवल अतीत की धरोहर नहीं, भविष्य की भी सबसे मजबूत नींव है।