Full Story
(संजय कौशिक की विशेष रिपोर्ट) काठमांडू/मोतिहारी। भोटेकोशी में अब पहले की तरह उफान नहीं है। पहाड़ों के बीच बहती नदी शांत होने लगी है। लेकिन उसका पानी खोए रिश्तों की पहचान की तरह अब भी धुंधला और मटमैला है। इसी धुंधले पानी और उसके मलबा में लोग उन्हें ढूंढ रहे हैं जिन्हें 26 अगस्त को खो दिया। ऐसे हजारों लोग अभी भी लापता हैं। कुछ के शव और कटे-फटे अंग मिले हैं लेकिन पहचान नहीं। वे अनाम ही नहीं हैं इनकी लैंगिक पहचान तक सैलाब ने छीन ली है। त्रासदी का यह सबसे भयावह रूप है। 11 दिनों बाद भी तलाश खत्म नहीं हुई है। कहीं मलबे में कोई अपने घर की तलाश कर रहा है। कहीं हाथ में किसी की तस्वीर है और आंखें उस चेहरे को पहचानने की कोशिश कर रही हैं। कहीं किसी परिवार की आखिरी उम्मीद एक डीएनए रिपोर्ट पर टिकी है। इस आपदा की भयावहता अब सिर्फ मौतों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। अनाम ही दफन हो गये 1030 अब तक 1,342 शव या मानव शरीर के कटे-फटे अंग बरामद किए जा चुके हैं। इनमें केवल 96 की पहचान हो सकी है। 1,030 शवों या मानव अवशेषों को बिना पहचान के दफना दिया गया है। उन्हें न तो अपने मिले और न अपनों का कंधा। शेष को अभी अंतिम यात्रा का इंतजार है। इन 1,030 अनाम दफन शवों की कहानी भी एक जैसी नहीं है। किसी के शरीर की चमड़ी छिल गयी है तो किसी के चेहरे को पहचान, किसी का आधा शरीर मिला, तो का केवल पैर या हाथ ही मिल पाया। ऐसे शवों को कोई पहचान नहीं मिल पाई। उनके अनाम दफ़न होने के बाद भी अपने ढूंढ रहे है। सैलाब ने इंसान से लैंगिक पहचान तक छीन ली सैलाब ने इंसान को केवल मौत नहीं दी। उसने उससे उसकी लैंगिक पहचान तक छीन ली। नाम चला गया। चेहरा चला गया। पहचान का वह सबसे बुनियादी संकेत भी चला गया जिससे यह कहा जा सके कि मृत शरीर किसी महिला का था या किसी पुरुष का। किसी प्राकृतिक आपदा के बारे में शायद ही कभी ऐसा कहा जा सके कि उसने मनुष्य की पहचान की इतनी गहरी परतों को मिटा दिया हो। बगैर पहचान के दफ़न किये गए 222 महिलाओं और 355 पुरुषों के शव अथवा मानव अवशेष ऐसे थे, जिनका लिंग निर्धारित किया जा सका। लेकिन बाकी 453 शव और अवशेष इतने क्षत-विक्षत थे कि यह तक तय करना संभव नहीं हो पाया कि वे किसी महिला के थे या पुरुष के। भोटेकोशी की त्रासदी का ऐसा भयावह पक्ष है जो पीड़ा को कल्पनाओं से भी परे एक विराट स्वरूप देता है। यह आंकड़ा इसलिए भयावह नहीं है कि इसमें 453 लिखा है। यह इसलिए भयावह है क्योंकि केवल मानव अवशेष हैं, ऐसे अवशेष जिन्हें विज्ञान भी लैंगिक पहचान देने में विफल रहा है। इनका भी कोई नाम था। किसी से रिश्ता था। कोई ढूंढ रहा है। किसी को उनके लौट आने का इंतजार है। न शव मिला, न जीवित होने का संदेश किसी प्रियजन के लापता होने का दुख मृत्यु की खबर से अलग होता है। मृत्यु कम-से-कम एक अंत देती है। लापता होने की स्थिति अंत को टाल देती है। परिवार दरवाजे की ओर देखता रहता है। फोन की घंटी सुनकर उठता है। किसी सूची में नाम खोजता है। किसी तस्वीर पर ठहरता है। फिर किसी अज्ञात शव की सूचना पढ़ता है। जिन्हें न शव मिला है, न जीवित होने का संदेश... उनके लिए त्रासदी अभी पूरी नहीं हुई है। डीएनए से पहचान की आस नेपाल में मृतकों की पहचान के लिए 2,272 डीएनए नमूने जुटाए गए हैं। इनमें 1,260 नमूने शवों से और 1,012 संभावित रिश्तेदारों से लिए गए हैं। नेपाल पुलिस ने 1,270 अज्ञात शवों का विवरण अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध कराया है, ताकि परिवार अपने लापता परिजनों की तलाश कर सकें। अब किसी चेहरे की जगह डीएनए बोल सकता है। किसी नाम की जगह प्रयोगशाला की रिपोर्ट आ सकती है। और शायद किसी परिवार को एक दिन यह पता चल सके कि जिस व्यक्ति की वे तलाश कर रहे थे, वह उन अनाम शवों में से एक था। ऐसी खबर उन्हें वर्षों तक खिंचते रहने वाले इंतजार से मुक्ति दिलाएगी। क्योंकि शोक का भी एक चेहरा होता है।और वह चेहरा तब बनता है, जब मौत को पहचान मिलती है। अनाम को नाम देने की चुनौती नेपाल ने प्रभावित क्षेत्रों में खोज एवं बचाव, राहत वितरण, शवों की बरामदगी और अन्य आपात अभियानों के लिए 7,912 अधिकारियों को तैनात किया है। विभिन्न जिलों में बनाए गए आश्रय केंद्रों में करीब 3,240 लोगों को रखा गया है। बाढ़ के खतरे वाले क्षेत्रों से परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का काम भी जारी है। लेकिन, किसी आपदा में सबसे कठिन बचाव हमेशा मलबे से इंसान को निकालना नहीं होता। कभी-कभी सबसे कठिन काम होता है, एक अज्ञात शव को उसका नाम लौटाना। वह भी वैसी स्थिति में जब मौत ने महिला और पुरूष होने आए अंतर की पहचान को भी खुरचकर था दिया हो। भोटेकोशी के किनारे अब यही काम चल रहा है। मलबा हटाया जा रहा है। शव खोजे जा रहे हैं। नमूने लिए जा रहे हैं। सूचियां तैयार की जा रही हैं। तस्वीरें साझा की जा रही हैं। हर प्रक्रिया के पीछे किसी परिवार की एक छोटी-सी उम्मीद है। शायद यही वह चेहरा है जिसे आपदा के आंकड़े छिपा देते हैं। खामोश इंतजार 1,342 शव या मानव अवशेष बरामद। केवल 96 की पहचान। 1,030 अनाम दफन। और उनमें 453 ऐसे, जिनकी लैंगिक पहचान तक मिट चुकी है। ये आंकड़े किसी खबर या रिपोर्ट की सुर्खियां हो सकते हैं। लेकिन इनके पीछे उन घरों की खामोशी है, जहां किसी की कुर्सी अब भी खाली है। किसी कमरे में सामान अब भी रखा है। किसी फोन में आखिरी तस्वीर अब भी सुरक्षित है। और किसी मां, पिता, पत्नी, पति या बच्चे को अब भी यह नहीं मालूम कि उनका अपना कहां है। भोटेकोशी ने पहाड़ों से उतरकर घाटियों को रौंद दिया।लेकिन उसकी सबसे गहरी चोट शायद पानी के निशान से दिखाई नहीं देती। वह उन परिवारों के भीतर है, जिनके पास रोने के लिए भी पूरा सच नहीं है। मौत ने उनसे उनके अपने छीन लिए। सैलाब ने उनसे उनकी पहचान भी छीन ली। महिला और पुरुष की शिनाख्त के चिन्ह तक खर्च डाले। ऐसे में नदी के किनारे अब सबसे बड़ी तलाश किसी घर, सड़क या पुल की नहीं है। तलाश उन नामों की है, जिन्हें भोटेकोशी अपने साथ बहा ले गई।



Comments
0