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पटना। बिहार में ग्रामीणों को रोजगार देने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) योजना पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट ने कई गंभीर खामियां उजागर की हैं, जिसमें वर्ष 2019-24 के दौरान शुरू किए गए 1.21 करोड़ कामों में से सिर्फ 44.73 लाख के पूरा होने, 63 प्रतिशत योजनाओं के नवंबर 2024 तक अधूरे रहने, मजदूरों के 735 करोड़ रुपये से अधिक के भुगतान में देरी और योजना के 44 प्रतिशत पद खाली होने का खुलासा हुआ है। विधानसभा के मॉनसून सत्र में उप मुख्यमंत्री बिजेंद्र यादव द्वारा सदन के पटल पर रखी गई भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2019 से 2024 के बीच राज्य में 1.21 करोड़ काम शुरू किए गए, लेकिन इनमें सिर्फ 44.73 लाख यानी 37 प्रतिशत काम ही पूरे हो सके , जबकि 76.27 लाख काम यानी 63 प्रतिशत नवंबर 2024 तक अधूरे या जारी थे। हर 10 में से छह से ज्यादा काम पूरे नहीं हुए मनरेगा का उद्देश्य गांवों में लोगों को रोजगार देने के साथ सड़क, तालाब, नहर, पौधारोपण और जल संरक्षण जैसी स्थायी संपत्तियां तैयार करना है। लेकिन सीएजी के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में शुरू हुए हर 10 कामों में से छह से अधिक तय समय में पूरे नहीं हुए।यानी बड़ी संख्या में योजनाओं पर मजदूरी और सामग्री का खर्च होने के बावजूद उनका पूरा लाभ ग्रामीणों को समय पर नहीं मिल पाया। रिपोर्ट में अधूरे कामों की इतनी बड़ी संख्या को योजना के कमजोर क्रियान्वयन की बड़ी निशानी माना गया है। 735 करोड़ रुपये की मजदूरी समय पर नहीं मिली मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों को समय पर पैसा मिलना चाहिए, लेकिन रिपोर्ट में सामने आया कि 2019 से 2024 के बीच मजदूरों को किए गए कुल ₹20,374.91 करोड़ के भुगतान में से ₹735.10 करोड़ का भुगतान देर से हुआ। यह देरी कहीं 16 दिन तो कहीं 90 दिन से भी अधिक रही। यानी काम करने के बाद भी हजारों मजदूरों को अपनी मजदूरी के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा। देरी का मुआवजा भी लगभग नहीं मिला नियम के अनुसार मजदूरी देर से मिलने पर मजदूरों को मुआवजा दिया जाना चाहिए। लेकिन, सीएजी ने पाया कि देरी से भुगतान के बदले किए गए कुल दावों में से केवल 4.19 प्रतिशत दावों को ही मंजूरी मिली। रिपोर्ट के मुताबिक मजदूरों के 10.03 करोड़ मानव दिवस से जुड़े मुआवजा दावों में से सिर्फ 0.42 करोड़ मानव दिवस के दावे स्वीकार किए गए। यानी अधिकतर मजदूरों को भुगतान की देरी का मुआवजा भी नहीं मिल सका। मनरेगा के 44 प्रतिशत पद खाली योजना को चलाने के लिए राज्य में 13,798 पद मंजूर थे लेकिन इनमें से 6,086 पद खाली मिले। यह कुल पदों का करीब 44 प्रतिशत है। कुछ पदों पर खाली जगहों की स्थिति और भी खराब थी। जिला कार्यक्रम अधिकारियों के मामले में रिक्तियां 16 प्रतिशत थीं जबकि कंप्यूटर ऑपरेटरों के पदों पर यह संख्या 80 प्रतिशत तक पहुंच गई। एक लाख से ज्यादा प्रशिक्षित मेट, तैनात सिर्फ 25 प्रतिशत राज्य में मनरेगा कार्यों की निगरानी के लिए 1,05,253 मेट को प्रशिक्षण दिया गया लेकिन दिसंबर 2024 तक इनमें से केवल 26,278 मेट , यानी करीब 25 प्रतिशत , ही तैनात किए गए। कर्मचारियों और मेट की कमी के कारण जॉब कार्ड अपडेट नहीं होने, कर्मचारियों की उपस्थिति में गड़बड़ी और मजदूरों की काम की मांग सही ढंग से दर्ज नहीं होने जैसी समस्याएं सामने आईं। 1.42 लाख परिवारों को जॉब कार्ड तक नहीं मिला सीएजी रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य में 1,42,746 पंजीकृत परिवारों को जॉब कार्ड जारी नहीं किए गए थे। जॉब कार्ड के बिना परिवार मनरेगा में काम मांगने के अपने अधिकार का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर सकते। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि वर्ष 2019 से 2024 के दौरान कुल और सक्रिय जॉब कार्डों का सत्यापन भी पूरी तरह नहीं किया गया। 1,903 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान बाकी मार्च 2024 तक मजदूरी और सामग्री से जुड़ी कुल 1,903.58 करोड़ रुपये की देनदारी बाकी थी। इसमें 302.24 करोड़ रुपये की राशि वर्ष 2019-20 से पहले की अवधि से लंबित चली आ रही थी। इसके अलावा अलग-अलग एजेंसियों के पास 36.22 करोड़ रुपये से ज्यादा की अग्रिम राशि पांच वर्षों से अधिक समय से समायोजित नहीं हुई थी। सोशल ऑडिट के नाम पर सिर्फ एक चौथाई जांच मनरेगा के कामों की गांव के स्तर पर सोशल ऑडिट के जरिए जांच होनी चाहिए। चयनित जिलों में 2019 से 2024 के बीच 13,340 सोशल ऑडिट होने थे लेकिन सिर्फ 3,454 ऑडिट किए गए। इसका मतलब है कि तय ऑडिट का केवल 25.89 प्रतिशत ही पूरा हुआ। यानी लगभग तीन चौथाई योजनाओं की जरूरी सामाजिक जांच नहीं हो सकी। ऑडिट की 96 प्रतिशत आपत्तियां लंबित जो सोशल ऑडिट हुए, उनमें सामने आई गड़बड़ियों पर भी कार्रवाई बेहद धीमी रही। चयनित ग्राम पंचायतों में सोशल ऑडिट के दौरान दर्ज की गई कुल टिप्पणियों और आपत्तियों में से 96 प्रतिशत का निपटारा बाकी था। यह आंकड़ा बताता है कि गड़बड़ियां सामने आने के बाद भी उन्हें ठीक करने और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया लगभग ठप रही। बिना सही आकलन के चलती रही योजना रिपोर्ट के अनुसार, साल 2019 से 2024 के बीच विभाग के पास ऐसी कोई ठोस व्यवस्था नहीं थी, जिससे पंचायत स्तर पर यह पता लगाया जा सके कि कितने लोगों को रोजगार चाहिए, किस समय काम की जरूरत है और गांवों में रोजगार तथा आजीविका की स्थिति में क्या बदलाव आया है। चयनित जिलों में वर्ष 2020 से 2025 के लिए जिला परिप्रेक्ष्य योजना भी तैयार नहीं की गई, जिससे मनरेगा के कामों को दूसरी सरकारी योजनाओं से जोड़ने के अवसर छूट गए। सीएजी की रिपोर्ट ने व्यवस्था पर खड़े किए गंभीर सवाल सीएजी की रिपोर्ट से साफ है कि बिहार में मनरेगा की समस्या केवल काम पूरा नहीं होने तक सीमित नहीं है। मजदूरी में देरी, खाली पद, जॉब कार्ड नहीं मिलना, भारी बकाया, कमजोर निगरानी और सोशल ऑडिट की आपत्तियों पर कार्रवाई न होना—ये सभी कमियां उस योजना को कमजोर कर रही हैं, जिसे ग्रामीण गरीबों के लिए रोजगार की गारंटी माना जाता है।