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सूरज कुमार सिंह पटना। जेल की ऊंची दीवारें सिर्फ इंसानों को ही कैद नहीं करतीं बल्कि उनके भीतर पल रहे डर, उम्मीद और भविष्य को भी अपने साये में ढक लेती हैं, ऐसे में कल्पना कीजिए उस तरुण बंदी की, जिसकी उम्र अभी जिंदगी को समझने और सुधार का अवसर पाने की है लेकिन अगर उसकी हर सुबह उग्रवाद, संगीन अपराध और खूंखार वारदातों के लिए पहचाने जाने वाले बंदियों के बीच खुलती हो तो उसके मन में उतरने वाले भय, असुरक्षा और खामोश मानसिक संघर्ष को समझना मुश्किल नहीं। बिहार में पटना के आदर्श केंद्रीय कारा, बेउर में हाल में हुई औचक जांच ने इसी सवाल को सबसे तीखे ढंग से सामने ला खड़ा किया। जांच में खुलासा हुआ कि उच्च सुरक्षा कक्ष में रखे जाने वाले तरुण बंदियों को उग्रवादी और कुख्यात बंदियों के साथ रखा गया था। लेकिन, यह जांच सिर्फ यहीं नहीं रुकी। इसके साथ ही होटल से खाना मंगाने की व्यवस्था, अवैध मेस संचालन, कैंटीन में एमआरपी (मैक्सिमम रिटेल प्राइस) से अधिक कीमत पर सामान की बिक्री, बाहर से खाद्य सामग्री की आपूर्ति, निम्न गुणवत्ता का भोजन, टेलीफोन नियमों की अनदेखी, लेखा-पंजी में गड़बड़ियां, जांच टीम से असहयोग, अवैध सुविधाएं और कथित अवैध वसूली जैसी अनेक गंभीर अनियमितताओं ने यह संकेत दिया कि बेउर जेल की दीवारों के भीतर एक ऐसी व्यवस्था आकार ले चुकी थी, जो नियमों से नहीं बल्कि अपने अलग ढंग से संचालित हो रही थी। तरुण बंदी... और उनके साथ उग्रवादी एवं कुख्यात गृह विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, जांच दल ने पाया कि उच्च सुरक्षा कक्ष में रखे जाने वाले तरुण (नौजवान) बंदियों को उग्रवादी और कुख्यात बंदियों के साथ रखा गया था। यह महज आवास की एक प्रशासनिक गलती नहीं मानी जा सकती। जेल व्यवस्था में बंदियों का वर्गीकरण सुधारात्मक प्रक्रिया की बुनियाद होता है। कम उम्र या तरुण बंदियों को अनुभवी अपराधियों और उग्रवादी कैदियों से अलग रखने का उद्देश्य यही होता है कि उन पर अपराधी मानसिकता का नकारात्मक प्रभाव न पड़े। लेकिन, बेउर जेल में यही मूल सिद्धांत टूटता हुआ मिला। यह तथ्य इसलिए भी अधिक गंभीर माना गया क्योंकि यह सीधे सुरक्षा, सुधार और जेल प्रबंधन तीनों पहलुओं को प्रभावित करता है। जेल के भीतर चलता था अपना 'सिस्टम' निरीक्षण में सामने आया कि जेल के भीतर कुछ बंदियों द्वारा अवैध रूप से मेस का संचालन किया जा रहा था। अलग-अलग वार्डों में गुट बनाकर भोजन की व्यवस्था बनाई गई थी यानी सरकारी भोजन व्यवस्था के समानांतर एक अनौपचारिक व्यवस्था विकसित हो चुकी थी, जो यह सवाल उठाती है कि आखिर इतनी बड़ी गतिविधि प्रशासन की जानकारी के बिना कैसे चल सकती थी। होटल से सीधे जेल तक खाना जेल के भीतर होटल का खाना पहुंचना किसी सामान्य लापरवाही का मामला नहीं माना जा सकता। जांच में पाया गया कि कुछ बंदी बाहर के होटल से खाना मंगा रहे थे। जिस जगह हर वस्तु की जांच होती है और हर आवाजाही दर्ज होती है, वहां बाहरी भोजन का इस तरह पहुंचना सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। कैंटीन भी सवालों के घेरे में जेल कैंटीन में सामान एमआरपी से अधिक कीमत पर बेचा जा रहा था। जेल में रहने वाले बंदियों के पास विकल्प सीमित होते हैं। ऐसे में निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत वसूलना सिर्फ वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि बंदियों के शोषण का मामला भी माना जा सकता है।निरीक्षण रिपोर्ट में बंदियों को दिए जा रहे भोजन की गुणवत्ता को बेहद निम्न स्तर का बताया गया है। भोजन केवल सुविधा नहीं बल्कि बंदियों का कानूनी अधिकार भी है। ऐसे में निम्न स्तर का भोजन जेल प्रशासन की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जेल के बाहर से आती थीं सब्जियां और अन्य सामान जांच में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। आदेशों के अनुसार, कुछ अधिकारियों की कथित मिलीभगत से बंदियों के लिए जेल के बाहर से सब्जी, बेसन, केला सहित अन्य सामग्री मंगाई जा रही थी। इससे यह संकेत मिला कि जेल के भीतर वस्तुओं की आपूर्ति के लिए समानांतर व्यवस्था विकसित हो चुकी थी, जो निर्धारित प्रक्रिया से बाहर थी। टेलीफोन व्यवस्था भी नियमों से बाहर जांच में पाया गया कि जेल के भीतर टेलीफोन के इस्तेमाल में तय नियमों का पालन नहीं किया जा रहा था। संचार व्यवस्था किसी भी जेल की सुरक्षा का अहम हिस्सा होती है। ऐसे में इसकी निगरानी में कमी सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी चिंता का विषय मानी जाती है। रिकॉर्ड भी ठीक नहीं मिले निरीक्षण के दौरान लेखा-पंजी और अभिलेखों के रखरखाव में भी गंभीर कमियां मिलीं। रिकॉर्ड प्रबंधन किसी भी सरकारी संस्था की पारदर्शिता का आधार होता है। जब वही व्यवस्थित न मिले तो प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जांच टीम को भी नहीं मिला पूरा सहयोग औचक जांच के दौरान कुछ अधिकारियों पर जांच टीम को आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने, जांच को प्रभावित करने और उसे दिग्भ्रमित करने की कोशिश करने के आरोप भी लगे। आदेशों में यह भी दर्ज है कि जांच के दौरान अधिकारियों ने बिना सुरक्षा व्यवस्था के जांच दल को बंदियों के बीच छोड़ दिया। इसे गंभीर अनुशासनहीनता माना गया है। अवैध सुविधाएं और अवैध वसूली के संकेत जांच रिपोर्ट में बंदियों को अवैध सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने और अवैध वसूली होने का भी उल्लेख है। यदि ये आरोप विभागीय जांच में सिद्ध होते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत लापरवाही नहीं बल्कि संस्थागत स्तर पर विकसित हो चुकी एक समानांतर व्यवस्था की ओर संकेत करेंगे। सरकार की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी सरकारी आदेश का सबसे अहम हिस्सा शायद उसका अंतिम निष्कर्ष है। सरकार ने साफ लिखा है कि जांच में सामने आई अनियमितताएं आकस्मिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक और संस्थागत प्रकृति की हैं। यानी यह किसी एक दिन की चूक नहीं बल्कि लंबे समय से चली आ रही व्यवस्थागत खामियों का परिणाम है। यही टिप्पणी पूरे मामले को और गंभीर बना देती है। कार्रवाई सिर्फ व्यक्तियों पर नहीं, जवाबदेही पर भी जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद सरकार ने तत्काल प्रभाव से उपाधीक्षक अजय कुमार, सहायक अधीक्षक मनीष कुमार ठाकुर, सहायक अधीक्षक अभिषेक कुमार, सहायक अधीक्षक कुंदन कुमारी और सहायक अधीक्षक शालिनी को निलंबित कर दिया। पांचों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू करने का भी आदेश दिया गया है। सरकारी आदेशों में इन अधिकारियों की भूमिका अलग-अलग संदर्भों में चिन्हित की गई है, लेकिन कार्रवाई का संदेश एक ही है, जेल जैसी संवेदनशील संस्था में प्रशासनिक लापरवाही, नियमों की अनदेखी और कथित मिलीभगत को अब केवल विभागीय कमी मानकर नहीं छोड़ा जाएगा। यह निलंबन केवल पांच अधिकारियों के विरुद्ध उठाया गया कदम नहीं, बल्कि उस जवाबदेही की शुरुआत भी है, जिसकी कमी ने बेउर जेल के भीतर एक ऐसी समानांतर व्यवस्था को पनपने दिया, जहां नियम धीरे-धीरे अपनी प्रभावशीलता खोते चले गए। इस सवाल का जवाब अब विभागीय जांच ही देगी। लेकिन इतना तय है कि बेउर जेल की यह औचक जांच सिर्फ पांच निलंबनों की खबर नहीं, बल्कि बिहार की जेल व्यवस्था के सामने खड़े उन सवालों का आईना है, जिन्हें लंबे समय से शायद नजरअंदाज किया जाता रहा।