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अंतर्राष्ट्रीय संबंध: यूपीएससी Mains Exam नई दिल्ली। भारत और अमेरिका आज दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक देशों में गिने जाते हैं। पिछले दो दशकों में दोनों देशों के रिश्ते लगातार मजबूत हुए हैं। रक्षा, व्यापार, आधुनिक तकनीक, ऊर्जा, अंतरिक्ष और हिंद-प्रशांत क्षेत्र (इंडो-पैसिफिक) जैसे कई क्षेत्रों में दोनों साथ मिलकर काम कर रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर कुछ ऐसे मुद्दे भी हैं, जिन पर दोनों देशों की सोच अलग है। यही कारण है कि भारत-अमेरिका संबंधों को अक्सर "सहयोग और मतभेद का संतुलन" कहा जाता है। हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत आए। इस दौरे का उद्देश्य दोनों देशों के रिश्तों में आई कुछ दूरियों को कम करना और भविष्य की रणनीति तय करना था। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर भारत और अमेरिका इतने करीबी क्यों हैं और किन मुद्दों पर उनके बीच मतभेद हैं। भारत और अमेरिका एक-दूसरे के इतने करीब क्यों आए अगर 25–30 साल पहले की बात करें तो भारत और अमेरिका के रिश्ते इतने मजबूत नहीं थे लेकिन समय के साथ दुनिया की राजनीति बदली और दोनों देशों के हित भी एक-दूसरे से जुड़ने लगे। खासकर चीन के बढ़ते प्रभाव ने भारत और अमेरिका को एक-दूसरे के और करीब ला दिया। दोनों देशों का मानना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में किसी एक देश का दबदबा नहीं होना चाहिए। इसी सोच के तहत भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने मिलकर क्वाड (चतुष्कोणीय सुरक्षा संवाद) बनाया। इसका उद्देश्य किसी देश के खिलाफ युद्ध करना नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, तकनीकी सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना है। रक्षा क्षेत्र में दोस्ती पहले से कहीं ज्यादा मजबूत एक समय था जब भारत केवल अमेरिका से हथियार खरीदता था। लेकिन अब दोनों देशों का रिश्ता इससे कहीं आगे बढ़ चुका है। अब दोनों मिलकर हथियार और रक्षा तकनीक विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। भारत और अमेरिका के बीच तीन महत्वपूर्ण रक्षा समझौते हुए हैं— * लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज समझौता (लेमोआ) – दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सैन्य अड्डों का उपयोग कर सकती हैं। * संचार सुरक्षा समझौता (कॉमकासा) – सुरक्षित सैन्य संचार व्यवस्था। * भू-स्थानिक सूचना समझौता (बेका) – उपग्रह और नक्शों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी साझा करना। इन समझौतों ने दोनों देशों की सेनाओं के बीच भरोसा और तालमेल काफी बढ़ाया है। भविष्य की तकनीक में भी साथ-साथ आज दुनिया केवल हथियारों से नहीं, बल्कि तकनीक से भी आगे बढ़ रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा और दूरसंचार जैसी तकनीकें भविष्य तय करेंगी। भारत और अमेरिका इन क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं। इसके लिए दोनों देशों ने सामरिक प्रौद्योगिकी सहयोग पहल (ट्रस्ट) शुरू की है ताकि भविष्य की तकनीकों में साझेदारी बढ़ सके। चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश कोविड महामारी के दौरान दुनिया ने देखा कि यदि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता हो तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसलिए भारत और अमेरिका अब महत्वपूर्ण खनिजों और औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला को चीन से हटाकर सुरक्षित और विविध बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि दोनों देश महत्वपूर्ण खनिजों, सेमीकंडक्टर और औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला पर मिलकर काम कर रहे हैं। ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन में भी साझेदारी भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और उसे बड़ी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत है। अमेरिका आज भारत को प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में शामिल हो चुका है। साथ ही दोनों देश सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ा रहे हैं ताकि जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती का मिलकर सामना किया जा सके। अंतरिक्ष में भी बढ़ रही साझेदारी भारत का इसरो और अमेरिका का नासा कई वर्षों से साथ काम कर रहे हैं। दोनों मिलकर निसार उपग्रह मिशन पर काम कर रहे हैं, जिससे पृथ्वी, जलवायु परिवर्तन, जंगलों और प्राकृतिक आपदाओं की बेहतर निगरानी की जा सकेगी। फिर भी दोनों देशों के बीच मतभेद क्यों हैं इतनी मजबूत दोस्ती के बावजूद भारत और अमेरिका हर मुद्दे पर एक जैसी सोच नहीं रखते। यही लोकतांत्रिक संबंधों की वास्तविकता भी है। पहला मतभेद – व्यापार और आयात शुल्क हाल के वर्षों में अमेरिका ने कुछ भारतीय उत्पादों पर अधिक आयात शुल्क लगा दिया। इससे भारत का निर्यात प्रभावित हुआ। बाद में दोनों देशों के बीच बातचीत हुई और कुछ राहत भी मिली, लेकिन यह मुद्दा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। दूसरा मतभेद – रूस से तेल खरीद रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए लेकिन भारत ने सस्ता रूसी तेल खरीदना जारी रखा। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से तेल न खरीदे जबकि भारत का स्पष्ट कहना है कि उसकी पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है इसलिए वह अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसला करेगा। तीसरा मतभेद – पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंध हाल के समय में अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ फिर से कुछ रक्षा और कूटनीतिक संपर्क बढ़ाए हैं। भारत इसे सुरक्षा के दृष्टिकोण से संवेदनशील मानता है क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा रहा है। भारत किसी एक गुट में क्यों नहीं जाता भारत की विदेश नीति रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है। इसका अर्थ है कि भारत किसी भी महाशक्ति के दबाव में निर्णय नहीं लेता बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। इसी कारण भारत एक ओर अमेरिका के साथ क्वाड में शामिल है तो दूसरी ओर रूस और चीन के साथ ब्रिक्स तथा शंघाई सहयोग संगठन का भी सदस्य है। भारत की यही नीति बहु-संरेखण (मल्टी-अलाइनमेंट) कहलाती है। एच-1बी वीजा क्यों महत्वपूर्ण है हर साल हजारों भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ और शोधकर्ता अमेरिका में काम करने जाते हैं। इसके लिए उन्हें एच-1बी वीजा की जरूरत होती है। जब अमेरिका वीजा नियम कड़े करता है तो सबसे अधिक असर भारतीय पेशेवरों पर पड़ता है। इसलिए, यह भी दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। एस-400 और अमेरिकी प्रतिबंध का विवाद भारत ने रूस से एस-400 वायु रक्षा प्रणाली खरीदी है। अमेरिका के एक कानून के तहत रूस से बड़े रक्षा सौदे करने वाले देशों पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। भारत चाहता है कि उसे इस कानून से स्थायी छूट मिले क्योंकि उसकी रक्षा आवश्यकताएं और सुरक्षा चुनौतियां अलग हैं। आगे भारत और अमेरिका के रिश्ते कैसे मजबूत हो सकते हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों को सबसे पहले व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौता करना चाहिए ताकि व्यापारिक विवाद समाप्त हों। अमेरिका को भारतीय पेशेवरों के लिए वीजा प्रक्रिया आसान बनानी चाहिए। वहीं, भारत और अमेरिका को रक्षा, आधुनिक तकनीक, ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में सहयोग और बढ़ाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों देशों को मतभेदों को टकराव नहीं बल्कि संवाद के माध्यम से सुलझाना होगा। इसके लिए दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों के बीच नियमित बैठकें होती हैं, जिन्हें 2+2 मंत्री स्तरीय संवाद कहा जाता है। निष्कर्ष भारत और अमेरिका के रिश्ते आज केवल दो देशों की दोस्ती नहीं बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति का महत्वपूर्ण आधार बन चुके हैं। जहां एक ओर रक्षा, तकनीक, ऊर्जा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों की साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है वहीं व्यापार, रूस, पाकिस्तान, वीजा और प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर मतभेद भी बने हुए हैं। एक परिपक्व रणनीतिक साझेदारी की पहचान यही होती है कि मतभेद होने के बावजूद संवाद जारी रहे। भारत और अमेरिका के संबंध भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यही कारण है कि भविष्य में यह रिश्ता विश्व राजनीति और भारत की विदेश नीति दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना रहेगा।



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