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(संजय कौशिक की विशेष रिपोर्ट) काठमांडू / मोतिहारी। बाढ़ सिर्फ पानी का उफान नहीं होती। वह अपने साथ घर, खेत, सपने और कभी-कभी पूरी जिंदगी बहा ले जाती है। लेकिन हर व्यक्ति के लिए आपदा का अर्थ एक जैसा नहीं होता। किसी के लिए वही बाढ़ मौत का संदेश लेकर आती है, तो किसी दूसरे के लिए वह जिंदगी की तलाश का अवसर बन जाती है। नेपाल में त्रिशुली और नारायणी नदियों की हालिया बाढ़ ने मानवीय संवेदना और स्वार्थ के इसी विरोधाभास को एक बार फिर उजागर कर दिया है। जब अस्तित्व सबसे पहली पुकार बन जाता है मनोविज्ञान का एक सामान्य सिद्धांत है कि जीवित प्राणी सबसे पहले अपने अस्तित्व की रक्षा करता है। भूख मिटाना, सुरक्षा सुनिश्चित करना और जीवन को बचाए रखना उसकी प्राथमिक प्रवृत्ति है। स्वयं से बाहर निकलने पर उसका ध्यान संतान, परिवार और फिर अपने समुदाय की ओर जाता है। शायद इसी आदिम प्रवृत्ति ने इस त्रासदी के दौरान मनुष्य के दो बिल्कुल अलग चेहरे सामने ला दिए। जिसने बाढ़ झेली, वही जानता है उसका दर्द बाढ़ की वास्तविक पीड़ा वही समझ सकता है, जिसने पानी को अपने घर में घुसते देखा हो, जिसने अपनों को अपनी आंखों के सामने खोया हो या जिसने किसी तरह मौत से बचकर किनारे तक पहुंचने की कोशिश की हो। दूर खड़े होकर उस दर्द की गहराई को महसूस करना संभव नहीं। मानवीय क्षति ऐसी होती है, जिसकी भरपाई किसी कीमत पर नहीं की जा सकती। घर, सामान और संपत्ति फिर से बनाई जा सकती है, लेकिन किसी अपने के चले जाने की रिक्तता कभी नहीं भरती। त्रिशुली के ऊपरी हिस्से में मौत का सैलाब नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और धादिंग में त्रिशुली नदी के किनारे बसे लोगों के लिए बाढ़ मौत का दूसरा नाम बन गई। कहीं लोग बह गए, कहीं परिवार बिछड़ गए और कहीं चीख-पुकार के बीच बच निकलने वाले लोग सदमे में खामोश हो गए। जिनके सामने सब कुछ उजड़ गया, उनके लिए नदी में बहता हर क्षण भय, शोक और अनिश्चितता से भरा था। बचे हुए लोगों के पास शब्द नहीं हैं। उनके पास केवल सदमा है, और उस सदमे के बीच अपने खोए हुए लोगों को खोजती आंखें। उसी नदी के दूसरे किनारे पर बदल गया बाढ़ का अर्थ लेकिन जैसे-जैसे वही पानी नीचे की ओर बढ़ा और त्रिशुली सप्तगंडकी यानी नारायणी नदी में मिली, उसके किनारों पर तस्वीर बदलने लगी। जहां ऊपर की ओर नदी मौत लेकर आई थी, वहीं निचले हिस्से में कुछ लोगों के लिए वही नदी संभावनाएं लेकर पहुंची। यह विरोधाभास प्रकृति का नहीं, बल्कि मनुष्य की परिस्थितियों का था। बाढ़ के बाद मछली और लकड़ी की तलाश नदी किनारे रहने वाले लोगों के लिए बाढ़ के दौरान जलाऊ लकड़ी बटोरना और पानी उतरने के बाद मछलियां पकड़ना कोई असामान्य गतिविधि नहीं है। यह उनकी रोजमर्रा की जिंदगी और आंशिक आजीविका का हिस्सा है। हर बाढ़ अपने पीछे कुछ लकड़ियां छोड़ जाती है। पानी उतरने के बाद मछलियां मिलती हैं। नदी से जीवन लेने वाले इन समुदायों के लिए बाढ़ का यह एक जाना-पहचाना चक्र है। लेकिन इस बार नदी कुछ ऐसा भी लेकर आई, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। लकड़ी और मछलियों के साथ बहकर आईं लाशें इस बार बाढ़ अपने साथ सिर्फ लकड़ी और मछलियां नहीं लाई। नदी के साथ लाशें, कटे हुए मानव अंग, गहने, गैस सिलेंडर, अलमारियां, नकदी और सोने-चांदी के सामान भी बहते हुए किनारों तक पहुंचे। कहीं मोटर वाहनों के पुर्जे थे, तो कहीं ऐसी वस्तुएं, जिन्हें बाजार में बेचकर पैसा हासिल किया जा सकता था। त्रासदी के मलबे में भी मूल्य खोज लिया गया। जब नदी का मलबा किसी के लिए संपत्ति बन गया किनारे पर बहकर आई किसी वस्तु को यूं ही बह जाने देना कुछ लोगों के लिए संभव नहीं था। जो चीज हाथ लगी, उसे उठा लेने की होड़ शुरू हो गई। जान जोखिम में डालकर लोग नदी की ओर दौड़े। धक्का-मुक्की हुई, संघर्ष हुआ और प्रतिस्पर्धा बढ़ती गई। किसी के लिए वह वस्तु किसी उजड़े परिवार की आखिरी निशानी थी, लेकिन किसी दूसरे के लिए वह बेचकर पैसा कमाने का साधन। लाश से नहीं, लाश पर चमकते गहनों से मतलब सबसे मार्मिक विरोधाभास शायद यहीं दिखाई देता है। नदी में बहती लाश अपने पीछे छूटे जीवन की भयावह कहानी कह रही थी। लेकिन कुछ आंखों के लिए उस कहानी से अधिक महत्वपूर्ण था, उस लाश पर मौजूद गहना। मानवीय पीड़ा के सामने उपयोगिता की दृष्टि हावी हो गई। यह वह क्षण था जब स्वार्थ ने संवेदना को पीछे छोड़ दिया। आपदा में मनुष्य का आदिम चेहरा जीवित प्राणी के भीतर अपने अस्तित्व और लाभ की रक्षा करने की प्रवृत्ति बहुत गहरी होती है। संकट की घड़ी में यह प्रवृत्ति और तीव्र हो सकती है। इसीलिए जान जोखिम में डालकर दौड़ना, एक-दूसरे को पीछे धकेलना और बहकर आई वस्तुओं पर अधिकार जमाने की कोशिश करना केवल किसी एक समाज की कहानी नहीं है। यह मानव व्यवहार के उस कठोर पक्ष की झलक है, जो संकट में अक्सर सभ्यता के आवरण को पीछे छोड़ देता है। चितवन और नवलपरासी में एक ही बाढ़ के दो अर्थ चितवन और नवलपरासी में नारायणी नदी के किनारे सामने आए दृश्य इसी विरोधाभास को सामने रखते हैं। ऊपरी इलाकों में जिस नदी ने परिवार उजाड़े, वही नदी निचले इलाकों में कुछ लोगों के लिए संसाधन लेकर आई। किसी की जिंदगी नदी में डूब गई और किसी ने उसी नदी में अपना आर्थिक अवसर तलाश लिया। एक ही घटना के दो बिल्कुल अलग अर्थ लोगों ने तलाश लिए। हर आपदा सिर्फ आपदा नहीं होती इतिहास और समाज का अनुभव बताता है कि आपदा कभी भी सभी के लिए एक जैसी नहीं होती। किसी के लिए वह विनाश होती है, किसी के लिए संघर्ष, किसी के लिए रोजी-रोटी और किसी के लिए अवसर। लेकिन यही वह बिंदु है जहां समाज की नैतिकता की परीक्षा शुरू होती है, जिसमें पास या फेल होने खुद के हाथ में होता है। सभ्यता ने मनुष्य को स्वार्थ से आगे बढ़ना सिखाया मानव सभ्यता का विकास मूलतः सामाजिक विकास की कहानी है। मनुष्य ने परिवार बनाए, समुदाय बनाए, संस्थाएं बनाईं और अंततः राज्य की स्थापना की। राज्य का मूल उद्देश्य ही नागरिकों की सुरक्षा, पोषण, विकास और संकट की घड़ी में सहायता करना है। यदि हर व्यक्ति केवल अपने हित के बारे में सोचे, तो समाज का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। इसीलिए सभ्यता ने व्यक्तिगत स्वार्थ के ऊपर सामूहिक उत्तरदायित्व की अवधारणा विकसित की। राज्य की जिम्मेदारी और नेपाल का राहत कोष बाढ़ और आपदा के बाद नेपाल सरकार ने राहत और पुनर्वास के लिए कोष स्थापित किया है तथा नागरिकों से सहयोग की अपील की है। सरकारी खजाने से वेतन पाने वाले कर्मचारियों तक के लिए अनिवार्य योगदान के मानक भी जारी किए गए हैं। यह व्यवस्था इस विचार पर आधारित है कि आपदा केवल पीड़ित परिवार की समस्या नहीं होती, वह पूरे समाज की जिम्मेदारी होती है। उद्देश्य भी यही है कि जिन लोगों ने अपना सब कुछ खो दिया है, उनके पुनर्वास में पूरा समाज भागीदार बने। आपदा के बीच खुला फर्जी सहानुभूति का बाजार लेकिन त्रासदी के बीच एक दूसरा बाजार भी आकार लेने लगा है, "फर्जी सहानुभूति का बाजार"। बाढ़ पीड़ितों के नाम पर मदद जुटाने की आड़ में निजी लाभ हासिल करने की कोशिश का मामला रामेछाप में सामने आया है। पुलिस ने एक युवक को कथित तौर पर फर्जी बैंक स्टेटमेंट तैयार करने और सोशल मीडिया पर उसका प्रचार कर लोगों से धन जुटानेके आरोप में पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया है। उस पर आरोप है कि उसने फर्जी बैंक विवरण तैयार कर राहत कोष में बड़ी राशि दान करने का झूठा दावा किया। 1.20 लाख रुपये के दान का कथित फर्जी दावा रामेछाप पुलिस के अनुसार, गोकुलगंगा ग्रामीण नगरपालिका-2, थोसो निवासी 32 वर्षीय भगवान कार्की को गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि उसने फर्जी बैंक स्टेटमेंट तैयार किया और सोशल मीडिया पर उसका प्रचार करते हुए दावा किया कि उसने प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष में 1,20,000 रुपये दान किए हैं। पुलिस के अनुसार, उसने सोशल मीडिया पर अपना क्यूआर कोड भी साझा किया। फर्जी बैंक स्टेटमेंट में एआई के इस्तेमाल का आरोप पुलिस के मुताबिक, फर्जी बैंक स्टेटमेंट तैयार करने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया गया। यह मामला तकनीक के उस दोहरे चेहरे की ओर भी संकेत करता है, जिसमें एक ही तकनीक किसी के लिए राहत और सूचना का माध्यम हो सकती है, तो किसी दूसरे के लिए धोखाधड़ी का औजार। हालांकि, किसी तकनीक का इस्तेमाल अपने आप में अपराध नहीं है, अपराध इस बात पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य और किस तरीके से किया गया। संवेदना का सबसे खतरनाक कारोबार आपदा के तुरंत बाद राहत के नाम पर चंदा अभियान शुरू होना स्वाभाविक है। लोग अपनी क्षमता के अनुसार योगदान करते हैं। संस्थाएं राहत सामग्री जुटाती हैं और स्वयंसेवक प्रभावित इलाकों तक पहुंचते हैं। लेकिन इसी भावनात्मक माहौल में फर्जी चंदा अभियान सबसे खतरनाक रूप ले सकते हैं। पीड़ितों के नाम पर जुटाया गया पैसा यदि पीड़ितों तक पहुंचने के बजाय किसी व्यक्ति की निजी कमाई बन जाए, तो यह केवल आर्थिक धोखाधड़ी नहीं रह जाती, यह समाज की सामूहिक संवेदना के साथ छल बन जाती है। त्रासदी का कारोबार हर आपदा के बाद राहत कार्यों के कई स्तर बनते हैं। कुछ लोग बिना किसी अपेक्षा के दान करते हैं। कुछ लोग अपनी सेवाएं देते हैं। कुछ संस्थाएं राहत अभियान चलाती हैं। लेकिन इसी भीड़ में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो दान और पीड़ा को अपने लिए कारोबार का माध्यम बना लेते हैं। यहीं से सवाल उठता है, क्या किसी की त्रासदी भी किसी दूसरे के लिए बाजार बन सकती है? बाढ़ का पानी उतर जाता है, सवाल रह जाते हैं प्रकृति की बाढ़ अंततः उतर जाती है। नदी अपने पुराने रास्ते पर लौट आती है। किनारे फिर दिखाई देने लगते हैं। लेकिन पीछे रह जाते हैं टूटे घर, बिखरे परिवार, लापता लोगों की तलाश और उन स्मृतियों का बोझ, जिसे कोई नदी बहाकर नहीं ले जा सकती। और साथ ही रह जाता है एक बड़ा नैतिक सवाल, "जब किसी का घर डूब रहा हो, तब क्या दूसरे की इंसानियत भी डूब जानी चाहिए? असल परीक्षा पानी की नहीं, इंसानियत की है बाढ़ के पानी को रोकने के लिए बांध बनाए जा सकते हैं। चेतावनी तंत्र विकसित किए जा सकते हैं। राहत दल भेजे जा सकते हैं। पुनर्वास योजनाएं बनाई जा सकती हैं। लेकिन, लालच की बाढ़ को रोकने के लिए कानून से अधिक जरूरी है, सामाजिक चेतना और नैतिक जिम्मेदारी। क्योंकि आपदा के समय किसी समाज की असली पहचान इस बात से नहीं होती कि उसने कितना नुकसान सहा, बल्कि इस बात से होती है कि उसने अपने सबसे कमजोर लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया। एक नदी, दो चेहरे और सभ्यता का सवाल नेपाल की त्रिशुली और नारायणी ने इस बार केवल पानी नहीं बहाया। उन्होंने मनुष्य के भीतर मौजूद दो धाराओं स्वार्थ और संवेदना को भी सामने ला दिया है। एक धारा उस व्यक्ति की है, जो अपने परिवार को बचाने के लिए मौत से लड़ रहा था। दूसरी उस व्यक्ति की, जो किसी और की त्रासदी में अपने लिए लाभ तलाश रहा है। लेकिन सभ्यता की असली पहचान इसी चुनाव में है। सवाल यह है कि जब किसी का घर डूब रहा हो, तब क्या दूसरे की इंसानियत भी डूब जानी चाहिए? आपदा सबके लिए समान नहीं होती। किसी के लिए वह जिंदगी का अंत होती है और किसी के लिए अवसर। लेकिन इंसानियत यह तय करती है कि उस अवसर का इस्तेमाल किसलिए किया जाए। बाढ़ का पानी अंततः समुद्र में मिल जाता है। मगर उसके बाद किनारे पर बची हुई इंसानियत ही तय करती है कि कोई समाज कितना जीवित है।