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संजय कौशिक मोतिहारी। पूर्वी चंपारण की सड़कों पर मौत मानो खुलेआम दौड़ रही है। तेज रफ्तार, लापरवाही और सुरक्षा मानकों की अनदेखी ने एक सप्ताह के भीतर कई परिवारों की खुशियां छीन ली हैं। गुरुवार को चकिया थाना क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग-28 पर हुए एक और भीषण हादसे ने जिले में सड़क सुरक्षा की भयावह तस्वीर को फिर सामने ला दिया। महज आठ दिनों में नौ सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 14 लोगों की मौत हो गयी और 16 लोग घायल हुए। पुलिस सूत्रों ने यहां बताया कि दामोदरपुर रेलवे गुमटी के समीप मुजफ्फरपुर से मोतिहारी की ओर आ रही मुर्गी लदी एक पिकअप अनियंत्रित होकर सड़क किनारे लगे 11 हजार वोल्ट के बिजली के खंभे से टकरा गई। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि चालक अरविंद कुमार की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि चालक को अचानक नींद आ जाने से वाहन पर नियंत्रण समाप्त हो गया और कुछ ही क्षणों में एक और परिवार का सहारा हमेशा के लिए छिन गया। एक सप्ताह, चार हादसे और आठ मौतें यह कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले 8 दिनों में पिकअप वाहनों से जुड़ी चार बड़ी दुर्घटनाओं ने जिले को झकझोर कर रख दिया है। 18 जून को पकड़ीदयाल के मुनिया देवी चौक पर पिकअप और बाइक की टक्कर में दो युवकों की जान चली गई। 21 जून को मुफस्सिल थाना क्षेत्र में मधुबनी घाट के पास तेज रफ्तार पिकअप ने एक महिला को कुचल दिया, जिससे उसकी मौत हो गई और तीन लोग घायल हो गए। 24 जून को सुगौली थाना क्षेत्र के नवका टोला गांव के समीप पिकअप और टेंपो की आमने-सामने की टक्कर में दो महिलाओं और एक मासूम बच्चे समेत चार लोगों की मौत हो गई। अब गुरुवार को चकिया में हुए हादसे ने पिकअप से हुई मौतों की संख्या बढ़ाकर आठ कर दी है। 8 दिनों में 14 मौत, 16 घायल इसके अलावा अगर महज 8 दिनों में हुई सड़क दुर्घटनाओं और उड़के प्रभाव को देखें तो 18 से 25 जून के बीच कुल 9 सड़क दुर्घटनाएं हुईं जिसमें 14 लोगों की मौत हो गयी और 16 लोग घायल हो गए। मरने वालों में युवक 6, महिला 7 और बच्चा एक शामिल हैं। मरने वाली महिलाओं में बुजुर्ग श्रेणी की दो महिलाएं और तीन चालक शामिल हैं। हर हादसे के पीछे छूट गए हैं रोते-बिलखते परिजन, उजड़े सपने और ऐसे जख्म जो शायद कभी नहीं भर पाएंगे। कहीं चालक की झपकी, कहीं रफ्तार का कहर विशेषज्ञों का मानना है कि पिकअप वाहन मूल रूप से माल ढुलाई के लिए बनाए गए हैं लेकिन इनकी रफ्तार कई बार यात्री वाहनों जैसी हो जाती है। चालक थकान, नींद और जल्दबाजी के कारण नियंत्रण खो बैठते हैं और परिणाम किसी परिवार की तबाही के रूप में सामने आता है। 22 जून को मेहसी में भी चालक को झपकी आने के कारण दो ट्रकों की टक्कर में एक व्यक्ति की जान चली गई थी। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं यह संकेत दे रही हैं कि सड़कों पर थकान और रफ्तार दोनों ही जानलेवा साबित हो रहे हैं। सवालों के घेरे में सड़क सुरक्षा के दावे सड़क सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान, नियमों की सख्ती और प्रशासनिक दावों के बावजूद पूर्वी चंपारण में दुर्घटनाओं का ग्राफ लगातार चिंता बढ़ा रहा है। यही वजह है कि वर्ष 2025 में सड़क दुर्घटनाओं के लिहाज से देश के 100 सर्वाधिक दुर्घटनाग्रस्त जिलों की सूची में पूर्वी चंपारण का नाम भी शामिल रहा। यह आंकड़ा सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा का दस्तावेज है जिन्होंने अपनों को सड़क पर खो दिया। कब थमेगा यह मौत का सिलसिला पूर्वी चंपारण की सड़कें आज एक ऐसे भय का पर्याय बनती जा रही हैं, जहां घर से निकला व्यक्ति सुरक्षित लौट आएगा या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं। किसी की मांग का सिंदूर पलभर में मिट जाता है, कोई मासूम अनाथ हो जाता है और किसी बुजुर्ग की बुढ़ापे की लाठी टूट जाती है। हर हादसे के बाद कुछ दिनों तक चर्चा होती है, संवेदनाएं व्यक्त की जाती हैं, लेकिन फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। सवाल यह है कि आखिर कितनी और मौतों के बाद व्यवस्था जागेगी? कितने और घर उजड़ेंगे, तब जाकर रफ्तार पर लगाम लगेगी?



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