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माटी का श्रृंगार : श्रृंखला एक नोएडा (यूपी)। "सभ्यताएं केवल राजमहलों, दुर्गों और स्मारकों से नहीं बनतीं। वे उन अनगिनत हाथों से जन्म लेती हैं, जो चुपचाप मिट्टी को जीवन देते हैं।" यह उन्हीं हाथों की कहानी है जिनकी हाथों के हुनर और उंगलियों के जादू रोज बेजान मिट्टी में जान डालते हैं। सुबह अभी पूरी तरह जागी नहीं है। पूर्व दिशा से आती हल्की सुनहरी रोशनी खेतों पर बिखर रही है। हवा में रात की नमी अब भी तैर रही है। गांव के बाहर पीपल के पुराने पेड़ की छाया में मिट्टी का एक छोटा-सा घर है। उसके सामने रखा है एक पुराना चाक... लकड़ी का, समय की अनगिनत परतों से घिसा हुआ लेकिन आज भी उतना ही जीवंत, जितना सदियों पहले रहा होगा। आंगन में एक वृद्ध कुम्हार बैठा है। उसके हाथों की नसें उभर आई हैं। हथेलियों पर समय की दरारें हैं। नाखूनों के बीच सूखी मिट्टी भरी है। उसके सामने रखा मिट्टी का ढेला किसी अनलिखी कविता की तरह मौन है। वह धीरे-धीरे चाक को गति देता है। पहिया घूमने लगता है। फिर तेज, और फिर इतना तेज कि लगता है समय स्वयं अपनी धुरी पर घूम रहा है। उसकी हथेलियां मिट्टी को छूती हैं। कोई शोर नहीं। कोई आदेश नहीं। केवल स्पर्श...और देखते-ही-देखते निर्जीव मिट्टी सांस लेने लगती है। एक क्षण पहले जो केवल धरती का एक अनगढ़ टुकड़ा थी, अगले ही क्षण वह घड़ा बन जाती है। फिर सुराही। फिर कुल्हड़। फिर दीपक। फिर कलश। फिर कोई खिलौना, जिसे देखकर किसी बच्चे की आंखें चमक उठेंगी। यह दृश्य केवल एक कारीगर के काम का नहीं है। यह सृष्टि के पुनर्जन्म का दृश्य है। धरती जब पहली बार मनुष्य के हाथों में आई होगी तब शायद उसने स्वयं भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन यही हाथ उसे अमर बना देंगे। मिट्टी से बने बर्तन केवल वस्तुएं नहीं हैं; वे मानव सभ्यता की पहली भाषा हैं। इतिहास की पहली पुस्तक यदि कहीं लिखी गई तो वह पत्थर पर नहीं, मिट्टी पर लिखी गई थी। आज पुरातत्वविद जब किसी प्राचीन नगर की खुदाई करते हैं तो सबसे पहले उन्हें मिट्टी के टूटे हुए बर्तन मिलते हैं। किसी राजा का नाम मिट सकता है, किसी साम्राज्य का ध्वज नष्ट हो सकता है लेकिन मिट्टी का एक छोटा-सा पात्र हजारों वर्षों बाद भी यह बता देता है कि उस समय मनुष्य क्या खाता था, क्या पीता था, कैसे रहता था, किस देवता की पूजा करता था और उसकी कला कितनी विकसित थी। यही कारण है कि इतिहासकार कहते हैं... किसी सभ्यता को जानना हो तो उसके मिट्टी के बर्तनों को पढ़िए। मिट्टी : जिससे मनुष्य बना, जिसमें मनुष्य लौटा भारतीय चिंतन में मिट्टी केवल एक पदार्थ नहीं है। वह सृष्टि का पहला स्पर्श है। वह धरती का हृदय है। उपनिषदों ने मनुष्य को पंचमहाभूतों का बना बताया है, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। इनमें पृथ्वी अर्थात् मिट्टी सबसे स्थिर तत्व है। यही मिट्टी खेत में अन्न बनती है, नदी किनारे घड़ा बनती है, मंदिर में दीपक बनती है और अंततः मनुष्य की देह भी उसी में विलीन हो जाती है। शायद इसी कारण भारतीय लोकगीतों में मिट्टी को माँ कहा गया। संत कबीर ने लिखा, "माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे। एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोहे॥" इन दो पंक्तियों में केवल मृत्यु का स्मरण नहीं है। यह मनुष्य के अहंकार पर प्रकृति का सबसे गहरा व्यंग्य है। जिस मिट्टी को वह अपने पैरों तले रौंदता है, अंततः उसी की गोद में लौट जाना उसकी नियति है। लेकिन, इस यात्रा के बीच एक व्यक्ति है, जो मिट्टी और मनुष्य के बीच सेतु बनता है। वह है—कुम्हार। वह केवल बर्तन नहीं बनाता जब कोई कुम्हार मिट्टी को गूंथता है तब वह केवल मिट्टी नहीं गूंथ रहा होता। वह अपने पिता की सीख को गूंथ रहा होता है। दादा की परंपरा को गूंथ रहा होता है। पूर्वजों की स्मृतियों को गूंथ रहा होता है। वह अपने बच्चों के भविष्य को भी उसी मिट्टी में मिला देता है। उसकी हर हथेली में पीढ़ियों का अनुभव छिपा होता है। वह बिना किसी आधुनिक मशीन, कंप्यूटर या कृत्रिम बुद्धिमत्ता के केवल स्पर्श से पहचान लेता है कि कौन-सी मिट्टी घड़ा बनेगी, कौन-सी सुराही और कौन-सी दीपक। यह ज्ञान किसी विश्वविद्यालय ने नहीं दिया। यह ज्ञान मिट्टी ने दिया है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी। बिना किसी लिखित पाठ्यक्रम के। सभ्यता का पहला उद्योग मानव इतिहास में जब मनुष्य ने स्थायी बस्तियां बसाईं, तब सबसे बड़ी चुनौती थी, भोजन और जल का संरक्षण। उसी समय मिट्टी के बर्तन अस्तित्व में आए। चीन के जियांग्शी क्षेत्र से मिले लगभग अठारह हजार वर्ष पुराने मिट्टी के पात्र, जापान की जोमोन संस्कृति के बर्तन, अफ्रीका और मध्य-पूर्व की प्राचीन मृद्भांड परंपराएं यह प्रमाणित करती हैं कि मनुष्य ने पत्थर के औज़ारों के साथ-साथ मिट्टी को भी अपना सबसे विश्वसनीय साथी बनाया। भारत में यह कला सिंधु-सरस्वती सभ्यता तक आते-आते अद्भुत ऊंचाई पर पहुंच चुकी थी। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से प्राप्त लाल मृद्भांड, चित्रित पात्र, टेराकोटा की मूर्तियां और अनाज रखने के विशाल पात्र बताते हैं कि कुम्हार केवल घरेलू वस्तुएं नहीं बनाता था, वह पूरे नगर की अर्थव्यवस्था का आधार था। वह उस समय का अभियंता भी था, रसायनज्ञ भी, डिजाइनर भी और कलाकार भी। चाक : समय का सबसे प्राचीन पहिया दुनिया ने पहिए का आविष्कार देखा। लेकिन, शायद सबसे सुंदर पहिया कुम्हार का चाक ही है। रथ का पहिया दूरी कम करता है। मशीन का पहिया उत्पादन बढ़ाता है लेकिन कुम्हार का चाक मिट्टी में आत्मा भर देता है। जब चाक घूमता है तो केवल मिट्टी नहीं घूमती। समय घूमता है। इतिहास घूमता है। सभ्यता घूमती है और मनुष्य बार-बार अपनी जड़ों तक लौट आता है। यही कारण है कि भारतीय साहित्य में चाक को केवल उपकरण नहीं, जीवन-चक्र का प्रतीक माना गया है। उसका हर चक्कर जन्म और मृत्यु के बीच की यात्रा जैसा है। मिट्टी चढ़ती है। आकार लेती है। अग्नि में तपती है और फिर समाज की सेवा में समर्पित हो जाती है। क्या मनुष्य का जीवन भी इससे भिन्न है? शायद नहीं। इसीलिए कुम्हार का चाक केवल मिट्टी नहीं घुमाता, वह जीवन का दर्शन रचता है। (क्रमशः)