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नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े जोखिमों के बीच एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि तेल, गैस और कोयले के लिए आयात पर भारत की भारी निर्भरता अब सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक चुनौती बन चुकी है, जिससे भविष्य में महंगाई, ईंधन कीमतों और देश की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ सकता है। ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (सीईईडब्ल्यू) की बुधवार को जारी रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि भारत की चुनौती अब सिर्फ तेल, गैस और कोयले के आयात तक सीमित नहीं है बल्कि पूरा जीवाश्म ईंधन तंत्र कुछ देशों, संवेदनशील समुद्री मार्गों और वैश्विक कीमतों पर अत्यधिक निर्भर हो गया है, जो भविष्य में देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम लोगों की जेब पर बड़ा असर डाल सकता है। छह देशों पर टिका है भारत का तेल भरोसा रिपोर्ट के मुताबिक भारत के 85 फीसदी से अधिक कच्चे तेल का आयात सिर्फ छह देशों से होता है। ऐसे में यदि किसी क्षेत्र में युद्ध, प्रतिबंध या आपूर्ति बाधित होती है तो भारत पर सीधा असर पड़ सकता है। रिपोर्ट ने ब्राजील, गुयाना और पश्चिम अफ्रीका जैसे नए स्रोतों से दीर्घकालिक आपूर्ति बढ़ाने की जरूरत बताई है। सिर्फ 9-10 दिन का तेल भंडार, गैस के लिए कोई रणनीतिक स्टोरेज नहीं रिपोर्ट में सबसे गंभीर चिंता भारत के सीमित रणनीतिक भंडार को लेकर जताई गई है। भारत के पास केवल 9-10 दिनों के शुद्ध कच्चे तेल आयात के बराबर रणनीतिक भंडार है जबकि जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के पास 200 दिनों से अधिक का भंडार मौजूद है। वहीं, एलएनजी पर बढ़ती निर्भरता के बावजूद देश के पास कोई समर्पित रणनीतिक गैस भंडारण व्यवस्था नहीं है। रसोई गैस पर भी बड़ा जोखिम देश के 33 करोड़ से अधिक परिवार एलपीजी पर निर्भर हैं लेकिन इसकी करीब 95 फीसदी आपूर्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आयातित तेल पर आधारित है। रिपोर्ट के अनुसार यदि वैश्विक आपूर्ति में बाधा आती है तो करोड़ों घरों की रसोई प्रभावित हो सकती है। सीएनजी भी हो सकती है महंगी अध्ययन के मुताबिक यदि सिटी गैस वितरण में आयातित गैस की हिस्सेदारी 15 फीसदी से बढ़कर 50 फीसदी हो जाती है तो अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल की स्थिति में सीएनजी के दाम 15 से 17 फीसदी तक बढ़ सकते हैं। इसका सीधा असर परिवहन क्षेत्र और आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। कोयला क्षेत्र में भी चिंता बरकरार रिपोर्ट बताती है कि इस्पात उद्योग के लिए भारत अब भी ऑस्ट्रेलिया से आयातित कोकिंग कोल पर काफी हद तक निर्भर है। वहीं, गैर-कोकिंग कोयले के लिए इंडोनेशिया की नीतियों का असर भारतीय बाजार पर पड़ सकता है। ऐसे में आपूर्ति स्रोतों में विविधता और रणनीतिक भंडारण बढ़ाने की जरूरत बताई गई है। स्वच्छ ऊर्जा बन सकती है भारत की सबसे बड़ी ताकत रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि सौर, पवन और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोत भारत की ऊर्जा सुरक्षा का सबसे मजबूत आधार बन सकते हैं। एक बार स्थापित होने के बाद ये ऊर्जा स्रोत आयातित ईंधन पर निर्भर नहीं रहते, जिससे वैश्विक कीमतों और आपूर्ति संकट का असर कम होता है। हालांकि इसके लिए महत्वपूर्ण खनिजों, तकनीक और सप्लाई चेन को भी मजबूत करना होगा। क्या है रिपोर्ट की सलाह रिपोर्ट में सरकार को तेल, गैस और एलपीजी के रणनीतिक भंडार बढ़ाने, इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से बढ़ावा देने, रिफाइनरियों के आधुनिकीकरण, घरेलू स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने और आयात स्रोतों में विविधता लाने की सिफारिश की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ ज्यादा तेल खरीदने से नहीं, बल्कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने से सुनिश्चित होगी। क्यों महत्वपूर्ण है यह रिपोर्ट पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, वैश्विक सप्लाई चेन संकट और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव के दौर में यह रिपोर्ट भारत के लिए एक चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि आयात पर अत्यधिक निर्भरता देश को जोखिम में डाल सकती है और अवसर इसलिए कि स्वच्छ ऊर्जा के जरिए भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को अधिक मजबूत और आत्मनिर्भर बना सकता है।