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नई दिल्ली। बरसों की पढ़ाई, फीस और किताबों पर खर्च, रात-रात भर की मेहनत और आखिर में हाथ में एक डिग्री.... उम्मीद यही कि अब अपने पैरों पर खड़े होने की बारी है; लेकिन जब वही डिग्री नौकरी का दरवाजा न खोल पाए तो सपनों के साथ परिवार की उम्मीदें भी इंतजार में अटक जाती हैं। भारत के पढ़े-लिखे युवाओं की इसी टीस को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की शोध रिपोर्ट आंकड़ों में सामने रखती है , जिसमें 15 से 24 साल के एडवांस्ड एजुकेशन हासिल कर चुके युवाओं में बेरोजगारी करीब 42 फीसदी बताई गई है। यह तस्वीर उस वक्त और बेचैन करती है, जब अगले एक दशक में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के जॉब मार्केट में करीब 1.2 अरब लोग उतरने वाले हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) उस पहली सीढ़ी यानी एंट्री-लेवल नौकरी को भी बदल रहा है, जिस पर पैर रखकर कभी एक नए स्नातक (ग्रेजुएट) का करियर शुरू होता था। भारत में जितनी ऊंची पढ़ाई, युवाओं में उतनी बड़ी नौकरी की चुनौती आईएमएफ की जारी शोध रिपोर्ट में भारत में बेरोजगारों की भीड़ की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आती है। एशिया में सबसे ज्यादा शिक्षित युवाओं को अक्सर सबसे ऊंची बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है। भारत में सभी आयु वर्गों की कुल बेरोजगारी दर करीब 4-5% है वहीं 15 से 24 साल के युवाओं में यह करीब 18% है लेकिन उच्च शिक्षा हासिल करने वालों पर नजर डालते ही अंतर काफी बढ़ जाता है। सभी आयु वर्गों में एडवांस्ड एजुकेशन हासिल कर चुके लोगों की बेरोजगारी दर करीब 13-14% है जबकि 15 से 24 साल के उच्च शिक्षित युवाओं में यह करीब 42% तक पहुंच जाती है।रिपोर्ट में ‘एडवांस्ड एजुकेशन’ से आशय पोस्ट-सेकेंडरी एजुकेशन से है। भारत के उच्च शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी सामान्य दर से करीब 9 गुना रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कुल बेरोजगारी दर जहां करीब 4-5% दिखाई देती है वहीं उच्च शिक्षा प्राप्त 15-24 साल के युवाओं में यह करीब 42% है। यानी आंकड़ों के आधार पर यह दर कुल बेरोजगारी दर के मुकाबले लगभग 9 गुना बैठती है।यही नहीं, सामान्य युवा बेरोजगारी के मुकाबले भी उच्च शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी दोगुने से अधिक दिखाई देती है। यह अंतर उस समस्या की ओर इशारा करता है जिस पर फिलीपींस के उच्च शिक्षा आयोग की अध्यक्ष शर्ली कास्तानेडा अग्रुपिस की टिप्पणी भी ध्यान खींचती है— समस्या केवल नौकरियां उपलब्ध होने या न होने की नहीं है बल्कि उपलब्ध नौकरियों और ग्रेजुएट्स के कौशल के बीच लगातार बना हुआ अंतर भी है। श्रीलंका के बाद भारत भी ऊंचे स्तर पर रिपोर्ट के मुताबिक, बेरोजगारी के मामले में दक्षिण एशिया के दूसरे देशों की स्थिति भी गंभीर है। उच्च शिक्षा प्राप्त 15-24 साल के युवाओं की बेरोजगारी श्रीलंका में करीब 43% , भारत में करीब 42% और बांग्लादेश में करीब 36% है। इस लिहाज से इन तीन दक्षिण एशियाई देशों में उच्च शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी बहुत ऊंचे स्तर पर है। इसके मुकाबले इंडोनेशिया, वियतनाम, मलेशिया, थाईलैंड, फिलीपींस, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और जापान में उच्च शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी दर भारत से काफी कम है। आईएमएफ: योग्यता के मुताबिक पद तलाशने में जूझ रहे पढ़े-लिखे युवा आईएमएफ के शोध में एशिया में युवा बेरोजगारी ऊंची पाई गई है और कई जगह सबसे उन्नत शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं में ही बेरोजगारी सबसे अधिक है। आईएमएफ के एशिया एवं प्रशांत विभाग के निदेशक कृष्णा श्रीनिवासन ने अप्रैल की संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि उच्च शिक्षित युवा कर्मचारियों को अपनी योग्यता के अनुरूप पद तलाशने में मुश्किल हो रही है। थाईलैंड इसका एक और उदाहरण है। वहां पिछले साल 15-24 साल के लोगों में बेरोजगारी 3.9% थी जबकि इसी उम्र के पोस्ट-सेकेंडरी शिक्षा हासिल कर चुके युवाओं में यह करीब तीन गुना बढ़कर 13.2% थी। भारत में बेरोजगार ग्रेजुएट्स को लेकर बढ़ी नाराजगी का भी जिक्र आईएमएफ के शोध में भारत में युवा बेरोजगारी से जुड़ी नाराजगी का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार ग्रेजुएट्स की तुलना “कॉकरोच” से की थी। इस टिप्पणी ने युवा बेरोजगारी को लेकर निराशा को रेखांकित किया और एक विरोध आंदोलन को गति देने में मदद की, जिसके दो महीने बाद शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दे दिया।इसी व्यापक परिदृश्य में आईएमएफ का शोध भारत में उच्च शिक्षित युवाओं के सामने रोजगार की चुनौती को आंकड़ों के जरिए सामने रखता है। अगले 10 साल में जॉब मार्केट में आएंगे 1.2 अरब लोग यह चुनौती केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व बैंक की जून में प्रकाशित रिपोर्ट ‘वैश्विक रोजगार चुनौती’ के मुताबिक, अगले एक दशक में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के श्रम बाजार में करीब 1.2 अरब लोग प्रवेश करेंगे। विश्व बैंक के मुताबिक, युवा महिलाओं और पुरुषों का यह समूह संभवतः अब तक का सबसे बड़ा युवा समूह होगा, किसी भी पिछले दशक से बड़ा और इस सदी के बाकी हिस्से में किसी भी दशक के लिए अनुमानित संख्या से भी अधिक। इसका पैमाना इससे समझा जा सकता है कि आधी सदी से ज्यादा पहले, वर्ष 1971 के आसपास, दुनिया की उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में कार्यबल में प्रवेश के लिए तैयार युवा वयस्कों की संख्या करीब 50 करोड़ थी। एआई की एंट्री ने बदल दिया नौकरियों का पुराना गणित शोध में कहा गया है कि रिकॉर्ड संख्या में युवाओं के जॉब मार्केट में आने के साथ एक और बड़ा बदलाव हो रहा है और वह है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस । थाईलैंड की किंग मोंगकुट यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी थोनबुरी (केएमयूटीटी) के 21 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र सहारत चुआइकाएव इसका उदाहरण हैं। पढ़ाई के साथ वह एक एनर्जी ड्रिंक फैक्ट्री में इंटर्नशिप करते हैं और सप्ताह में करीब 15 घंटे स्वैच्छिक आईटी का काम भी करते हैं। उनकी चिंता यह है कि जिन जटिल कामों को कभी नए ग्रेजुएट्स को सौंपा जाता था, उनमें से कई अब एआई मॉडल से कराए जा सकते हैं। उनके मुताबिक, यदि किसी कंपनी के पास एक सीनियर इंजीनियर के साथ एआई भी है तो जूनियर इंजीनियर की जरूरत कम हो सकती है। इसी वजह से उन्हें लगता है कि नौकरी तलाशना पहले से कठिन हो गया है। एआई तेजी से बढ़ा और कौशल पीछे छूटी तो बढ़ सकता है दबाव शोध रिपोर्ट में आईएमएफ के कृष्णा श्रीनिवासन के हवाले से कहा गया है कि एआई में विकास और उत्पादकता बढ़ाने की क्षमता है लेकिन यदि इसे अपनाने की रफ्तार युवाओं के कौशल विकसित होने की गति से तेज रही तो यह युवा कर्मचारियों पर श्रम बाजार का दबाव बढ़ा सकता है। इससे शिक्षा और रीस्किलिंग पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत और मजबूत होती है। विश्वविद्यालयों और तकनीकी कार्यक्रमों को कंपनियों की मांग के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाने और ग्रेजुएट्स को वे कौशल देने की जरूरत है जिनकी कंपनियों को वास्तव में आवश्यकता है। इंजीनियर से एनिमेटर तक, भविष्य को लेकर चिंता एआई को लेकर आशंका केवल इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं है। केएमयूटीटी के एक एनिमेशन छात्र ने कहा कि उसे अभी अपने भविष्य का पता नहीं है और उसे लगता है कि शायद वह एनिमेटर नहीं बनेगा। चुआइकाएव भी मानते हैं कि यदि उनके पास अतिरिक्त सॉफ्ट और हार्ड स्किल्स जैसे, किसी दूसरी भाषा का ज्ञान नहीं होगा तो एआई उनके लिए चुनौती बन सकता है। यूनिवर्सिटी के एक प्रतिनिधि के मुताबिक, सर्वे में छात्रों ने भविष्य में रोजगार पर तकनीक के असर को लेकर चिंता जताई। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने 1,000 छात्रों को करियर में एआई का इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग देने के लिए लाइसेंस हासिल किए। एआई से सिर्फ नौकरियां जाने का खतरा नहीं, नए काम भी बन सकते हैं हालांकि आईएमएफ की शोध रिपोर्ट एआई की तस्वीर को एकतरफा नहीं बताती। उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर हुए अध्ययनों से संकेत मिलता है कि उत्पादकता बढ़ाने वाली तकनीकों का रोजगार पर मिला-जुला असर हो सकता है। ऑटोमेशन कुछ कामों में कर्मचारियों की मांग घटा सकता है लेकिन उत्पादकता बढ़ने से निवेश, कारोबार का विस्तार और नए प्रकार के रोजगार भी पैदा हो सकते हैं। इस वर्ष जुलाई में प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि दक्षिण-पूर्व एशिया में करीब 8 करोड़ लोगों के काम पर जेनरेटिव एआई का असर पड़ सकता है , लेकिन संगठन को अभी बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म होने के बहुत कम प्रमाण मिले हैं। टेक्नोलॉजी बढ़ी तो कुशल कर्मचारियों की कमी भी बनी चुनौती थाईलैंड का अनुभव इसका दूसरा पहलू दिखाता है। इस साल की पहली तिमाही में थाईलैंड के निवेश बोर्ड ने 48 डिजिटल परियोजनाओं में 87374.1 करोड़ थाई बाट यानी 27.3 अरब डॉलर के निवेश आवेदन दर्ज किए। इनमें ज्यादातर बैंकॉक और आसपास के प्रांतों में डेटा सेंटर तथा क्लाउड सेवाओं से जुड़ी परियोजनाएं थीं। वहीं, उद्योग अधिकारियों ने सम्मेलनों में कहा कि फिलहाल बड़ी चुनौती नौकरियों का खत्म होना नहीं बल्कि तेजी से बढ़ती इंडस्ट्री के लिए जरूरी कौशल रखने वाले कर्मचारियों की कमी है। रिकॉर्ड युवा आबादी, एआई और कौशल अंतर- भारत की चुनौती आईएमएफ की शोध रिपोर्ट रोजगार बाजार के तीन बड़े बदलाव सामने रखते हैं- रिकॉर्ड संख्या में युवाओं का जॉब मार्केट में प्रवेश, उच्च शिक्षा के बावजूद रोजगार हासिल करने की मुश्किल और AI के कारण नौकरियों तथा जरूरी कौशल में तेजी से आता बदलाव। भारत में 15-24 साल के उच्च शिक्षित युवाओं में करीब 42% बेरोजगारी जबकि सभी आयु वर्गों की कुल बेरोजगारी करीब 4-5% होना, बरबस ध्यान खींचता है। ऐसे में आने वाले वर्षों का सवाल केवल यह नहीं होगा कि कितनी नौकरियाें का सृजन होता है बल्कि यह भी होगा कि युवाओं को मिल रही शिक्षा और कौशल उन नौकरियों से कितना मेल खाते हैं और एआई से बदलते रोजगार बाजार में वे नई जरूरतों के मुताबिक खुद को कितनी तेजी से तैयार कर पाते हैं। https://x.com/IMFNews/status/2101280310138916908