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(संजय कौशिक की विशेष रिपोर्ट) काठमांडू/मोतिहारी। हिमालय की ऊंची चोटियों से उतरी भोटेकोशी की वह बाढ़ सिर्फ पानी नहीं थी। वह एक ऐसी चेतावनी थी, जिसे नेपाल ने वर्षों से सुना तो था लेकिन उसके लिए जरूरी चेतावनी तंत्र अब भी अधूरा था। 26 अगस्त की सुबह रसुवा में नदी ने जब अपना रौद्र रूप दिखाया तब लोगों के पास बचने के लिए समय नहीं था। पहले मौत आई, चेतावनी बाद में। स्याफ्रुबेसी के दक्षिण हाकुबेसी गांव के नीमा दोरजे तमांग उस सुबह की भयावहता को आज भी अपने टूटे पैर और खोए हुए परिवार के साथ जी रहे हैं। अचानक आई तेज गर्जना के बाद उन्होंने देखा कि भोटेकोशी की बाढ़ की लहरें उनसे भी ऊंची उठती हुई उनकी ओर दौड़ रही थीं। तमांग परिवार के साथ पहाड़ी की ओर भागे, लेकिन बाढ़ ने उन्हें रास्ते में ही निगल लिया। एक चट्टान तमांग के पैर से टकराई और हड्डी टूट गई। पानी उन्हें बहाकर ले गया, मगर किनारे के पास एक पेड़ ने उनकी जिंदगी थाम ली। बाद में हेलीकॉप्टर से उन्हें काठमांडू लाया गया। त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल में इलाज करा रहे तमांग की आवाज में उस त्रासदी का पूरा वजन महसूस होता है। वह कहते हैं, “हमने अपने चाचा, चाची, बहन और जीजा को खो दिया।” जब नदी ने चेतावनी को पीछे छोड़ दिया 26 अगस्त की सुबह करीब 8:37 बजे हिमस्खलन/ग्लेशियर ध्वंस के बाद अचानक भोटेकोशी में विनाशकारी बाढ़ आई। वैज्ञानिकों के अनुसार इस तरह की घटना का सटीक पूर्वानुमान लगाना बेहद कठिन था। ऊंचे और खड़े हिमालयी भूभाग से बाढ़ इतनी तेजी से नीचे उतरी कि निचले इलाकों में बसे लोगों को चेतावनी देने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं बचा। रसुवा के स्याब्रुबेसी स्थित जल विज्ञान केंद्र का नदी गेज भी बाढ़ की चपेट में आकर बह गया। ये उपकरण सामान्य परिस्थितियों में धीरे-धीरे बढ़ते जलस्तर को मापने के लिए बनाए गए थे, लेकिन अचानक आई विनाशकारी बाढ़ की रफ्तार के सामने वे भी असहाय साबित हुए। जब चेतावनी तंत्र सक्रिय हुआ, तब तक नदी अपना काम कर चुकी थी। सुबह 8:37 बजे घटना के करीब 38 मिनट बाद, 9:15 बजे रसुवा, नुवाकोट, धाडिंग और चितवन के लोगों को मोबाइल पर संदेश मिला, "भोटेकोशी का जलस्तर खतरे की सीमा पार कर चुका है, तत्काल सुरक्षित और ऊंचे स्थान पर चले जाएं।" लेकिन सवाल यही है, जिस बाढ़ को गांव तक पहुंचने में चंद मिनट लगे, उसके खिलाफ 38 मिनट बाद मिली चेतावनी कितनी जिंदगी बचा सकती थी? श्रृंखलाबद्ध चेतावनी तंत्र की जरूरत नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी अनिल पोखरेल ने चेतावनी तंत्र की मौजूदा कमजोरी पर गंभीर सवाल उठाया। उनके मुताबिक, नेपाल में वास्तविक अर्थों में प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली मौजूद नहीं है। उनका कहना है कि नदी के ऊपरी हिस्से में लगे सेंसर खतरे का संकेत दें तो उसके साथ तत्काल सायरनों की श्रृंखला सक्रिय होनी चाहिए। मोबाइल फोन पर संदेश पहुंचना चाहिए, तेज बजर बजना चाहिए और ऐसा तंत्र होना चाहिए जो फोन के साइलेंट मोड में होने पर भी व्यक्ति को खतरे का एहसास करा सके। यानी चेतावनी सिर्फ आंकड़ा नहीं होनी चाहिए, वह ऐसी आवाज होनी चाहिए, जिसे खतरे में फंसा व्यक्ति सुन सके, समझ सके और उस पर तुरंत कार्रवाई कर सके। भूकंप आया, लेकिन चेतावनी नहीं बनी घटना से जुड़े वैज्ञानिक संकेत भी सामने आए थे। राष्ट्रीय भूकंप निगरानी एवं अनुसंधान केंद्र के प्रमुख लोक विजय अधिकारी के अनुसार, रिकॉर्ड में 4.4 तीव्रता का भूकंप दर्ज हुआ था। हालांकि भूकंपीय गतिविधि की प्रकृति सामान्य भूकंप जैसी नहीं थी इसलिए आम जनता को कोई अलर्ट जारी नहीं किया गया। यह उस जटिल हिमालयी जोखिम की तस्वीर है जहां भूकंप, हिमस्खलन, ग्लेशियर और नदियां एक-दूसरे से जुड़े खतरे बन सकते हैं। किसी एक घटना को अलग-अलग देखकर खतरे का आकलन करना कई बार जानलेवा साबित हो सकता है। बाढ़ ने संचार भी छीन लिया बाढ़ की भयावहता सिर्फ घरों, सड़कों और पुलों को बहाकर ले जाने तक सीमित नहीं रही। उसने संचार व्यवस्था को भी तोड़ दिया। रसुवा में संचार टावर नष्ट होने के कारण प्रशासन के लिए समय रहते व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचना मुश्किल हो गया। एनडीआरआरएमए की प्रवक्ता शांति महत के अनुसार, स्थानीय स्तर पर अधिकारियों और लोगों ने घर-घर जाकर एक-दूसरे को चेतावनी दी। निचले इलाकों में टेक्स्ट अलर्ट, कॉलर ट्यून, मीडिया प्रसारण और पुलिस के लाउडस्पीकर से लोगों को सचेत करने की कोशिश की गई। लेकिन यह व्यवस्था एक संगठित, स्वचालित और बहुस्तरीय चेतावनी तंत्र की जगह मानवीय प्रयासों पर निर्भर रही। 95 प्रतिशत वयस्कों के पास मोबाइल, नहीं बन पाया रक्षक नेपाल में 95 प्रतिशत से अधिक वयस्कों के पास डेटा सक्षम मोबाइल फोन होने के बावजूद सवाल यह है कि आपदा की स्थिति में तकनीक को जीवनरक्षक प्रणाली में क्यों नहीं बदला जा सका। एक प्रभावी तंत्र में खतरे की पहचान से लेकर अंतिम व्यक्ति तक संदेश पहुंचने और उसके बाद सुरक्षित स्थान तक जाने की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। भाषा और साक्षरता की बाधाओं को देखते हुए चेतावनी सिर्फ लिखित संदेश तक सीमित नहीं रह सकती। सायरन, कॉल, स्थानीय प्रसारण, पुलिस वाहन और समुदाय आधारित चेतावनी को एक साथ काम करना होगा। सीमा के दोनों ओर एक साझा खतरा भोटेकोशी और रसुवा की बाढ़ सिर्फ नेपाल की समस्या नहीं है। नदियां सीमाओं को नहीं पहचानतीं। नेपाल और भारत पहले से बाढ़ पूर्वानुमान के लिए वर्षा और नदी जलस्तर के आंकड़े साझा करते हैं, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र की जानकारी और शोध के परिणाम डरावने हैं। पर्वतीय विकास केंद्र ने नेपाल की गंडकी, कोशी और करनाली नदी घाटियों में 21 संभावित रूप से खतरनाक हिमनद झीलों की पहचान की है और हजारों हिमनद झीलों का मानचित्र तैयार किया है। शोधों में संकेत मिला है कि तापमान बढ़ने के साथ इन झीलों की संख्या और आकार दोनों बढ़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया है। इसका अर्थ है कि भोटेकोशी जैसी घटनाएं किसी एक गांव या एक नदी की कहानी भर नहीं हैं। वे आने वाले समय में नेपाल और भारत दोनों के लिए हिमालयी खतरे का पूर्वाभ्यास हो सकती हैं। त्रासदी का संदेश हिमालय की इस त्रासदी ने दुनिया के सामने एक स्पष्ट संदेश छोड़ा है, आपदा को हमेशा रोका नहीं जा सकता, लेकिन समय पर चेतावनी देकर मौत की संख्या जरूर कम की जा सकती है। मतलब, अब जान-माल की क्षति इस बात पर निर्भर करेगी कि आपदा की स्थिति में किसे, कब एवं किस माध्यम से जनता को चेतावनी देनी है और इसका निर्णय कितना तेज और स्वचालित है। 26 अगस्त के बाद भोटेकोशी और रसुवा में तबाही बोल रही है। कीचड़ में धंसे घर। मलबे में बदली बस्तियां। मिट्टी में दबी जिंदगी। सैलाब में खोई सांसें। पीछे छूटी सिसकियां। और एक सवाल, "जब मौत को आने में चंद मिनट लगे, तो चेतावनी को 38 मिनट क्यों लगे चाहिए?



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