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भागलपुर/देवघर। सावन की पहली भोर के साथ जैसे ही उत्तरवाहिनी गंगा की लहरों पर सूरज की सुनहरी आभा बिखरी, लाखों कंठों से निकला "बोल बम... हर-हर महादेव..." का जयघोष पूरे वातावरण में गूंज उठा। कंधों पर कांवर, आंखों में बाबा बैद्यनाथ के दर्शन की आस और मन में अटूट श्रद्धा लिए शिवभक्तों का जनसैलाब सुलतानगंज (बिहार) से देवघर (झारखंड) की ओर बढ़ चला, मानो आस्था स्वयं गंगाजल का कलश उठाकर 98 किलोमीटर लंबी उस पावन यात्रा पर निकल पड़ी हो, जहां हर कदम भक्ति है, हर सांस शिवमय है और हर मंजिल बाबा बैद्यनाथ के चरणों में समर्पण का प्रतीक बन जाती है। यह सिर्फ 98 किलोमीटर की पदयात्रा नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की श्रद्धा, विश्वास, तप और समर्पण की वह परंपरा है, जो सदियों से सावन के महीने में बिहार और झारखंड की धरती को शिवभक्ति के रंग में रंग देती है। जहां हर कदम 'बोल बम' है, हर सांस में बसते हैं भोलेनाथ सुलतानगंज से देवघर तक फैले कांवरिया पथ पर इन दिनों हर दृश्य भक्ति से सराबोर है। किसी के कंधे पर सजी रंग-बिरंगी कांवर है, कोई डमरू बजाते हुए आगे बढ़ रहा है तो कोई शिव भजनों में खोया हुआ है। सड़क किनारे लगे सेवा शिविरों से लगातार सुनाई देता है, "बोल बम... कांवरिया जी, जल पीजिए... थोड़ा विश्राम कर लीजिए...।" यहां कोई किसी का परिचित नहीं होता लेकिन हर चेहरा अपना लगता है। सेवा करने वाला भी शिवभक्त है और सेवा पाने वाला भी। क्यों अद्वितीय है सुलतानगंज की यह यात्रा देशभर में कई स्थानों से कांवर यात्रा निकलती है लेकिन सुलतानगंज की यात्रा का महत्व सबसे अलग है। इसकी वजह है उत्तरवाहिनी गंगा - वह पवित्र धारा, जो यहां उत्तर की ओर बहती है। मान्यता है कि लंकापति रावण ने सबसे पहले यहीं से गंगाजल लेकर बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक किया था। तभी से यह परंपरा अनवरत चली आ रही है। आज भी करोड़ों श्रद्धालु मानते हैं कि सच्चे मन से यहां से जल लेकर बाबा धाम में अर्पित करने पर भगवान शिव उनकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। सिर्फ श्रद्धा नहीं, सेवा भी है इस यात्रा की पहचान श्रावणी मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सेवा और मानवता का भी सबसे बड़ा उत्सव है। पूरे कांवरिया पथ पर जगह-जगह सेवा शिविर लगे हैं। कहीं शरबत और ठंडा पानी मिल रहा है, कहीं भोजन का प्रसाद तो कहीं थके हुए कांवरियों के लिए विश्राम की व्यवस्था है। अनजान लोग बिना किसी स्वार्थ के दिन-रात शिवभक्तों की सेवा में जुटे हैं। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी खूबसूरती है। 42 डॉक्टर, 14 चिकित्सा केंद्र... ताकि आस्था की राह आसान रहे लाखों श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए भागलपुर जिले में गंगा घाटों और कांवरिया मार्ग पर 14 अस्थायी चिकित्सा केंद्र बनाए गए हैं। यहां 42 डॉक्टर चौबीसों घंटे सेवा में तैनात हैं। गर्मी, थकान या किसी भी स्वास्थ्य समस्या की स्थिति में श्रद्धालुओं को तत्काल इलाज, दवाएं और चिकित्सकीय सलाह उपलब्ध कराई जा रही है। प्रशासन का प्रयास है कि श्रद्धा की इस यात्रा में स्वास्थ्य कभी बाधा न बने। रेलवे भी बन गया 'बोल बम' यात्रा का सहभागी श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए सुलतानगंज रेलवे स्टेशन भी पूरी तरह तैयार है। अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत बना 12 मीटर चौड़ा आधुनिक फुट ओवर ब्रिज , अतिरिक्त टिकट काउंटर, सुरक्षित पेयजल, मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट, चिकित्सा शिविर और स्वच्छ प्रतीक्षालय यात्रियों की सुविधा को नई पहचान दे रहे हैं। स्टेशन पर लगे सीसीटीवी कैमरे और सुरक्षा व्यवस्था यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि लाखों श्रद्धालुओं की यात्रा सुरक्षित और व्यवस्थित बनी रहे। देवघर में बाबा के दरबार की बदली व्यवस्था उधर, विश्वप्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ धाम भी श्रद्धालुओं के स्वागत के लिए पूरी तरह सज चुका है। इस वर्ष पूरे श्रावण मास में स्पर्श पूजा नहीं होगी। श्रद्धालु केवल अरघा के माध्यम से जलार्पण कर सकेंगे। जो श्रद्धालु शीघ्र दर्शन चाहते हैं, उनके लिए 600 रुपये शुल्क निर्धारित किया गया है। बाह्य अरघा की नई व्यवस्था के तहत श्रद्धालुओं का चढ़ाया जल पाइपलाइन से सीधे बाबा पर अर्पित होगा और मंदिर परिसर में लगी विशाल एलईडी स्क्रीन पर जलार्पण का सीधा दृश्य भी दिखाई देगा। करोड़ों आस्थाओं की रक्षा में हजारों हाथ श्रावणी मेले को सुचारु बनाने के लिए बिहार और झारखंड सरकार ने अभूतपूर्व तैयारी की है। देवघर और दुमका में 65 प्रशासनिक अधिकारी , 27 पुलिस पदाधिकारी , अतिरिक्त सुरक्षा बल और वायरलेस टीम तैनात हैं। वहीं सुलतानगंज में भी भीड़ प्रबंधन, महिला सुरक्षा, चिकित्सा, यातायात और आपदा प्रबंधन के लिए प्रशासन लगातार निगरानी कर रहा है। यह यात्रा सिर्फ पांव से नहीं, विश्वास से पूरी होती है श्रावणी कांवर यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां हर कांवरिया अपनी क्षमता के अनुसार चलता है लेकिन उसकी मंजिल एक ही होती है- बाबा बैद्यनाथ के चरण। कोई नंगे पांव चलता है, कोई डाक बम बनकर दौड़ता है, कोई परिवार के साथ आता है तो कोई वर्षों की मनौती पूरी करने के लिए लेकिन सबके होंठों पर एक ही नाम होता है- बाबा भोलेनाथ। आस्था की वह डोर, जो हर साल करोड़ों दिलों को जोड़ देती है सुलतानगंज से देवघर तक की यह यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत पहचान है। यहां न जाति का भेद दिखता है, न भाषा का, न प्रदेश का। केवल भगवा वस्त्रों में लिपटा एक विराट जनसमुदाय दिखाई देता है, जो शिव के नाम पर एक हो जाता है। श्रावणी मेला 2026 एक बार फिर यह याद दिला रहा है कि जब आस्था चल पड़ती है तो रास्ते अपने आप बन जाते हैं... और जब करोड़ों कंठों से एक साथ "बोल बम" गूंजता है, तो लगता है मानो पूरी सृष्टि स्वयं महादेव के स्वागत में खड़ी हो।



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