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रुड़की। आने वाले सालों में अगर इलेक्ट्रिक गाड़ियां ज्यादा सस्ती हों, उनकी बैटरियां ज्यादा लंबी चलें और पुरानी बैटरियों का बेहतर इस्तेमाल हो सके तो इसमें आईआईटी रुड़की और डब्ल्यूआरआई इंडिया की रिसर्च अहम भूमिका निभा सकती है। दोनों संस्थान ऐसे क्षेत्रों पर साथ मिलकर काम करेंगे, जो सीधे तौर पर भारत के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और बैटरी तकनीक से जुड़े हैं। आज भारत तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है। लेकिन, इस बदलाव के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौतियों में बैटरी की लागत, उसकी क्षमता, रीसाइक्लिंग और जरूरी खनिजों की उपलब्धता शामिल है। यही वे मुद्दे हैं, जिन पर दोनों संस्थान मिलकर गहन शोध करेंगे और इसके लिए हाल ही में दोनों संस्थानों ने एमओयू (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर किया है। आखिर क्यों जरूरी है यह रिसर्च जब भी इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने की बात आती है तो सबसे पहले बैटरी की कीमत और उसकी लाइफ को लेकर सवाल उठते हैं। बैटरी महंगी होने के कारण ईवी की कीमत भी ज्यादा रहती है। अगर बेहतर तकनीक विकसित होती है तो बैटरियां सस्ती, सुरक्षित और ज्यादा समय तक चलने वाली बन सकती हैं। इसका सीधा फायदा आम लोगों को मिलेगा। पुरानी बैटरियों का क्या होगा भारत में आने वाले वर्षों में लाखों बैटरियां इस्तेमाल के बाद बेकार होंगी। यदि उनका सही तरीके से निपटान और रीसाइक्लिंग नहीं हुआ तो यह पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं। आईआईटी रुड़की और डब्ल्यूआरआई इंडिया बैटरी रीसाइक्लिंग और संसाधनों के दोबारा उपयोग के मॉडल पर भी काम करेंगे, जिससे कचरा कम होगा और कीमती संसाधनों की बचत होगी। सिर्फ गाड़ियों तक सीमित नहीं है मामला बैटरियां केवल इलेक्ट्रिक कारों के लिए ही नहीं बल्कि सौर और पवन ऊर्जा को स्टोर करने के लिए भी बेहद जरूरी हैं। भारत जितना अधिक स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ेगा, उतनी ही ज्यादा जरूरत बेहतर बैटरी सिस्टम की होगी। यह रिसर्च ऊर्जा भंडारण को मजबूत बनाने में भी मदद कर सकती है। भविष्य के खनिजों पर भी होगी नजर लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे खनिज आज दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण संपत्तियों में गिने जा रहे हैं क्योंकि इन्हीं से आधुनिक बैटरियां बनती हैं। दोनों संस्थान यह भी अध्ययन करेंगे कि इन संसाधनों का बेहतर उपयोग कैसे हो और भविष्य में इनकी उपलब्धता कैसे सुनिश्चित की जाए। छात्रों और युवाओं को भी मिलेगा फायदा यह सहयोग सिर्फ लैब तक सीमित नहीं रहेगा। इसके तहत शोध परियोजनाएं, प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशालाएं और विशेषज्ञों के साथ संवाद जैसे अवसर भी उपलब्ध होंगे। इससे छात्रों और युवा शोधकर्ताओं को नई तकनीकों पर काम करने और भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को समझने का मौका मिलेगा। भारत के लिए क्या मायने हैं विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बैटरी तकनीक, रीसाइक्लिंग और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े समाधान भारत में विकसित होते हैं तो देश न केवल आयात पर निर्भरता कम कर सकेगा बल्कि वैश्विक स्तर पर भी नई तकनीकों का केंद्र बन सकता है। यही वजह है कि इस तरह की रिसर्च को भारत के ऊर्जा भविष्य और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।



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