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नई दिल्ली। कुछ जीवन अपनी उपलब्धियों से नहीं, अपने फैसलों से पहचाने जाते हैं। राम बहादुर राय का जीवन ऐसे ही फैसलों की एक लंबी श्रृंखला है। जब सुविधा सामने थी, उन्होंने संघर्ष चुना। जब राजनीति में आगे बढ़ने के अवसर थे, उन्होंने पत्रकारिता की कठिन राह पकड़ी। जब राज्यसभा जाने के दो अवसर आए, उन्होंने उन्हें भी स्वीकार नहीं किया। उनके जीवन को समझने के लिए उनके पदों से अधिक उन मोड़ों को देखना जरूरी है, जहां उन्होंने अपने विवेक को प्राथमिकता दी। आजादी की आहट के बीच जन्म वर्ष 1946। देश अपनी अर्जित स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा था। सामाजिक और राजनीतिक हलचल अपने चरम पर थी। ऐसी घटनाएं घट रही थीं, जो आने वाले राष्ट्र की आकांक्षाओं और स्वशासन के संघर्ष की दिशा तय करने वाली थीं। इसी उथल-पुथल के बीच पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर की शांत-सी दुनिया में एक बालक का जन्म हुआ—राम बहादुर राय। वे अपने माता-पिता की पहली संतान थे। उनके नाम की शुरुआत ‘राम’ से होती है। आज जब उनकी वैचारिक पहचान को राम से जोड़कर देखा जाता है तो यह संयोग अर्थपूर्ण लगता है। हालांकि पूर्वांचल में बच्चों के नाम देवी-देवताओं के नाम पर रखना कोई असामान्य परंपरा नहीं रही है। आसान राह के बजाय अपनी राह राम बहादुर राय , जिन्हें आज स्नेह और सम्मान से ‘राय साहब’ कहा जाता है, ने अपना जीवन परंपरागत अर्थों में सुविधाजनक बनाने के बजाय अपनी पसंद और विश्वास के अनुसार गढ़ा। पढ़ाई में उन्होंने जिला और राज्य स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उनकी राह उन्हें एक सुरक्षित, प्रतिष्ठित और आर्थिक रूप से सुविधाजनक जीवन की ओर ले जा सकती थी लेकिन उन्होंने आसान रास्ता नहीं चुना। 1965 की गर्मियों में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में एक छात्र आंदोलन खड़ा हुआ। विश्वविद्यालय के नाम से ‘हिंदू’ शब्द हटाने के विचार का विरोध हुआ और राम बहादुर राय ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। उनके नेतृत्व में आंदोलन ने जोर पकड़ा। अंततः विश्वविद्यालय ने इस प्रस्ताव को स्थगित कर दिया लेकिन राय के लिए रास्ता आसान नहीं हुआ। उन्हें निष्कासित कर दिया गया और नियमित छात्र के रूप में पढ़ाई जारी रखने के लिए माफी मांगने को कहा गया। राय साहब ने माफी मांगने से इनकार कर दिया। उन्होंने अपनी पीएचडी छोड़ दी और पूरी तरह छात्र राजनीति में उतर गए। पहला बड़ा ‘बहादुर’ फैसला यह उनके जीवन का पहला बड़ा ‘बहादुर’ फैसला था। इसके बाद उनकी सक्रियता और बढ़ी। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन सचिव के रूप में उन्होंने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन और छात्रों के सवालों को संगठित करने में भूमिका निभाई। उनके प्रभाव और सक्रियता को तत्कालीन सरकार के लिए गंभीर चुनौती के रूप में देखा गया। आपातकाल के दौर में मीसा के तहत गिरफ्तार किए जाने वाले शुरुआती लोगों में वे शामिल थे। उस समय अखबारों की सुर्खियां उन्हें राजनीति के एक उभरते हुए चेहरे के रूप में देख रही थीं। छात्र राजनीति का मंच, संगठन में भूमिका और सार्वजनिक पहचान, सब कुछ उनके सामने था। राजनीति में आगे बढ़ने की संभावनाएं भी कम नहीं थीं लेकिन उन्होंने फिर एक ऐसा फैसला किया जिसकी सहज कल्पना करना कठिन है। उन्होंने छात्र राजनीति छोड़ दी। राजनीति से पत्रकारिता की ओर राजनीतिक मंच की हलचल और नारों से निकलकर वे पत्रकारिता के एक अनजान न्यूजरूम में पहुंचे। यह परिवर्तन आसान नहीं रहा होगा। एक ओर कैंपस की पहचान और राजनीतिक सक्रियता थी, दूसरी ओर पत्रकारिता की ऐसी दुनिया जहां उन्हें अपनी जगह फिर से शून्य से बनानी थी। उन्होंने पत्रकारिता को चुना और पत्रकारिता उनके लिए केवल पेशा नहीं बनी। वह सत्य को खोजने, सवाल उठाने और उसे सार्वजनिक करने की पद्धति बन गई। उनकी पत्रकारिता का तरीका जिम्मेदार, तथ्यपरक और खोजी रहा। उन्होंने एक स्ट्रिंगर के रूप में शुरुआत की और लंबी यात्रा के बाद ‘जनसत्ता’ जैसे अग्रणी हिंदी दैनिक के संपादक पद तक पहुंचे। इन वर्षों के बीच उन्होंने भारतीय सार्वजनिक जीवन के कई महत्वपूर्ण और उथल-पुथल भरे दौर को करीब से देखा। सत्य के साथ प्रमाण का आग्रह राय साहब की पत्रकारिता में सत्य एक केंद्रीय मूल्य रहा लेकिन सत्य के प्रति आग्रह केवल कथन तक सीमित नहीं था। उसके साथ प्रमाण की जरूरत भी थी। यदि किसी खबर के पीछे दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं तो सत्ता, पद और प्रतिष्ठा उसके सामने बड़ी चीजें नहीं रह जातीं। उनकी दृष्टि में किसी प्रभावशाली व्यक्ति की बात अपने आप में अंतिम सत्य नहीं थी। प्रमाण की ताकत पद की ताकत से बड़ी हो सकती है। उनकी पत्रकारिता इसी विश्वास पर टिकी दिखाई देती है। यही कारण रहा कि भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में रहने के दौरान भी उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे शीर्ष नेताओं से जुड़े सवालों पर खबरें कीं और उन मुद्दों को सामने रखा जिन्हें वे सत्य और राष्ट्रीय हित की कसौटी पर जरूरी मानते थे। उनका यह तेवर किसी एक राजनीतिक दल या सत्ता-व्यवस्था तक सीमित नहीं था। भारतीय राजनीति के जटिल समीकरणों के बीच अलग-अलग राजनीतिक धाराओं से जुड़े लोग भी उनके व्यक्तित्व और पत्रकारिता के प्रति सम्मान रखते रहे। राज्यसभा के अवसर भी ठुकराए कहा जाता है कि उनके सामने दो अवसर ऐसे आए जब वे राज्यसभा में जा सकते थे। दोनों बार उन्होंने इन अवसरों को ठुकरा दिया। यह फैसला उनके लिए राजनीति से दूरी बनाने का एक और उदाहरण था। उनकी सोच थी कि किसी राजनीतिक दल में औपचारिक रूप से शामिल होने के बाद व्यक्ति की प्राथमिक जिम्मेदारी संगठनात्मक संरचना के प्रति हो जाती है। लेकिन उनके लिए राष्ट्रहित में सत्य को सामने रखना सर्वोच्च था। वे मानते थे कि विचारधारा व्यक्ति के विश्वास का निजी हिस्सा हो सकती है, लेकिन पत्रकारिता का दायित्व उससे बड़ा है। उनके लिए महत्वपूर्ण यह नहीं था कि कोई विचार किस व्यक्ति या संगठन की ओर से सामने आया है। महत्वपूर्ण यह था कि वह विचार तर्क, प्रमाण और राष्ट्रहित की कसौटी पर कितना खरा उतरता है। उन्हें दक्षिणपंथी विचारधारा के निकट माना जाता रहा है लेकिन यह निकटता उन्हें दूसरे विचारों में मौजूद सार्थक बातों को स्वीकार करने से नहीं रोकती थी। यदि किसी विचार या तर्क में तार्किकता और राष्ट्रहित दिखाई देता, तो वे उसके स्रोत से अधिक उसकी उपयोगिता को महत्व देते थे। इसी स्वतंत्र दृष्टि ने उनकी पत्रकारिता को अपनी अलग पहचान दी। अरुणाचल से दिल्ली तक की यात्रा अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों और दूरदराज के इलाकों में ‘हिंदुस्तान समाचार’ के संवाददाता के रूप में काम करने से लेकर राजधानी दिल्ली में उसी संस्था के समूह संपादक बनने तक की यात्रा आसान नहीं थी। यह उस पत्रकार की यात्रा थी, जिसने भारत को केवल राजधानी की नजर से नहीं बल्कि उसके दूरस्थ भूगोल और समाज के बीच जाकर भी देखा। मैदान से संपादकीय कक्ष तक का यह अनुभव उनके व्यक्तित्व में गहराई लेकर आया। उनके साथ काम करने वाले लोगों के लिए राय साहब केवल संपादक नहीं थे। वे एक तरह की जीवंत संस्था और संरक्षक की तरह रहे। उनका न्यूजरूम एक प्रयोगशाला जैसा माना जाता था, जहां पहले से यह तय नहीं होता था कि कौन सही है और कौन गलत। बहस होती थी। तर्क दिए जाते थे। प्रमाण खोजे जाते थे। विचार सुने जाते थे। जरूरत पड़ने पर बदले जाते थे और उचित लगने पर स्वीकार भी किए जाते थे लेकिन विचारों को केवल इसलिए दबाया नहीं जाता था कि वे किसी वरिष्ठ व्यक्ति से अलग हैं। आदेश नहीं, सोचने के संकेत उनके निर्देश भी अक्सर आदेश की तरह नहीं बल्कि संकेत की तरह होते थे—सुधारने वाले, सोचने के लिए प्रेरित करने वाले और पत्रकार को अपनी बात पर पुनर्विचार करने की गुंजाइश देने वाले। युवा पत्रकारों के भीतर वे साहस और स्वतंत्र सोच को प्रोत्साहित करते थे। किसी असहमति को व्यक्तिगत विरोध या चुनौती की तरह लेना उनकी शैली नहीं थी। शायद इसी कारण उनके साथ काम करने वालों के लिए उनकी वरिष्ठता केवल पद या उम्र से तय नहीं होती थी। वह उनके व्यवहार की गरिमा और अर्जित सम्मान से बनती थी। राय साहब की उपस्थिति में सादगी, गंभीरता और संयम का प्रभाव दिखाई देता है। वे कम बोलते हैं और धीरे बोलते हैं। उनके शब्दों की संख्या कम हो सकती है, लेकिन उनके पीछे अनुभव की लंबी यात्रा होती है। उनकी बातचीत में केवल सूचनाएं नहीं होतीं, बल्कि अनुभवों से निकले सवाल, दुविधाएं और उन दुविधाओं के बीच रास्ता खोजने की समझ होती है। उनके जीवन में पत्रकारिता का अर्थ केवल खबर लिखना नहीं रहा। वह अपने समय को समझने और उसे प्रश्नों के सामने खड़ा करने की प्रक्रिया रही। पत्रकार के रूप में बचाए रखी स्वतंत्रता इसीलिए उनकी यात्रा को केवल दक्षिणपंथी विचारधारा के साथ उनके जुड़ाव या किसी संस्थान में निभाई गई भूमिका तक सीमित करना पर्याप्त नहीं होगा। उनकी पहचान उस स्वतंत्रता में भी है जिसे उन्होंने पत्रकार के रूप में बचाए रखा। उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वे अवसरों के बावजूद सत्ता के औपचारिक ढांचे का हिस्सा नहीं बने। राज्यसभा में जाने के दो अवसरों को अस्वीकार करना इसी क्रम का हिस्सा था। उन्होंने राजनीति में मिलने वाली औपचारिक शक्ति के बजाय पत्रकारिता में मिली प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता को महत्व दिया।यह चुनाव केवल करियर का चुनाव नहीं था।यह उनके विवेक का चुनाव था। विश्वास के अनुरूप चुना रास्ता छात्र राजनीति में जब भविष्य उज्ज्वल दिखाई दे रहा था, उन्होंने राजनीति छोड़ी। जब राज्यसभा जाने का अवसर मिला, उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। और जब पत्रकारिता में प्रवेश किया तो स्ट्रिंगर से शुरुआत करके संपादक के पद तक पहुंचे। इस पूरी यात्रा में एक सूत्र लगातार दिखाई देता है—वे परिस्थितियों के अनुसार अपने विश्वास को बदलने के बजाय अपने विश्वास के अनुरूप रास्ता चुनते रहे।राय साहब का जीवन इस अर्थ में किसी एक उपलब्धि की कहानी नहीं है। यह निर्णयों की कहानी है। उन निर्णयों की, जिनमें सुविधा के बजाय स्वतंत्रता, पद के बजाय जिम्मेदारी और दावे के बजाय प्रमाण को महत्व दिया गया। कैंपस के शोर से न्यूज़रूम की खामोशी तक, छात्र राजनीति के मंच से संपादकीय मेज तक और सत्ता के करीब जाने की संभावनाओं से स्वतंत्र पत्रकारिता की जिम्मेदारी तक—उनकी यात्रा हर मोड़ पर एक सवाल छोड़ती है। व्यक्ति बड़ा उसकी उपलब्धियों से होता है या उसके चुनावों से? राम बहादुर राय की जिंदगी इसका अपना उत्तर देती हुई दिखाई देती है। पद से अधिक फैसलों का परिचय उन्होंने बार-बार उन रास्तों को छोड़ा, जो उन्हें आसानी से प्रतिष्ठा, पद या राजनीतिक शक्ति तक ले जा सकते थे। इसके बदले उन्होंने वह राह चुनी जिसमें सवाल अधिक थे, जोखिम अधिक था और निश्चितता कम। शायद इसी कारण उनके जीवन का सबसे अर्थपूर्ण परिचय उनके पदों में नहीं, उनके फैसलों में मिलता है। राजनीतिक मंच और सत्ता की संभावनाओं से दूर होकर उन्होंने पत्रकारिता की वह राह चुनी, जिसमें उनके लिए राष्ट्रहित, प्रमाण और सत्य किसी भी व्यक्तिगत या संगठनात्मक सुविधा से ऊपर रहे। शताब्दी की ओर बढ़ते उनके जीवन को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि राम बहादुर राय ने केवल अपने समय को जिया नहीं। उन्होंने अपने फैसलों के जरिए उसे परखने और समझने की कोशिश भी की और उनके जीवन की सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि क्षमता आपको अवसर देती है लेकिन आपकी पहचान अंततः आपके चुनाव तय करते हैं। (डाॅ. संगीता दुबे: दिल्ली विश्वविद्यालय के महाराजा अग्रसेन कॉलेज में राजनीति विज्ञान पढ़ाती हैं।)



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