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नई दिल्ली , 14 मई (आईएनआई) पश्चिम एशिया युद्ध और हॉर्मुज स्ट्रेट में संकट ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा, एलपीजी सप्लाई और अर्थव्यवस्था पर गहरा दबाव बढ़ा दिया है, जिससे महंगाई और आयात लागत को लेकर सरकार की चिंता बढ़ गई है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) की जारी ताजा ऑयल मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक तेल संकट के बीच भारत को एलपीजी की भारी कमी, आयात लागत में बढ़ोतरी, रुपये पर दबाव और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत उन देशों में शामिल है जिन पर इस संकट का सबसे तेज प्रभाव पड़ा है। आईईए के अनुसार, हॉर्मुज स्ट्रेट के बाधित होने के बाद भारत में एलपीजी और एथेन की उपलब्धता तेजी से घटी है। अप्रैल 2026 में भारत में एलपीजी/एथेन की खपत सालाना आधार पर 1.60 लाख बैरल प्रतिदिन तक गिर गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में एलपीजी सिलेंडरों की कमी के कारण कई इलाकों में लंबी कतारें देखी गईं और घरेलू उपभोक्ताओं पर इसका सीधा असर पड़ा। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर होकर पूरा करता है और हॉर्मुज स्ट्रेट उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। खाड़ी देशों से आने वाली सप्लाई प्रभावित होने के कारण भारत के आयात पर दबाव बढ़ा है। केप्लर के ट्रेड डेटा के अनुसार, अप्रैल में भारत में एलपीजी आयात घटकर लगभग आधे स्तर पर पहुंच गया। हालांकि सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश की है, लेकिन आईईए का कहना है कि यह भारत के लिए बेहद महंगा साबित हो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जून 2022 के बाद से भारत में खुदरा ईंधन कीमतों में बहुत कम बदलाव हुआ है जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। इससे सरकार और तेल कंपनियों पर भारी वित्तीय दबाव बढ़ गया है। आईईए ने चेतावनी दी है कि लगातार महंगा तेल और कमजोर होता रुपया भारत की खरीद क्षमता को और प्रभावित कर सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2026 में डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया, जिससे कच्चे तेल का आयात और महंगा हो गया। यही वजह है कि विदेशी निवेशकों ने भी भारतीय बाजार से बड़ी निकासी शुरू कर दी है। केवल 2026 के शुरुआती चार महीनों में विदेशी निवेशकों ने शेयर बाजार से करीब 20 अरब डॉलर निकाल लिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में सड़क परिवहन ईंधन यानी पेट्रोल और डीजल की मांग अभी मजबूत बनी हुई है। मार्च और अप्रैल में गैसोइल और गैसोलीन की मांग में वृद्धि दर्ज की गई, जिसका एक बड़ा कारण लोगों के बीच भविष्य में सप्लाई संकट की आशंका और ईंधन जमा करने की प्रवृत्ति रही। कई राज्यों में पेट्रोल पंपों पर अचानक भीड़ और जमाखोरी जैसी स्थिति देखने को मिली। आईईए का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचता है तो भारत में महंगाई और बढ़ सकती है। परिवहन, कृषि, उद्योग और घरेलू गैस जैसी जरूरतों की लागत बढ़ने से आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। खासकर गरीब और मध्यम वर्ग के लिए एलपीजी और ईंधन की कीमतें बड़ी चिंता बन सकती हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत फिलहाल सरकारी मूल्य नियंत्रण और सब्सिडी के जरिए स्थिति संभालने की कोशिश कर रहा है लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना आसान नहीं होगा। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहीं तो सरकार को या तो कीमतें बढ़ानी पड़ेंगी या फिर भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ेगा। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट भारत के लिए एक बड़ा संकेत है कि भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ाने और तेल आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में तेजी से काम करना होगा क्योंकि पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता का असर अब केवल वैश्विक राजनीति तक सीमित नहीं बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था और आम जनता की रसोई तक पहुंच चुका है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में इस वैश्विक ऊर्जा संकट पर चिंता जताते हुए कहा कि हॉर्मुज स्ट्रेट में जारी तनाव भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों के लिए बड़ी चुनौती है लेकिन सरकार हर स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है और पेट्रोल, डीजल एवं एलपीजी की सप्लाई सुचारु बनाए रखने के लिए दुनिया के कई देशों के साथ सक्रिय समन्वय कर रही है। उन्होंने देशवासियों से ईंधन की बचत करने और जरूरत के मुताबिक ही पेट्रोल-डीजल इस्तेमाल करने की अपील करते हुए कहा कि पिछले एक दशक में भारत ने ऊर्जा आयात के स्रोत 27 देशों से बढ़ाकर 41 देशों तक किए हैं, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत किया है और वैकल्पिक ऊर्जा पर तेजी से काम किया है, जिसकी वजह से मौजूदा संकट का मुकाबला करने में देश पहले से अधिक सक्षम स्थिति में है।



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