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नयी दिल्ली। पेरिस के एफिल टावर में बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के दौरान कुछ महिला कर्मचारियों को कथित तौर पर ड्यूटी से हटाए जाने को लेकर उठे विवाद से भारत सरकार ने खुद को अलग रखते हुए कहा है कि यह मामला संबंधित पक्षों के बीच का है और विदेश मंत्रालय को इस पर कोई टिप्पणी नहीं करनी है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार को साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में इस मुद्दे पर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा कि भारत को पेरिस में बीएपीएस संस्था द्वारा एक मंदिर खोले जाने की जानकारी है लेकिन एफिल टावर से जुड़ा विशेष विवाद संबंधित संस्थाओं के बीच का मामला है। ‘एफिल टॉवर से जुड़ा सवाल संबंधित संस्थाओं का मामला’ श्री जायसवाल ने कहा, “हमें पेरिस में बीएपीएस संस्था द्वारा एक मंदिर खोले जाने की जानकारी है। जहां तक टावर से जुड़े विशेष सवाल की बात है तो यह पूरी तरह से संबंधित संस्थाओं के बीच का मामला है।” इस बयान के जरिए विदेश मंत्रालय ने साफ संकेत दिया कि वह इस विवाद को भारत और फ्रांस के बीच किसी कूटनीतिक मुद्दे के रूप में नहीं देख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के वर्चुअल संदेश पर भी दिया जवाब ब्रीफिंग में पेरिस के निकट स्वामीनारायण संप्रदाय की बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) के मंदिर उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वर्चुअल संबोधन को लेकर भी सवाल पूछा गया। इस पर विदेश मंत्रालय ने कहा कि ऐसे अवसरों पर प्रधानमंत्री की ओर से शुभकामना संदेश देना सामान्य प्रक्रिया है और इस पर अलग से प्रतिक्रिया देने की जरूरत नहीं है। क्या है एफिल टॉवर विवाद गौरतलब है कि विवाद की शुरुआत बीएपीएस के एक प्रतिनिधिमंडल की एफिल टावर यात्रा के बाद हुई। मंदिर उद्घाटन के बाद शनिवार को बीएपीएस का एक प्रतिनिधिमंडल एफिल टावर पहुंचा था। इसके बाद यह दावा सामने आया कि प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी के दौरान कुछ महिला कर्मचारियों को उनके कार्यस्थल से हटाया गया या उनकी मौजूदगी सीमित की गई। यही दावा बाद में कर्मचारियों के असंतोष और व्यापक विवाद का कारण बना। कर्मचारियों ने जताया था विरोध इससे पहले सामने आई जानकारी के मुताबिक एफिल टावर के कर्मचारियों ने आरोप लगाया था कि प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के दौरान कुछ महिला कर्मचारियों को अपने पदों से हटने, स्टाफ क्षेत्रों में रहने या कुछ स्थानों से दूर रहने के लिए कहा गया। कुछ पोस्ट पर महिलाओं की जगह पुरुष कर्मचारियों को तैनात किए जाने की बात भी सामने आई थी। कर्मचारियों ने इसे लैंगिक भेदभाव से जुड़ा मामला बताते हुए विरोध दर्ज कराया था। विवाद के बाद बंद रहा था एफिल टावर इस मामले ने तब और तूल पकड़ा जब कर्मचारियों ने विरोध में हड़ताल की और एफिल टावर एक दिन के लिए बंद रहा। कर्मचारियों की आम सभा में इस पूरे घटनाक्रम पर नाराजगी जताई गई और प्रबंधन से जवाबदेही की मांग की गई। एफिल टावर का संचालन करने वाली संस्था ने बाद में स्वीकार किया था कि प्रतिनिधिमंडल की ओर से ऐसी व्यवस्था की मांग की गई थी जिसमें उसके आध्यात्मिक नेता का महिलाओं से संपर्क सीमित रहे। प्रबंधन ने यह भी माना था कि ऐसी शर्तों को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए था। बीएपीएस ने जताया था खेद विवाद बढ़ने के बाद बीएपीएस ने भी उन लोगों से माफी मांगी थी जिन्हें इस घटना के कारण ठेस पहुंची या असुविधा हुई। संस्था का कहना था कि बड़े प्रतिनिधिमंडल की यात्रा को एफिल टावर की टीमों के साथ मिलकर इस तरह समन्वित किया गया था कि दूसरे पर्यटकों को कम से कम परेशानी हो। हालांकि महिला कर्मचारियों की मौजूदगी सीमित किए जाने के आरोप ने पूरे मामले को केवल व्यवस्थागत मुद्दे से आगे बढ़ाकर लैंगिक समानता की बहस में बदल दिया। फ्रांस में क्यों बढ़ा मामला फ्रांस में यह मुद्दा इसलिए ज्यादा संवेदनशील बना क्योंकि वहां सार्वजनिक जीवन और कार्यस्थल पर लैंगिक समानता को लेकर बेहद कड़ा सामाजिक और राजनीतिक रुख है। पेरिस प्रशासन से जुड़े नेताओं और फ्रांस सरकार के प्रतिनिधियों ने भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि महिलाओं को केवल उनके लिंग के आधार पर पीछे हटने या अलग रहने के लिए नहीं कहा जा सकता। इस विवाद के बाद एफिल टॉवर प्रबंधन ने पूरे घटनाक्रम की समीक्षा और परिस्थितियों की जांच का भरोसा दिया था।