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नई दिल्ली। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में ड्यूटी के दौरान देशभर में कितने सरकारी और सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई और उनकी जान जाने की वजह क्या थी, इस सवाल का एक जगह से जवाब नहीं मिलने पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के असिस्टेंट कमांडेंट राहुल सोलंकी दिल्ली उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) पहुंच गए हैं, जहां उनकी याचिका पर बुधवार को नोटिस जारी किया गया। दो साल पहले आरटीआई में पूछा था सीधा सवाल इस मामले की शुरुआत 27 जुलाई 2024 को हुई थी। राहुल सोलंकी ने चुनाव आयोग से सूचना के अधिकार के तहत पूछा था कि 2024 के आम चुनाव में ड्यूटी करते हुए कुल कितने सरकारी कर्मचारियों की मौत हुई और प्रत्येक मामले में मौत की वजह क्या थी। उस चुनाव के दौरान भीषण गर्मी के बीच ड्यूटी कर रहे कई सरकारी और सुरक्षाकर्मियों की मौत की खबरें सामने आई थीं। श्री सोलंकी भी चुनाव के दौरान संवेदनशील क्षेत्रों में ड्यूटी कर चुके हैं और फिलहाल मणिपुर के इंफाल में सीआरपीएफ की जी/87 बटालियन में तैनात हैं। चुनाव आयोग बोला- हमारे पास केंद्रीय रिकॉर्ड नहीं आरटीआई के जवाब में 02 अगस्त 2024 को चुनाव आयोग के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) ने बताया कि मांगे गए आंकड़े निर्वाचन सदन में केंद्रीय स्तर पर नहीं रखे जाते। यह जानकारी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के पास उपलब्ध हो सकती है। यहीं से विवाद शुरू हुआ। श्री सोलंकी चाहते थे कि उनका आवेदन आरटीआई कानून की धारा 6(3) के तहत संबंधित अधिकारियों तक भेजा जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्हें अलग-अलग राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के पास अलग-अलग आरटीआई लगाने की सलाह दी गई। सवाल- जब जानकारी राज्यों के पास है तो आरटीआई वहां भेजी क्यों नहीं गई? श्री सोलंकी ने अदालत में इसी प्रक्रिया पर सवाल उठाया है। उनकी दलील है कि जब यह माना गया कि मांगी गई सूचना राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के पास हो सकती है तो नागरिक को दर्जनों अलग-अलग आवेदन करने के लिए कहने के बजाय मूल आरटीआई को संबंधित प्राधिकरणों के पास भेजा जाना चाहिए था। उनका कहना है कि आरटीआई कानून की धारा 6(3) ऐसी स्थिति में आवेदन को उचित सार्वजनिक प्राधिकरण के पास स्थानांतरित करने का प्रावधान करती है। सीआईसी से भी नहीं मिली राहत, अब हाईकोर्ट में चुनौती चुनाव आयोग के स्तर पर अपील से राहत नहीं मिलने के बाद मामला केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) पहुंचा। 30 अप्रैल 2026 को मुख्य सूचना आयुक्त राज कुमार गोयल ने श्री सोलंकी की दूसरी अपील खारिज कर दी। सीआईसी ने सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों से सूचना जुटाने या आवेदन स्थानांतरित करने की मांग को प्रशासनिक बोझ से जोड़ते हुए स्वीकार नहीं किया। सीआईसी में सुनवाई के दौरान श्री सोलंकी की ओर से अधिवक्ता नीरज कुमार उपस्थित हुए थे। अब श्री सोलंकी ने इसी आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है। उनकी ओर से अधिवक्ता अंशुल कुमार और मनीष मिश्रा मामले की पैरवी कर रहे हैं। सिर्फ आंकड़ा नहीं, आरटीआई की प्रक्रिया पर भी बड़ी कानूनी लड़ाई याचिका में केवल मृत कर्मचारियों की संख्या बताने की मांग नहीं की गई है। श्री सोलंकी चाहते हैं कि हाईकोर्ट अप्रैल 2026 के सीआईसी के आदेश को रद्द करे और चुनाव आयोग को उनकी मूल आरटीआई सभी राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों तक भेजने का निर्देश दे ताकि निश्चित समय के भीतर जानकारी सामने आ सके। इसके साथ ही अदालत से यह स्पष्ट करने की मांग की गई है कि यदि कोई सूचना कई सार्वजनिक प्राधिकरणों के पास बंटी हुई है तो क्या आरटीआई अधिनियम की धारा 6(3) के तहत एक आवेदन को एक से अधिक संबंधित प्राधिकरणों को भेजा जा सकता है। चुनाव ड्यूटी में मौतों का स्थायी रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की भी मांग याचिका में एक और अहम मांग चुनाव ड्यूटी के दौरान होने वाली मौतों के रिकॉर्ड को लेकर है। श्री सोलंकी चाहते हैं कि चुनाव आयोग ऐसे मामलों के आंकड़ों को व्यवस्थित रूप से संकलित और सुरक्षित रखे तथा आरटीआई अधिनियम की धारा 4 के तहत इन्हें स्वतः सार्वजनिक करे। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 324 के साथ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 28ए और 159 का भी हवाला दिया है और चुनावी ड्यूटी में लगे कर्मचारियों पर चुनाव आयोग के नियंत्रण एवं निगरानी की भूमिका को अपनी दलील का आधार बनाया है।



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