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नई दिल्ली। खेती में अक्सर कहा जाता है कि फसल की किस्मत बीज बोते समय ही तय हो जाती है। अगर बीज मजबूत है तो फसल भी अच्छी होगी, लेकिन अगर अंकुरण कमजोर रहा या मौसम ने साथ नहीं दिया तो किसान की पूरी मेहनत पर असर पड़ सकता है। अब वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जो बीज को बोने से पहले ही मजबूत बना देती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान (आईआईओआर) की नई ‘स्मार्ट सीड कोटिंग’ तकनीक किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई है। क्या है स्मार्ट सीड तकनीक इसे आसान भाषा में समझें तो यह बीज के ऊपर एक खास सुरक्षा की परत चढ़ाने की तकनीक है। यह परत सिर्फ बीज को ढंकती नहीं बल्कि उसके साथ जरूरी पोषक तत्व, लाभकारी सूक्ष्मजीव और पौधों को बढ़ाने में मदद करने वाले तत्व भी जोड़ती है। यानी किसान जब बीज बोता है तो उसके साथ पौधे को शुरुआती दिनों में जरूरत पड़ने वाली कई चीजें पहले से ही मौजूद रहती हैं। क्यों जरूरी है यह तकनीक आज खेती पहले जैसी नहीं रही। कभी बारिश देर से होती है, कभी जरूरत से ज्यादा हो जाती है। कहीं सूखा पड़ जाता है तो कहीं तापमान अचानक बढ़ जाता है। ऐसे हालात में सबसे ज्यादा नुकसान फसल के शुरुआती चरण में होता है, जब बीज अंकुरित हो रहा होता है। यदि इसी समय पौधे को पर्याप्त सुरक्षा और पोषण मिल जाए तो उसके जीवित रहने और अच्छी बढ़वार की संभावना काफी बढ़ जाती है। यही काम स्मार्ट सीड तकनीक करती है। 30 प्रतिशत तक बढ़ सकती है पैदावार आईसीएआर-आईआईओआर द्वारा तेलंगाना में किसानों के खेतों पर किए गए प्रदर्शन में मूंगफली और सोयाबीन की पैदावार पारंपरिक खेती की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत तक अधिक दर्ज की गई। इतना ही नहीं, सोयाबीन, मक्का, मूंगफली, चना, कपास, सरसों और अरहर जैसी फसलों पर देश के विभिन्न क्षेत्रों में किए गए परीक्षणों में 12 से 37 प्रतिशत तक उत्पादन वृद्धि देखने को मिली। किसानों के लिए इसका सीधा मतलब है, उसी खेत से ज्यादा उत्पादन और ज्यादा आमदनी। बारानी खेती वाले किसानों को सबसे ज्यादा फायदा भारत का एक बड़ा कृषि क्षेत्र आज भी मानसून पर निर्भर है। ऐसे क्षेत्रों में बारिश की अनिश्चितता किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्ट सीड तकनीक ऐसे किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है क्योंकि यह बीज को शुरुआती दिनों में नमी की कमी, तापमान में बदलाव और अन्य तनावों से लड़ने की ताकत देती है। एक तकनीक, कई फसलों में फायदा इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी बहुउपयोगिता है। इसे सिर्फ तिलहनों तक सीमित नहीं रखा गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसे दालों, अनाज, मोटे अनाज, कपास, सब्जियों, मसालों और बागवानी फसलों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यानी भविष्य में यह तकनीक देश के करोड़ों किसानों तक पहुंच सकती है। कम जोखिम, ज्यादा मुनाफा खेती में सबसे बड़ा डर फसल खराब होने का होता है। यदि बीज का अंकुरण बेहतर हो, पौधे मजबूत बनें और शुरुआती नुकसान कम हो जाए तो किसान का जोखिम अपने आप घट जाता है। स्मार्ट सीड तकनीक का मकसद भी यही है, कम संसाधनों में बेहतर फसल तैयार करना और किसानों को ज्यादा उत्पादन के जरिए अधिक मुनाफा दिलाना। अब किसानों तक पहुंचाने की तैयारी आईसीएआर-आईआईओआर इस तकनीक को बड़े पैमाने पर किसानों तक पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय बीज निगम, राज्य बीज विकास निगमों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), सहकारी संस्थाओं और निजी बीज कंपनियों के साथ काम कर रहा है। यदि यह तकनीक बड़े स्तर पर अपनाई जाती है तो आने वाले वर्षों में किसानों को ऐसे बीज मिल सकते हैं जो बदलते मौसम की चुनौतियों का बेहतर सामना कर सकें। खेती का भविष्य बदल सकते हैं स्मार्ट बीज कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य की खेती सिर्फ अच्छी किस्मों पर नहीं बल्कि ऐसे बीजों पर निर्भर करेगी जो मौसम के उतार-चढ़ाव को झेल सकें और कम संसाधनों में भी अच्छी पैदावार दें। स्मार्ट सीड तकनीक इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो किसानों को बेहतर अंकुरण, मजबूत फसल, ज्यादा उत्पादन और बढ़ी हुई आमदनी का रास्ता दिखा सकती है। अगर यह तकनीक व्यापक स्तर पर अपनाई जाती है, तो यह लाखों किसानों की खेती और जिंदगी दोनों में बड़ा बदलाव ला सकती है।