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भागलपुर। श्रावणी मेले में हर साल लाखों कांवरिये नजर आते हैं। कोई नंगे पांव चलता है, कोई कंधे पर कांवर उठाकर "बोल बम" का जयघोष करता है, तो कोई वर्षों पुरानी मन्नत पूरी होने पर झारखंड के देवघर में विराजमान बाबा बैद्यनाथ का शुक्रिया अदा करने निकल पड़ता है लेकिन इस बार बिहार के सुल्तानगंज की पवित्र धरती से निकली एक यात्रा ऐसी है, जिसने हजारों श्रद्धालुओं के कदम रोक दिए हैं। कच्ची कांवरिया पथ पर एक पिता बार-बार जमीन पर पूरी देह से दंडवत करता है... फिर उठता है... कुछ कदम चलता है... और सबसे पहले मुड़कर अपनी दो माह की नन्हीं बेटी को देखता है, जो फूलों से सजी छोटी-सी डोली में मासूम मुस्कान के साथ लेटी हुई है। यह दृश्य सिर्फ आंखों से नहीं, दिल से देखा जाता है। बाबा से कहा था... अगर बेटी मिली तो उसे गोद में नहीं, साथ लेकर आऊंगा बिहार के मुजफ्फरपुर के रहने वाले मिथिलेश कुमार बताते हैं कि पिछले वर्ष जब वह बाबा बैद्यनाथ के दरबार पहुंचे थे, तब उनके मन में एक ही इच्छा थी, "बाबा, मुझे बेटी का सुख दे दीजिए।" उस पल उन्होंने एक प्रण भी लिया, "अगर मेरी झोली बेटी से भर गई, तो अगले श्रावण में मैं उसे अपने साथ लेकर दंडवत यात्रा करते हुए आपके दरबार आऊंगा।" समय बीता... और इस वर्ष उनके घर नन्हीं बिटिया ने जन्म लिया। बहुतों के लिए यह एक संयोग होगा लेकिन एक पिता के लिए यह उसके भगवान का आशीर्वाद था। इसलिए, उसने अपनी मन्नत को सिर्फ याद नहीं रखा बल्कि उसे निभाने के लिए सबसे कठिन रास्ता चुन लिया। हर दंडवत के बाद पहले बेटी को देखते हैं, फिर बाबा को याद करते हैं दंडवत यात्रा आसान नहीं होती। पूरे शरीर को जमीन पर टिकाकर बार-बार उठना, फिर आगे बढ़ना... यह कई किलोमीटर तक चलता है। लेकिन, मिथिलेश के चेहरे पर न थकान दिखती है, न शिकायत। हर बार दंडवत करने के बाद उनकी पहली नजर बाबा के मंदिर की दिशा में नहीं बल्कि अपनी बेटी की डोली पर जाती है। वह उसके माथे पर हाथ फेरते हैं, मुस्कुराते हैं और फिर अगला दंडवत शुरू कर देते हैं, मानो भगवान तक पहुंचने का रास्ता भी उनकी बेटी से होकर गुजरता हो। दो महीने की बच्ची... लेकिन इंतजाम किसी राजकुमारी जैसे इतनी छोटी बच्ची इतनी कठिन यात्रा कैसे करेगी? यही सवाल हर राहगीर के मन में आता है लेकिन जैसे ही लोग डोली के पास पहुंचते हैं, उनके चेहरे पर हैरानी उतर आती है। डोली में सोलर ऊर्जा से चलने वाली व्यवस्था है। गर्मी से बचाने के लिए पंखा लगाया गया है। रात के सफर के लिए रोशनी की सुविधा है। बेटी आराम से सो सके, इसके लिए विशेष बिस्तर तैयार किया गया है। एक पिता ने शायद ही कोई ऐसी चीज छोड़ी हो, जिससे उसकी बच्ची को असुविधा हो। जहां बेटी के जन्म पर मातम मनाया जाता है, वहां यह पिता उत्सव मना रहा है आज भी समाज के कई हिस्सों में बेटी के जन्म पर चेहरे उतर जाते हैं लेकिन मिथिलेश की कहानी बिल्कुल अलग है। उनके घर पहले से एक बेटा है, फिर भी वह गर्व से कहते हैं, "बेटी आई, तब लगा कि परिवार पूरा हुआ।" शायद यही एक वाक्य इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा संदेश है। श्रद्धालु रुकते हैं... बिटिया को आशीर्वाद देते हैं... और पिता को सलाम करते हैं कच्ची कांवरिया पथ पर हजारों लोग गुजर रहे हैं लेकिन जैसे ही यह डोली दिखाई देती है, लोग अपने कदम रोक लेते हैं। कोई हाथ जोड़कर बच्ची को आशीर्वाद देता है, कोई पिता के जज्बे को प्रणाम करता है, कई लोगों की आंखें भर आती हैं। श्रद्धा के इस महासागर में यह दृश्य मानो इंसानियत की सबसे सुंदर लहर बनकर उभरता है। यह यात्रा बाबा तक नहीं, समाज तक पहुंच रही है मिथिलेश कुमार कहते हैं कि यह सिर्फ उनकी मन्नत पूरी होने की खुशी नहीं है। वह चाहते हैं कि लोग बेटियों को बोझ नहीं बल्कि सौभाग्य समझें। उनका हर दंडवत समाज से एक सवाल पूछता है, "जिस बेटी के लिए एक पिता सैकड़ों किलोमीटर तक अपने शरीर को धरती पर झुका सकता है, क्या उस बेटी को जन्म लेने, पढ़ने, आगे बढ़ने और सम्मान से जीने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए?" श्रावणी मेले की सबसे खूबसूरत तस्वीर श्रावणी मेले में लाखों कांवरिये हर साल आते हैं और चले जाते हैं लेकिन कुछ यात्राएं इतिहास नहीं, दिलों में दर्ज हो जाती हैं। दो महीने की मासूम बेटी...एक डोली...एक पिता का अटूट विश्वास...और हर दंडवत के साथ दोहराया जा रहा एक वादा.....। शायद यही इस साल के श्रावणी मेले की सबसे खूबसूरत तस्वीर है क्योंकि इस यात्रा में सिर्फ बाबा बैद्यनाथ की भक्ति नहीं है बल्कि एक पिता की आंखों में अपनी बेटी के लिए छलकता गर्व भी है। और यही गर्व इस कहानी को साधारण धार्मिक यात्रा से उठाकर पिता के प्रेम और बेटियों के सम्मान की अमर दास्तान बना देता है।