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पटना। बिहार में हर परिवार को पाइप से सुरक्षित पेयजल पहुंचाने के लिए शुरू की गई ‘हर घर नल का जल’ योजना की जमीनी तस्वीर सरकारी दावों से अलग दिखाई देती है। विधानसभा के मॉनसून सत्र में उप मुख्यमंत्री बिजेंद्र यादव द्वारा सदन के पटल पर रखी गई भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के मुताबिक लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (पीएचईडी) राज्य के 46,633 ग्रामीण वार्डों के 11.22 लाख परिवारों को योजना से नहीं जोड़ सका। सबसे गंभीर बात यह है कि इन वंचित परिवारों में 8.07 लाख ऐसे वार्डों में रहते थे, जहां का पानी दूषित था। 30,500 करोड़ रुपये से अधिक का आवंटन, फिर भी कवरेज अधूरा सीएजी के अनुसार, राज्य में यह योजना दिसंबर 2015 में शुरू की गई थी। इसका लक्ष्य प्रत्येक परिवार को पर्याप्त और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना, जलजनित बीमारियां कम करना और वर्ष 2020 तक पीने के पानी के लिए हैंडपंप पर निर्भरता खत्म करना था। वर्ष 2017-18 से 2022-23 के बीच पंचायती राज विभाग, लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग और नगर विकास एवं आवास विभाग ने अपनी कार्यान्वयन इकाइयों को योजना के लिए कुल 30,500.92 करोड़ रुपये आवंटित किए। सीएजी ने 12 चयनित जिलों में योजना के क्रियान्वयन की जांच की। कागज पर 98.70%, जमीन पर 95.71% कवरेज सीएजी ने पाया कि मार्च 2023 तक ग्रामीण परिवारों का कवरेज 98.70 प्रतिशत बताया गया था लेकिन नवंबर 2025 तक वास्तविक कवरेज 95.71 प्रतिशत ही था। रिपोर्ट के अनुसार कवरेज के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। शहरी क्षेत्रों में भी मार्च 2023 तक केवल 94 प्रतिशत परिवारों के कवरेज की सूचना दी गई जबकि योजना का लक्ष्य मार्च 2020 तक शहरी परिवारों का शत-प्रतिशत कवरेज हासिल करना था। दूषित पानी वाले 77 वार्डों में ट्रीटमेंट प्लांट ही नहीं योजना लागू करने वाले विभागों के बीच वार्डों के बंटवारे में स्पष्टता और समन्वय की कमी भी सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार दूषित पानी वाले 77 वार्डों को बिना वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के कवर कर दिया गया। इसके उलट 19 ऐसे वार्ड , जो पानी की गुणवत्ता की समस्या से प्रभावित नहीं थे, उन्हें योजना के तहत किसी भी संबंधित विभाग ने कवर नहीं किया। जहां फ्लोराइड अधिक नहीं था, वहीं लगा दिए 2.77 करोड़ के प्लांट सीएजी की एक और चौंकाने वाली टिप्पणी फ्लोराइड प्रभावित बस्तियों से जुड़ी है। लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग ने 1,000 फ्लोराइड प्रभावित बस्तियों में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, विस्तृत सर्वेक्षण और कार्यस्थलों की सही पहचान के बिना योजनाएं लागू कीं। इसका नतीजा यह हुआ कि 2.77 करोड़ रुपये की 15 योजनाओं के तहत ऐसे स्थानों पर फ्लोराइड रिमूवल प्लांट लगा दिए गए, जहां पानी में फ्लोराइड का स्तर अधिक था ही नहीं। काम हुआ नहीं, ठेकेदारों को 2.31 करोड़ का भुगतान रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितता का भी गंभीर मामला सामने आया। नमूना जांच किए गए पांच लोक स्वास्थ्य प्रमंडलों में कार्यों का वास्तविक क्रियान्वयन नहीं होने के बावजूद ठेकेदारों को 2.31 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया। समय पर शुरू ही नहीं हुईं 59 प्रतिशत योजनाएं लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग की योजनाओं को वर्ष 2019-20 के अंत तक पूरा किया जाना था लेकिन 59 प्रतिशत योजनाएं 2019-20 या 2018-19 के अंतिम चरण में शुरू की गईं। इस देरी के कारण लोगों को नल से जल की आपूर्ति की सुविधा समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी। प्लांट लगे, लेकिन कई बंद या क्षमता से कमजोर सीएजी ने बिहार में जल गुणवत्ता प्रबंधन को अपर्याप्त बताया। कई प्रभावित वार्ड या तो योजना से बाहर रह गए या वहां चालू वाटर ट्रीटमेंट प्लांट उपलब्ध नहीं थे। जिन स्थानों पर प्लांट लगाए गए, उनमें से भी कई बंद या जरूरत से कम क्षमता वाले पाए गए।पंचायती राज विभाग और शहरी स्थानीय निकायों की अधिकांश योजनाओं में क्लोरीनेटर नहीं लगाए जाने के कारण कीटाणुशोधन के मानकों का उचित पालन सुनिश्चित नहीं हो सका। जांच व्यवस्था कमजोर, कई घरों तक पहुंचा दूषित पानी रिपोर्ट में कहा गया है कि बुनियादी ढांचे और कर्मचारियों की कमी, टेस्टिंग किट का इस्तेमाल नहीं होने तथा मोबाइल प्रयोगशालाओं का संचालन नहीं होने के कारण जल गुणवत्ता की जांच अपर्याप्त रही। केवल कुछ प्रयोगशालाओं को ही एनएबीएल से मान्यता मिली थी। सीएजी के अनुसार, इन कमियों के कारण कई घरों में दूषित पानी की सप्लाई हुई और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने का योजना का मुख्य उद्देश्य पूरा नहीं हो सका। निगरानी के डिजिटल प्लेटफॉर्म भी भरोसेमंद नहीं योजना की निगरानी के लिए बनाई गई राज्य और जिला परियोजना प्रबंधन इकाइयों तथा गुणवत्ता निगरानी व्यवस्था में कर्मचारियों की कमी रही। सीएजी ने पाया कि ‘निश्चय सॉफ्ट’ और ‘नगर सेवा’ जैसे मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म या तो विश्वसनीय नहीं थे या काम नहीं कर रहे थे। रियल टाइम मॉनिटरिंग के लिए लगाए जाने वाले आईओटी उपकरणों की खरीद और देखरेख में भी एकरूपता नहीं थी। उपकरण लगने के बाद उनकी पर्याप्त निगरानी और फॉलो-अप नहीं किया गया। लोगों को शिकायत करने का तरीका तक नहीं पता सीएजी ने शिकायत निवारण व्यवस्था को भी कमजोर बताया। अधिकांश लाभार्थियों को यह जानकारी नहीं थी कि योजना से जुड़ी शिकायत कहां और कैसे दर्ज करानी है। शिकायतों के निपटारे का उचित रिकॉर्ड भी नहीं रखा गया, जिससे योजना की निगरानी और लोगों तक सेवा पहुंचाने में बाधा आई। कुल मिलाकर सीएजी रिपोर्ट यह सवाल खड़ा करती है कि हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाने और लगभग पूर्ण कवरेज के दावों के बावजूद सुरक्षित पानी की सबसे अधिक जरूरत वाले लाखों परिवार योजना से बाहर कैसे रह गए और जहां व्यवस्था बनाई भी गई, वहां उसकी गुणवत्ता तथा निगरानी सुनिश्चित क्यों नहीं की जा सकी।



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