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नई दिल्ली। क्या इस वर्ष 20 जुलाई के 'चलो संसद' प्रदर्शन के दौरान भीड़ को तितर-बितर करने के नाम पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया? क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन, आंसू गैस, लाठियों और यहां तक कि इलेक्ट्रिक शॉक डिवाइस का इस्तेमाल हुआ? और क्या बिहार के सीवान में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर एके-टाइप असॉल्ट राइफल से फायरिंग की? इन सवालों को लेकर एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सोमवार को एक नई डिजिटल जांच रिपोर्ट जारी की है, जिसमें दावा किया गया है कि दिल्ली और बिहार में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई हुई, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों और घरेलू पुलिसिंग दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं थी। संगठन का यह भी कहना है कि घटना के एक महीने बाद भी किसी अधिकारी के खिलाफ जवाबदेही तय नहीं की गई। https://www.amnesty.org/en/latest/news/2026/08/india-new-investigation-documents-unlawful-and-deadly-force-against-cjp-led-protests-amid-ongoing-police-impunity/ 17 वीडियो खंगाले, कई सुरक्षा बलों की मौजूदगी का दावा एमनेस्टी की एविडेंस लैब के अनुसार, उसने 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर, संसद मार्ग और कनॉट प्लेस इलाके के 17 वीडियो और 24 जुलाई को बिहार के सीवान के दो वीडियो की जांच की। संगठन का दावा है कि इन वीडियो में दिल्ली पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) और सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) के जवान दिखाई देते हैं। जांच के आधार पर एमनेस्टी का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों को पहले इंटरनेट बंदी, बैरिकेडिंग और परिवहन बाधाओं से रोका गया और बाद में बल प्रयोग किया गया। सबसे बड़ा दावा: भीड़ की ओर दागी गई पैलेट गन रिपोर्ट का सबसे गंभीर आरोप पैलेट फायरिंग को लेकर है। एमनेस्टी का दावा है कि उसके सत्यापित दो वीडियो में आरएएफ का एक अधिकारी कनॉट प्लेस-संसद मार्ग चौराहे पर भीड़ की ओर शॉटगन चलाता दिखाई देता है। दो अन्य वीडियो में उसी इलाके के दो प्रदर्शनकारियों के शरीर पर ऐसे घाव दिखाई देने का दावा किया गया है, जो बर्डशॉट (धातु के छोटे छर्रों) से मेल खाते हैं। संगठन का कहना है कि ऐसे गोला-बारूद का कानून-व्यवस्था बनाए रखने में कोई वैध उपयोग नहीं होना चाहिए। घायल प्रदर्शनकारी का दावा- 'बिना चेतावनी चलने लगी पैलेट गन' एमनेस्टी ने एक घायल प्रदर्शनकारी का बयान भी जारी किया है। उसके अनुसार, कनॉट प्लेस के पास अधिकांश प्रदर्शन शांतिपूर्ण था लेकिन अचानक बिना किसी चेतावनी के पैलेट फायरिंग शुरू हो गई। प्रदर्शनकारी ने दावा किया कि उसकी पीठ पर 25 से 30 छर्रे लगे और अस्पताल में डॉक्टरों ने पैलेट इंजरी की पुष्टि की। आंसू गैस और लाठीचार्ज पर भी सवाल रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आंसू गैस के गोले प्रदर्शनकारियों के ऊपर कोण बनाकर छोड़ने के बजाय सीधे उनकी ओर दागे गए। एमनेस्टी का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों से ऐसा व्यापक हिंसक माहौल साबित नहीं होता, जो इस स्तर के बल प्रयोग को उचित ठहराए। संगठन ने आठ वीडियो का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों, जिनमें एक कम उम्र का लड़का भी शामिल था, पर लाठियां चलाई गईं। कुछ वीडियो में जमीन पर गिरे व्यक्ति को बार-बार पीटने का भी दावा किया गया है। इलेक्ट्रिक शॉक डिवाइस और एके-टाइप राइफल के इस्तेमाल का भी आरोप एमनेस्टी ने एक वीडियो में आरएएफ अधिकारी द्वारा इलेक्ट्रिक शॉक बैटन इस्तेमाल करने का दावा किया है। वहीं, बिहार के सीवान से जुड़े दो वीडियो के आधार पर संगठन का आरोप है कि एक पुलिस अधिकारी ने प्रदर्शनकारियों की ओर एके-टाइप असॉल्ट राइफल से फायरिंग की। एमनेस्टी का कहना है कि उसे ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि उस समय जान का तत्काल खतरा था और घातक हथियार का इस्तेमाल अंतिम विकल्प था। दिल्ली पुलिस का दावा इससे बिल्कुल अलग दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों से पहले ही सार्वजनिक रूप से इनकार किया है। पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स और सुप्रीम कोर्ट में कहा कि प्रदर्शन के दौरान उसकी कार्रवाई "प्रोफेशनल" थी और जरूरत के मुताबिक की गई। एमनेस्टी की मांग- निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदारी तय हो मानवाधिकार संगठन ने मांग की है कि पैलेट गन, आंसू गैस, लाठी, इलेक्ट्रिक शॉक डिवाइस और आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल की तत्काल, निष्पक्ष और प्रभावी जांच कराई जाए और रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। संगठन ने यह भी कहा कि बर्डशॉट गोला-बारूद और सीधे संपर्क वाले इलेक्ट्रिक शॉक उपकरणों का इस्तेमाल कानून-व्यवस्था बनाए रखने में तुरंत बंद किया जाए। एमनेस्टी के अनुसार, प्रदर्शन के एक महीने बाद तक किसी अधिकारी के खिलाफ सार्वजनिक रूप से कार्रवाई की घोषणा नहीं की गई थी। अब सबसे बड़ा सवाल—किसकी बात सही एक तरफ एमनेस्टी इंटरनेशनल अपनी जांच में वीडियो, तस्वीरों और प्रत्यक्षदर्शियों के आधार पर गंभीर आरोप लगा रहा है। दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस इन आरोपों को खारिज करते हुए अपनी कार्रवाई को उचित और प्रोफेशनल बता रही है। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होगी, क्या जिम्मेदारी तय होगी और क्या 'चलो संसद' प्रदर्शन के दौरान वास्तव में जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग हुआ था। फिलहाल एमनेस्टी की रिपोर्ट ने इस पूरे मामले को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।



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