Full Story
पटना। फरक्का जल संधि की अवधि दिसंबर 2026 में पूरी होने से पहले जनता दल (यूनाइटेड) ने इसके नवीनीकरण का विरोध करते हुए मांग की है कि भविष्य की किसी भी व्यवस्था पर बातचीत बिहार की वर्ष 2050 तक की जल जरूरतों को ध्यान में रखकर हो। जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने गुरुवार को संवाददाता सम्मेलन में कहा है कि संधि पर अंतिम निर्णय होने तक पार्टी का ‘फरक्का जल संधि पर नीतीश संवाद’ जागरूकता अभियान जारी रहेगा। उन्होंने फरक्का बराज और जल बंटवारे की संधि से बिहार को नुकसान होने का दावा किया और कहा कि राज्य को बरसात में बाढ़ और गर्मियों में पानी की कमी की दोहरी चुनौती झेलनी पड़ रही है। जदयू का दावा- बरसात में बाढ़, गर्मियों में पानी की कमी श्री झा ने आरोप लगाया कि फरक्का बराज के कारण गंगा में गाद जमा होने से बिहार में बाढ़ का प्रकोप बढ़ा है। वहीं, जल संधि के तहत बांग्लादेश को पानी देने की व्यवस्था गर्मियों में राज्य की जरूरतों को प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि जिस समय बिहार को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उसी समय उपलब्धता का संकट सामने आता है। उन्होंने मांग की है कि भविष्य की जल व्यवस्था में राज्य की दीर्घकालिक जरूरतों को प्राथमिकता दी जाए। गंगा जल आपूर्ति योजना का दिया उदाहरण जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष ने बिहार सरकार की गंगा जल आपूर्ति योजना का उल्लेख किया और कहा कि योजना के तहत मॉनसून के चार महीनों में हाथीदह से गंगा का पानी उठाकर पाइपलाइन के जरिए राजगीर, गया, बोधगया और नवादा की पेयजल जरूरतें पूरी करने की व्यवस्था की गई है। उनका दावा है कि साल के शेष आठ महीनों में गंगा से पानी नहीं उठाया जा सकता, क्योंकि संधि के तहत बांग्लादेश को बड़ी मात्रा में पानी देना होता है। जदयू ने इसी आधार पर संधि की अगली व्यवस्था तय करते समय बिहार के हितों को शामिल करने की मांग उठाई है। क्या है फरक्का जल संधि फरक्का जल संधि भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा के पानी के बंटवारे का समझौता है। इस पर 12 दिसंबर 1996 को नई दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा और बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हस्ताक्षर किए थे। तीस वर्षों के लिए हुई इस संधि की अवधि दिसंबर 2026 में पूरी हो रही है। यह व्यवस्था फरक्का पर उपलब्ध गंगा के प्रवाह के आधार पर दोनों देशों का हिस्सा तय करती है। तय बंटवारे के अनुसार, पानी की उपलब्धता 70 हजार क्यूसेक या उससे कम होने पर दोनों देशों को आधा-आधा हिस्सा मिलता है। उपलब्धता 70 हजार से 75 हजार क्यूसेक के बीच होने पर बांग्लादेश का हिस्सा 35 हजार क्यूसेक और भारत का शेष प्रवाह होता है। 75 हजार क्यूसेक से अधिक उपलब्धता पर भारत का हिस्सा 40 हजार क्यूसेक और बांग्लादेश का शेष प्रवाह होता है। राज्यसभा में मुद्दा उठाने का दावा, अभियान जारी रहेगा श्री झा ने कहा कि उसने राज्यसभा में भी यह मामला उठाया है और विदेश मंत्री की ओर से सकारात्मक जवाब मिला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी अंतिम निर्णय तक अपनी जागरूकता मुहिम जारी रखेगी।



Comments
0