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माटी का श्रृंगार : श्रृंखला 13 नोएडा (यूपी)। गांव अभी पूरी तरह जागा नहीं है। मुर्गे की पहली बांग के साथ पूरब के क्षितिज पर हल्की लाली उभर रही है। खेतों पर ओस की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही हैं। धान की नन्हीं पौध हवा के साथ झूम रही है। कहीं मंदिर की घंटियां बज रही हैं, तो कहीं मस्जिद से अज़ान की मधुर आवाज़ वातावरण में घुल रही है। पेड़ों पर बैठी चिड़ियां नए दिन का स्वागत कर रही हैं। प्रकृति अपनी सबसे सुंदर प्रार्थना में मग्न है। इसी संगीत के बीच गांव के किनारे बसे एक छोटे-से घर में भी सुबह जागती है। यह किसी महल की सुबह नहीं, एक कुम्हार की सुबह है। घर बड़ा नहीं है। मिट्टी और ईंट की दीवारें हैं। कहीं पुरानी खपरैल है, कहीं टीन की छत। सामने खुला आंगन है। एक ओर मिट्टी का ढेर, दूसरी ओर कतारों में रखे घड़े, मटके, सुराहियां, दीये, कुल्हड़ और बच्चों के खिलौने। देखने वाले को यह साधारण घर लगेगा, लेकिन वास्तव में यही वह कार्यशाला है जहां धरती प्रतिदिन नया जन्म लेती है। मिट्टी का मिज़ाज घर का सबसे बुज़ुर्ग सबसे पहले उठता है। वह सीधे चाक के पास नहीं जाता। पहले मिट्टी के ढेर के सामने बैठता है। हथेली से उसे सहलाता है। हल्का पानी छिड़कता है। उसकी नमी परखता है। फिर मुस्कुराकर कहता है, "आज यह अच्छी है... आज अच्छे घड़े बनेंगे।" उसके लिए मिट्टी कोई निर्जीव पदार्थ नहीं। उसका भी स्वभाव है, उसका भी मिज़ाज है। कभी वह अधिक पानी मांगती है, कभी कम। कभी तुरंत हाथों में ढल जाती है, कभी देर तक अपनी जिद पर अड़ी रहती है। मिट्टी की पहली पूजा चाक चलाने से पहले वह मिट्टी को प्रणाम करता है। कोई शास्त्र ऐसा करने को नहीं कहता। कोई नियम भी नहीं है। लेकिन पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा उसके भीतर स्वयं बस गई है। वह जानता है कि उसी ने उसके बच्चों को पाला, उसी ने घर बनाया, उसी ने त्योहारों में दीप जलाए। उसके लिए मिट्टी बाज़ार की वस्तु नहीं, परिवार का सदस्य है। जिसकी बदौलत ही मिली है उसके जीवन की हर छोटी-बड़ी खुशी। जब चाक बोलने लगता है कुछ देर बाद चाक घूमना शुरू करता है। पहले धीरे। फिर तेज। फिर इतनी सहज लय में कि उसकी घरघराहट किसी लोकगीत जैसी लगने लगती है। कुम्हार की दोनों हथेलियाँ मिट्टी को थाम लेती हैं। न कोई नाप। न कोई पैमाना। न कोई मशीन। सिर्फ़ वर्षों का अभ्यास और स्पर्श का विज्ञान। क्षणभर में मिट्टी ऊपर उठती है। फिर भीतर से खोखली होती है। फिर फैलती है। फिर संवरती है। और कुछ ही पलों में एक सुंदर घड़ा जन्म ले लेता है। उसे देखकर लगता है जैसे मिट्टी नहीं, कोई प्रार्थना आकार ले रही हो। एक घड़ा पूरे परिवार का होता है बहुत लोग समझते हैं कि बर्तन केवल कुम्हार बनाता है। लेकिन सच यह है कि एक बर्तन में पूरे परिवार की मेहनत गुंथी होती है। घर की महिलाएं मिट्टी छानती हैं। बच्चे सूखते बर्तनों को सावधानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं। युवक भट्ठा तैयार करते हैं। कोई रंग बनाता है। कोई खिलौनों की आंखें बनाता है। कोई दीयों की किनारियां संवारता है। एक घड़े में जितनी मिट्टी होती है, उतना ही परिवार का समय, श्रम और प्रेम भी होता है। दोपहर की तपिश और अधूरी उम्मीदें सूरज अब सिर पर है। आंगन में कतारबद्ध रखे सैकड़ों बर्तन धूप में सूख रहे हैं। लेकिन कुम्हार की नज़र बार-बार आकाश की ओर उठ जाती है। अचानक बारिश आ गई तो? तेज़ हवा चल गई तो? कोई पशु आंगन में घुस आया तो? एक क्षण की असावधानी कई दिनों की मेहनत मिट्टी में मिला सकती है। उसका सबसे बड़ा भय यही है कि जो अभी बना है, वह टूट न जाए। कितना विचित्र है, जो जिस आदमी के हाथ दूसरों का घर सजाते हैं, उसका अपना जीवन हर दिन अनिश्चितताओं के बीच झूलता रहता है। भट्ठा : अग्नि की अंतिम परीक्षा सांझ उतरती है। सूखे हुए बर्तनों को बड़े जतन से भट्ठे में सजाया जाता है। एक-एक घड़ा, एक-एक सुराही, एक-एक दीपक इस तरह रखा जाता है कि किसी पर अनावश्यक दबाव न पड़े। फिर आग जलाई जाती है।धीरे-धीरे। संयम के साथ। क्योंकि तेज़ आग भी नुकसान करती है और कम आग भी। कुम्हार जानता है कि जीवन की तरह भट्ठे में भी संतुलन सबसे बड़ा विज्ञान है। रात भर आग जलती रहती है। भट्ठे के भीतर मिट्टी तपती रहती है। बाहर बैठा कुम्हार बार-बार उठकर आग देखता है। उसकी आँखों में नींद कम और चिंता अधिक होती है। सुबह जब भट्ठा खुलता है, तब उसका चेहरा किसी किसान जैसा होता है जो पहली बार अपनी पकी हुई फसल देखने खेत पहुंचा हो। यदि सब ठीक रहा तो उसके चेहरे पर संतोष की मुस्कान फैल जाती है। यदि कुछ घड़े फूट गए हों, तो वह चुपचाप टूटे टुकड़ों को अलग रख देता है। शिकायत नहीं करता। मिट्टी से नाराज़ नहीं होता। उसे मालूम है कि सृजन के साथ टूटन भी जुड़ी होती है। बाजार तक की यात्रा अब बर्तनों को बैलगाड़ी, साइकिल, ठेले या छोटी गाड़ी में भरकर हाट ले जाया जाता है। यहीं सबसे कठिन परीक्षा शुरू होती है। जो घड़ा बनाने में तीन दिन लगे, जिसे कई बार सहलाया गया, जो धूप, आग और धैर्य की लम्बी परीक्षा से गुज़र कर हाट तक पहुंच पाया... उसका मूल्य अक्सर कुछ सिक्कों में तय कर दिया जाता है। खरीददार पूछता है, "इतना महँगा क्यों?" लेकिन कोई यह नहीं पूछता, "इसे बनाने में तुम्हारी कितनी सुबहें लगीं?" "कितनी रातें भट्ठे के पास जागकर काटीं?" "कितनी बार तुम्हारे हाथ जले?" यहीं सबसे अधिक टूटता है कुम्हार, घड़ा नहीं...। और साथ-साथ उसके श्रम का सम्मान। उम्मीद का चाक शाम ढल जाती है। कुछ बर्तन बिक जाते हैं। कुछ वापस लौट आते हैं। दिन का हिसाब बहुत बड़ा नहीं होता। लेकिन घर लौटते समय कुम्हार के चेहरे पर निराशा नहीं होती। वह जानता है कि कल फिर सुबह होगी। फिर मिट्टी गूंथी जाएगी। फिर चाक घूमेगा। फिर कोई दीपक जन्म लेगा। शायद इसी विश्वास का नाम जीवन है। और शायद इसी विश्वास ने हजारों वर्षों से इस कला को जीवित रखा है। (क्रमशः)