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(संजय कौशिक की विशेष रिपोर्ट) काठमांडू/मोतिहारी। नेपाल के बाढ़ और भूस्खलन से तबाह इलाकों में जहां सड़कें टूट चुकी हैं, पुल बह गए हैं और इंसानी कदमों के लिए रास्ते मौत का दूसरा नाम बन चुके हैं, वहां अब आसमान से राहत उतर रही है लेकिन सोमवार को धाडिंग के बेनीघाट के आसमान में जो दृश्य दिखाई दिया, वह आपदा की भयावहता और तकनीक की असाधारण क्षमता, दोनों को एक साथ सामने लाता है। एक मानवरहित विमान आसमान में मंडरा रहा था। इस बार उसके साथ भोजन, दवा या ऑक्सीजन नहीं थी। वह मानव शव लेकर उड़ रहा था। इंसानी कोशिश हुई नाकाम तो मशीनी तकनीक आयी काम सुरक्षा बलों की निगरानी में भारी क्षमता वाले ड्रोन ने बेनीघाट-3 के दुर्गम और जोखिम भरे इलाके से सात शवों को निकालकर बेनीघाट-5 तक पहुंचाया। जिस स्थान तक बचावकर्मियों का पहुंचना बेहद कठिन था, वहां मशीन ने वह काम किया, जिसके लिए कभी इंसानों को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती थी। यह दृश्य केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं था। यह उस आपदा की तस्वीर भी थी, जिसमें कई जगहों पर प्रकृति ने इंसान और उसके रास्तों के बीच दीवार खड़ी कर दी है। भूकंप से शुरू हुई उड़ान, अब जिंदगी और मौत दोनों का सहारा करीब एक दशक पहले नेपाल में ड्रोन मुख्यतः बाहरी दुनिया से आई खोज एवं बचाव तकनीक के रूप में दिखाई दिए थे। वर्ष 2015 के विनाशकारी 7.8 तीव्रता के भूकंप के बाद अंतरराष्ट्रीय बचाव दलों ने मलबे में जिंदगी तलाशने, क्षति का आकलन करने और राहत कार्यों में सहायता के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया था। तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही तकनीक एक दिन नेपाल की अपनी आपदा प्रतिक्रिया क्षमता का हिस्सा बन जाएगी और भोजन पहुंचाने से लेकर लापता लोगों की तलाश तथा दुर्गम इलाकों से शव निकालने तक का काम करेगी। नेपाली युवाओं की तकनीकी दक्षता और स्थानीय नवाचार ने इस बदलाव को गति दी। आज ड्रोन केवल कैमरे और नक्शे बनाने वाली मशीन नहीं हैं। वे उन जगहों तक पहुंच रहे हैं, जहां सड़कें नहीं पहुंचतीं और जहां इंसानी कदम उठाना भी जोखिम भरा है। एवरेस्ट की बर्फीली मौत के बीच भी ड्रोन की दस्तक इस तकनीक की उपयोगिता हिमालय की ऊंचाइयों पर भी दिखाई दी है। एवरेस्ट बेस कैंप और खुंबू आइसफॉल के बीच भारी सामान पहुंचाने में ड्रोन ने सात घंटे तक चलने वाली मानवीय यात्रा को महज छह से सात मिनट तक सीमित कर दिया। ऑक्सीजन टैंक, दवाएं, रस्सियां और सीढ़ियां जैसे जरूरी सामान अब उन खतरनाक रास्तों पर ड्रोन से पहुंचाए जा सकते हैं, जहां हर कदम के नीचे गहरी दरार और हर मोड़ पर बर्फ का खिसकता पहाड़ मौत का खतरा लिए खड़ा रहता है। खुंबू आइसफॉल की दरारों और बर्फीली दीवारों की 3डी मैपिंग भी ड्रोन से की जा रही है। इससे पर्वतारोहियों और शेरपा गाइडों को उन खतरों का पहले पता चल जाता है, जो बर्फ के भीतर छिपे रहते हैं। जब मशीन ने पूछा, पानी है या नहीं बाढ़ से तबाह नुवाकोट के देवीघाट-3 में ड्रोन ने राहत का एक और नया अध्याय लिखा। रविवार को ग्रामीणों ने ऊपर से आती आवाज सुनी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लैस ड्रोन उनके ऊपर मंडरा रहा था। उसके लाउडस्पीकर से सवाल गूंजा, क्या आपके पास पानी है? हाथ उठाइए। क्या खाना है? हाथ उठाइए। क्या दवा चाहिए? हाथ उठाइए। ग्रामीणों के हाथ उनकी जरूरतों का संदेश बन गए। एयरलिफ्ट टेक्नोलॉजी के निदेशक और ड्रोन पायलट मिलन पांडे के अनुसार, ग्रामीणों की प्रतिक्रिया के आधार पर उनकी जरूरतों का आकलन कर ड्रोन के जरिए आवश्यक सामग्री पहुंचाई जा रही है। ग्रामीण अपना संपर्क नंबर या पता किसी तख्ती पर, यहां तक कि मिट्टी पर लिखकर भी ऊपर उड़ रहे ड्रोन तक पहुंचा सकते हैं। तीन दिनों में टीम ने प्रभावित क्षेत्रों में भोजन समेत कम से कम 1.5 टन आपातकालीन सामग्री पहुंचाई। सोमवार को देवीघाट में चार मंजिला स्कूल की छत पर भी खाद्य सामग्री पहुंचाई गई। सड़कें डूबीं तो आसमान बना रास्ता बाढ़ ने कई इलाकों में सड़कें और पुल बहा दिए हैं। नदियों के दोनों किनारों पर बसे समुदाय एक-दूसरे से कट गए हैं। ऐसे में ड्रोन उस अदृश्य पुल की तरह सामने आए हैं, जो जमीन पर नहीं, आसमान में बन रहा है। हालांकि इसकी अपनी सीमाएं हैं, भार उठाने की क्षमता, उड़ान की दूरी और मौसम। लेकिन जहां हेलीकॉप्टर महंगे और पारंपरिक परिवहन असंभव हो जाए, वहां छोटा-सा ड्रोन असाधारण महत्व हासिल कर लेता है। हेलीकॉप्टर के मुकाबले कम लागत में सामान पहुंचाने वाली यह तकनीक अब नेपाल की आपदा राहत व्यवस्था में एक नए विकल्प के रूप में उभर रही है। बेनीघाट में उसने अपनी सबसे असामान्य भूमिका निभाई, उसने जिंदगी बचाने के लिए नहीं, जिंदगी खो चुके लोगों को उनके अंतिम सफर की ओर ले जाने के लिए उड़ान भरी। 100 ड्रोन और चार किलोमीटर का सफर हमी नेपाल के नेतृत्व वाली आठ सदस्यीय ड्रोन टीम में गरुड़एक्स, नेपाल पुलिस, नेपाली सेना और सशस्त्र पुलिस बल के कर्मी शामिल हैं। टीम डीजेआई फ्लाईकार्ट 100 जैसे भारी-भरकम औद्योगिक कार्गो ड्रोन का इस्तेमाल कर रही है, जो करीब 85 किलोग्राम तक भार उठा सकता है और लगभग चार किलोमीटर तक संचालन कर सकता है। बेनिघाट के आसमान में उस दिन उड़ता ड्रोन महज एक मशीन नहीं था, वह उस त्रासदी का मौन साक्षी था, जिसने धरती के रास्ते छीन लिए थे। उसके नीचे लटके सात शव सिर्फ सात जिंदगियों के अंत की कहानी नहीं, बल्कि उन टूटे घरों, बिछड़े परिवारों और उजड़े सपनों का भार थे, जिन्हें बाढ़ अपने साथ बहा ले गई। जब इंसानी कदम वहां तक पहुंचने से डर रहे थे, तब आसमान ने रास्ता बनाया और एक निर्जीव मशीन ने उन मृत देहों को अपने कंधों पर उठाकर अंतिम यात्रा की ओर पहुंचाया। यह दृश्य बताता है कि आपदा जब धरती को बेबस कर देती है, तो इंसान उम्मीद का रास्ता आसमान में भी तलाश लेता है।



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