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मोतिहारी। शाम ढल रही थी। गांधी मैदान रोशनी से जगमगा रहा था। मंच से लोकगीतों की धुन उठ रही थी और सामने बैठे लोगों की भीड़ कभी अपनी मिट्टी के सुरों में खो जाती तो कभी बॉलीवुड के गीतों की आवाज पर झूम उठती। यह दृश्य बिहार में पूर्वी चंपारण के जिला मुख्यालय मोतिहारी का है। वही शहर जहां एक सदी से अधिक पहले महात्मा गांधी ने किसानों के पक्ष में सत्याग्रह का पहला बड़ा प्रयोग किया था लेकिन इस बार चंपारण की कहानी सिर्फ अतीत की स्मृतियों में नहीं थी। मंच के पीछे विकास की एक नई पटकथा भी लिखी जा रही थी। सांसद एवं पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह के प्रयासों की बदौलत आयोजित तीन दिवसीय 'कृषि, पशुपालन एवं मात्स्यिकी उद्यमी उन्नति मेला' और ‘बापूधाम मोतिहारी महोत्सव’ में लोक संस्कृति, आधुनिक मनोरंजन और विकास योजनाएं एक ही मंच पर दिखाई दीं। केंद्र और बिहार सरकार के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी में 284.99 करोड़ रुपये की 145 विकास परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया गया। यह आंकड़ा अपने आप में बड़ा था, लेकिन महोत्सव की कहानी सिर्फ करोड़ों रुपये और परियोजनाओं की सूची नहीं थी। इसके केंद्र में वह चंपारण था, जो अपने खेतों, छोटे कारोबारों, सैनिक परिवारों, कलाकारों और युवाओं के साथ बदलते भारत में अपनी नई जगह तलाश रहा है। तीन दिनों तक गांधी मैदान और बापू सभागार में यही तलाश दिखाई देती रही। एक ओर कृषि, पशुपालन और मत्स्य उद्यमियों के स्टॉल थे। दूसरी ओर लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां। कहीं मधुमक्खी पालक अपने शहद की संभावनाएं बता रहे थे तो कहीं जीविका से जुड़ी महिलाएं पापड़, तिलौड़ी, अचार और मसालों के जरिए घरेलू काम को कारोबार में बदलने की कहानी सुना रही थीं। फिर शाम होते ही मंच का रंग बदल जाता। मैथिली ठाकुर की आवाज में बिहार की लोक आत्मा सुनाई देती और सलमान अली की प्रस्तुति के साथ वही मैदान आधुनिक भारतीय संगीत की धुनों में डूब जाता। करीना पांडेय और कवयित्री तिष्याश्री की प्रस्तुतियों ने इस सांस्कृतिक यात्रा को आगे बढ़ाया। लोक और बॉलीवुड का यह मेल महज मनोरंजन नहीं था। यह उस चंपारण की तस्वीर थी, जहां परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोध में नहीं, बल्कि साथ-साथ आगे बढ़ते दिखाई दे रहे थे। जहां खेत भविष्य की फैक्ट्री से जुड़ने लगे महोत्सव में कृषि, पशुपालन एवं मात्स्यिकी उद्यमी उन्नति मेला इस बदलाव की जमीन बना। पूर्वी चंपारण की अर्थव्यवस्था लंबे समय से कृषि पर निर्भर रही है। लेकिन यहां प्रस्तुत योजनाओं का जोर केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि उपज को प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बाजार से जोड़ने पर था। जिले में मदर डेयरी के दूसरे प्रसंस्करण संयंत्र की स्थापना की केवल गोशन ही नहीं हुई, इसके लिए भूमि चिह्निकरण पूरा किया गया। मधुमक्खी पालकों के लिए हनी प्रोसेसिंग सेंटर की घोषणा हुई, जहां शहद की वैज्ञानिक जांच, ग्रेडिंग और पैकेजिंग की सुविधा प्रस्तावित है। मत्स्य पालकों के लिए आधुनिक हैचरी, कोल्ड चेन और एकीकृत क्लस्टर की योजनाएं सामने आईं। चीनी मिल की बंदी से परेशान किसानों के लिए नई अत्यधुनिक चीनी मिल की स्थापना प्रक्रिया तेज करने की घोषणा ने पुराने औद्योगिक ढांचे में नई जान फूंकने की उम्मीद पैदा की। इन पहलों का उद्देश्य एक ही है, किसान केवल कच्चा माल बेचने वाला न रहे, बल्कि मूल्य संवर्धन की पूरी श्रृंखला का हिस्सा बने। 284.99 करोड़ की तस्वीर महोत्सव में घोषित कुल पैकेज में 196.10 करोड़ रुपये की 55 पूर्ण योजनाओं का लोकार्पण किया गया, जबकि 88.89 करोड़ रुपये की 90 नई योजनाओं की आधारशिला रखी गई। नगर निगम क्षेत्र में 42.60 करोड़ रुपये की 78 योजनाओं, मोतीझील के कायाकल्प और मरीन ड्राइव रिवरफ्रंट के विस्तार की शुरुआत हुई। मजुराहां के निकट हरदिया पुल का उद्घाटन और रघुनाथपुर में धनौती नदी पर नए पुल का शिलान्यास ग्रामीण कनेक्टिविटी के उन छोटे लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सों को जोड़ते हैं, जिन पर किसी जिले की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था टिकी होती है। रघुनाथपुर-बालगंगा पथ के चौड़ीकरण की शुरुआत भी इसी कड़ी का हिस्सा है। चंपारण की अगली पीढ़ी के लिए मोतिहारी में अत्याधुनिक तारामंडल की आधारशिला रखी गई। किसानों और ग्रामीण उद्यमियों के बीच आयोजित इस महोत्सव में तारामंडल की घोषणा एक अलग तरह का संकेत थी, चंपारण के भविष्य को सिर्फ खेतों में नहीं, विज्ञान और तकनीक में भी तलाशने का। बरियारपुर हवाई अड्डे के विस्तार और विकास की घोषणा ने इस तस्वीर को और बड़ा कर दिया। बेहतर हवाई संपर्क के लिए बरियारपुर हवाई अड्डा का विकास, मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल और केंद्रीय विद्यालय भवन की स्थापना की प्रक्रिया को भी गति देने की बात कही गई। किसी जिले के लिए ये केवल इमारतें नहीं हैं। ये उस सवाल का जवाब हैं कि उसके बच्चे पढ़ने, इलाज कराने या बेहतर अवसर तलाशने के लिए कितनी दूर जाएंगे। बापू की धरती पर सैनिक परिवार भी केंद्र में रहे महोत्सव में करीब छह हजार सैन्य परिवारों के लिए सैन्य कैंटीन, सैन्य संग्रहालय और प्रशासनिक सेवाओं के विस्तार जैसी योजनाओं की रूपरेखा सामने आई। पूर्व सैनिकों, अर्धसैनिक बलों के जवानों और वीर नारियों के सम्मान ने आयोजन को एक अलग मानवीय आयाम दिया। सीमा पर तैनात सैनिकों से लेकर खेत में काम कर रहे किसान और छोटे कारोबार को खड़ा कर रही महिला उद्यमी तक, महोत्सव ने उन लोगों को मंच पर जगह दी जिनकी मेहनत अक्सर विकास के बड़े आंकड़ों में दिखाई नहीं देती। कृषि मेला के 200 से अधिक स्टॉलों और सांस्कृतिक महोत्सव की गूंज के बीच हजरों की संख्या में लोग सम्मानित किए गए। इनमें किसान, पशुपालक, मत्स्य पालक, मधुमक्खी पालक, महिला उद्यमी, पूर्व सैनिक, पुलिसकर्मी, चिकित्सक, शिक्षक, पत्रकार और समाजसेवी शामिल रहे। मंच पर संस्कृति, जमीन पर विकास कला और संस्कृति को स्थायी आधार देने के लिए 20 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले अटल कला केंद्र भवन का शिलान्यास हुआ। कृषि विज्ञान केंद्र, पिपराकोठी के विस्तार के तहत बालिका छात्रावास, किसान प्रशिक्षण शाला और सीड प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना की पहल हुई। इन घोषणाओं के बीच तीन दिनों का सांस्कृतिक उत्सव लगातार चलता रहा। पहले दिन मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, केंद्रीय खान एवं कोयला राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे और सांसद राधा मोहन सिंह ने दीप प्रज्वलित कर महोत्सव का उद्घाटन किया। दूसरे दिन राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद आता हसनैन की मौजूदगी ने आयोजन को नई गरिमा दी। सेना और अर्धसैनिक बलों के वरिष्ठ अधिकारियों तथा कृषि विशेषज्ञों ने भी इसमें हिस्सा लिया। समापन के दिन बिहार सरकार के ग्रामीण विकास और सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री श्रवण कुमार की मौजूदगी में रोजगार, कौशल और औद्योगिक विस्तार के संकल्प के साथ तीन दिनों का यह उत्सव समाप्त हुआ। लेकिन गांधी मैदान से उठी आवाजें शायद इतनी जल्दी खत्म नहीं होंगी। क्योंकि इस महोत्सव की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर किसी एक मंच, किसी एक कलाकार या किसी एक घोषणा में नहीं थी। वह तस्वीर उस किसान में थी जो अपने उत्पाद के साथ स्टॉल पर खड़ा था। उस महिला उद्यमी में थी जिसने घर के छोटे कारोबार को बाजार तक पहुंचाया। उस पूर्व सैनिक में थी जिसे सार्वजनिक रूप से सम्मान मिला। उस बच्चे में थी जिसने तारामंडल की घोषणा सुनी। और उस भीड़ में थी जो मैथिली ठाकुर की लोकधुनों पर झूमने के बाद बॉलीवुड के गीतों पर तालियां बजा रही थी। अतीत मंच पर, वर्तमान मैदान में और भविष्य की हुई घोषणाएं चंपारण की यह कहानी इसलिए अलग थी क्योंकि यहां अतीत मंच पर था, वर्तमान मैदान में और भविष्य घोषणाओं के बीच दिखाई दे रहा था। महात्मा गांधी ने जिस भूमि पर कभी किसानों की आवाज को आंदोलन का रूप दिया था, उसी भूमि पर तीन दिन तक विकास और आत्मनिर्भरता की आवाज सुनाई दी। अब असली परीक्षा घोषणाओं की नहीं, उनके जमीन पर उतरने की होगी। यदि प्रस्तावित परियोजनाएं समयबद्ध ढंग से पूरी होती हैं, तो सड़क, हवाई संपर्क, स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि आधारित उद्योगों का विस्तार पूर्वी चंपारण की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।और तब शायद पूर्वी चंपारण जिला की पहचान केवल गांधी के सत्याग्रह की भूमि के रूप में नहीं रहेगी। वह उस चंपारण की पहचान भी बनेगा जिसने अपनी मिट्टी से जुड़े रहते हुए भविष्य की ओर कदम बढ़ाना सीख लिया।



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