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(संजय कौशिक की विशेष रिपोर्ट) काठमांडू/मोतिहारी। नेपाल के पहाड़ों से भोटेकोशी की बाढ़ का पानी भले ही धीरे-धीरे उतर रहा हो लेकिन उसके पीछे छूटी तबाही अभी शांत नहीं हुई है। पहाड़ों की खामोशी में अब भी किसी मां की पुकार है, किसी पिता की तलाश है और किसी परिवार की वह उम्मीद है, जो मलबे और मटमैली धाराओं के बीच से अपने किसी अपने के लौट आने का इंतजार कर रही है। मरने वालों की संख्या 1342 पहुंची, 4886 लापता 05 सितंबर की सुबह तक नेपाल में इस विनाशकारी बाढ़ से मरने वालों की संख्या 1,342 पहुंच गई। करीब 4,886 लोग अब भी लापता हैं। लेकिन ये आंकड़े अंतिम नहीं हैं। खोज और बचाव अभियान जारी है, अज्ञात शवों की पहचान की जा रही है और हर गुजरते घंटे के साथ आपदा की तस्वीर बदल रही है। कुछ लोग मिल रहे हैं, किसी को जीवन मिल रहा है, किसी को अपनों का शव। केवल 96 शवों की हो सकी है पहचान राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार आठ जिलों से शव और मानव अवशेषों सहित 1,342 शव बरामद किए गए हैं। चितवन में 360, नवलपरासी पूर्व में 222, नवलपरासी पश्चिम में 230, नुवाकोट में 192 और रसुवा में 160 शव मिले हैं। धाडिंग में 67, गोरखा में 73 और तनहुन में 38 लोगों की मौत दर्ज की गई है। इन 1,342 शवों में से शुक्रवार तक केवल 96 की पहचान हो सकी है। बाकी शव अभी भी किसी नाम, किसी चेहरे और किसी परिवार की प्रतीक्षा में हैं। रसुवा और नुवाकोट में तबाही सबसे गहरी है। दोनों जिलों में क्रमशः 2130 और 2340 लोगों के लापता होने की सूचना है। आधिकारिक आंकड़ों में 583 विदेशी नागरिक भी लापता हैं। प्रशासन खुद मानता है कि यह संख्या अंतिम नहीं है, क्योंकि बरामद अज्ञात शवों और लापता लोगों के आंकड़ों का मिलान अभी जारी है। 16 लाख लोग... और हर किसी की अपनी एक कहानी सरकार की पहली स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक भोटेकोशी की बाढ़ ने करीब 16 लाख लोगों को प्रभावित किया है। रसुवा और नुवाकोट सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में हैं, जबकि धाडिंग, गोरखा और चितवन भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। यह संख्या केवल आंकड़ा भर है, उस दर्द का हिसाब नहीं, जो इन लोगों ने देखा और भोगा। किसी ने अपनी आंखों के सामने घर को नदी में समाते देखा। किसी ने रात के अंधेरे में बच्चों को लेकर पहाड़ की तरफ भागकर जान बचाई। किसी ने सुबह उठकर पाया कि जिस रास्ते से रोज जिंदगी गुजरती थी, वहां अब सिर्फ गहरी खाई है। और कुछ परिवार ऐसे हैं, जिनके घर तो बचे हैं, लेकिन उनमें लौटने वाला कोई नहीं बचा। बाढ़ ने सिर्फ जमीन नहीं छीनी। उसने घर छीने, रोजी छीनी, रिश्ते छीने और भविष्य का भरोसा तक हिला दिया। मौत के बाद भी संकट खत्म नहीं हुआ आपदा के तुरंत बाद सबसे बड़ा सवाल था, कौन जिंदा है और कौन फंसा हुआ है? अब सवाल बदल रहा है, जो बच गए हैं, वे कैसे जिएंगे? फिलहाल राहत शिविरों और प्रभावित इलाकों में भोजन, पानी और चिकित्सा की व्यवस्था सबसे बड़ी प्राथमिकता है। लेकिन व्यापक राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण की लड़ाई अभी शुरू ही नहीं हुई है। प्रारम्भिक सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 7570 निजी घर नष्ट हो गए हैं। 48 सरकारी इमारतें, 18 स्कूल और सात स्वास्थ्य सुविधाएं क्षतिग्रस्त या नष्ट हुई हैं। करीब 55 किलोमीटर सड़कें पूरी तरह तबाह हैं। 33 मोटर योग्य पुल और 68 सस्पेंशन पुल भी बह गए हैं। पहाड़ों में पुल सिर्फ लोहे और कंक्रीट की संरचनाएं नहीं होते। वे गांवों को अस्पतालों से, बच्चों को स्कूलों से, किसानों को बाजारों से और परिवारों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं। जब वे बह जाते हैं तो सिर्फ रास्ते नहीं टूटते, जिंदगी की कड़ियां टूट जाती हैं। इस आपदा का एक और चेहरा... महिलाएं संयुक्त राष्ट्र की महिला संस्था के अनुमान के मुताबिक नेपाल में 43,000 महिलाओं और लड़कियों को तत्काल बाढ़ संबंधी सहायता की जरूरत है। केवल रसुवा और नुवाकोट में करीब 1,57,050 महिलाएं और लड़कियां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुई हैं। उनकी चिंताएं सिर्फ भोजन और पानी तक सीमित नहीं हैं। सुरक्षित पानी, स्वास्थ्य और सुरक्षा भी बड़ी चुनौतियां हैं। नेपाल में महिलाएं देश के दैनिक अवैतनिक देखभाल कार्य का अनुमानित 85 प्रतिशत हिस्सा निभाती हैं। ऐसे में जब घर उजड़ते हैं, पानी के स्रोत नष्ट होते हैं और परिवार विस्थापित होते हैं, तो आपदा का एक बड़ा और अक्सर अदृश्य बोझ महिलाओं के कंधों पर आ गिरता है। मानवाधिकार आयोग ने भी चेताया राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 02 सितंबर को सरकार का ध्यान राहत वितरण में संघीय, प्रांतीय और स्थानीय स्तरों के बीच प्रभावी समन्वय की कमी की ओर दिलाया। आयोग की निगरानी में यह सामने आया कि आपदा के तुरंत बाद खोज और बचाव के लिए सरकारी तंत्र सक्रिय हुआ, लेकिन सुरंगों में बचाव कार्यों में देरी, लापता विदेशी पर्यटकों, क्षति के सटीक आंकड़ों की कमी और कुशल तकनीशियनों एवं आधुनिक तकनीक की कमी जैसी गंभीर समस्याएं भी सामने आईं। ये कमियां उस त्रासदी को और गहरा करती हैं, जिसमें हर सुरंग, हर मलबा और हर नदी का किनारा किसी जिंदगी की आखिरी उम्मीद हो सकता है। मलबे के बीच जिंदगी की जीत फिर भी नेपाल की इस भयावह कहानी में उम्मीद की कुछ सांसें बाकी हैं। शुक्रवार को त्रिशुली-3ए जलविद्युत परियोजना की सुरंग में कई दिनों से फंसे दो श्रमिकों को जीवित बाहर निकाल लिया गया। यह सिर्फ दो जिंदगियों का बचना नहीं था। यह उन हजारों परिवारों के लिए एक संकेत था कि मलबे और अंधेरे के नीचे जिंदगी अब भी सांस ले सकती है। अब तक 13,013 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा चुका है। राहत, बचाव और पुनर्वास के लिए 21 हजार से अधिक सुरक्षा कर्मी तैनात किए गए हैं। दूरसंचार सेवाएं भी धीरे-धीरे लौट रही हैं। सड़क और हवाई मार्ग से राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है। प्रभावित स्थानीय सरकारों को आपातकालीन निधि जारी की गई है। उलझी जिंदगी, उजड़े घर किसी मोबाइल टावर का फिर से चालू होना उस परिवार की जिंदगी वापस नहीं ला सकता, जिसने अपना सदस्य खो दिया है। किसी सड़क के खुल जाने से वह घर वापस नहीं आता, जिसे नदी अपने साथ बहा ले गई। बाढ़ का पानी लौट सकता है। सड़कें फिर बन सकती हैं। पुल दोबारा खड़े किए जा सकते हैं। घर फिर बनाए जा सकते हैं। लेकिन जिन लोगों को भोटेकोशी अपने साथ ले गई, उनकी जगह कोई नहीं भर सकता। आज नेपाल में हजारों लोग राहत की कतार में खड़े हैं। हजारों किसी लापता चेहरे की तलाश में हैं। हजारों अपने उजड़े घरों की जगह खड़े होकर यह सोच रहे हैं कि जिंदगी को फिर से कहां से शुरू करें। अभी स्पष्ट नहीं हुआ है पुनर्वास का पैमाना कितने घर दोबारा बनाए जाएंगे, कितने परिवार विस्थापित होंगे, कितनी सड़कें और पुल फिर खड़े होंगे और कितने लोग अपनी पुरानी जिंदगी में लौट पाएंगे, इसका आकलन अभी शुरू ही हुआ है। भोटेकोशी की बाढ़ का अंतिम मानवीय, भौतिक और भौगोलिक नुकसान आने वाले दिनों में सामने आएगा। फिलहाल मलबे के बीच खोज जारी है और कई परिवार अब भी एक ऐसी खबर की प्रतीक्षा कर रहे हैं जो उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल सकती है। सैलाब में खोई जिंदगी जीने की वजह कुछ परिवारों को अपने लोग मिलेंगे। कुछ को उनके शव और कुछ शायद लंबे समय तक सिर्फ इंतजार करते रहेंगे। नेपाल के लिए बाढ़ की सबसे बड़ी त्रासदी शायद यही है कि पानी के उतरने के बाद भी हजारों परिवारों के लिए संकट खत्म नहीं होगा। तब शुरू होगी उन लोगों की लंबी लड़ाई, जिन्होंने जिंदगी तो बचा ली, लेकिन जिंदगी जीने की वजहों का एक बड़ा हिस्सा खो दिया। भोटेकोशी की धाराओं ने नेपाल के पहाड़ों को बड़ा घाव दिया है। अब जरूरत सिर्फ मलबा हटाने की नहीं, टूटे हुए जीवन को फिर से जोड़ने की है। पुनर्वास की यह लड़ाई महीनों नहीं, संभवतः वर्षों तक चलेगी। और जब दुनिया का ध्यान किसी दूसरी खबर की ओर मुड़ जाएगा, तब भी नेपाल के हजारों घरों में यह बाढ़ रोज याद की जाएगी... एक ऐसे दिन के रूप में, जब पानी आया था और अपने साथ बहुत कुछ हमेशा के लिए ले गया।