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पटना। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के तीन दशक पुराने अभेद्य सियासी गढ़ बांकीपुर पर जन सुराज के उम्मीदवार प्रशांत किशोर (पीके) की 19324 वोटों से दर्ज जीत को एक ओर 'भाजपा के नवीन युग' की प्रतिष्ठा की चुनावी परीक्षा में मिली चुनौती के रूप में देखा जा रहा है तो दूसरी ओर इसे बिहार की करवट लेती सियासत का अहम संकेत भी माना जा रहा है। जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने सोमवार को शानदार जीत दर्ज करते हुए भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार को 19324 वोटों से हरा दिया। इस जीत के साथ पीके ने न सिर्फ अपनी पहली चुनावी लड़ाई फतह की बल्कि बिहार की राजनीति में तीसरे राजनीतिक विकल्प के दावे को भी मजबूत कर दिया। भाजपा का 30 साल पुराना किला ढहा निर्वाचन आयोग की सोमवार को बांकीपुर उपचुनाव की 32 राउंड की मतगणना समाप्त होने के बाद जारी आंकड़ों के अनुसार, पीके को 64151 वोट मिले जबकि भाजपा के नीरज कुमार को 44827 मत हासिल हुए। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की रेखा कुमारी 14273 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं। यह वही बांकीपुर सीट है, जहां 1995 से लगातार भाजपा जीतती आ रही थी । श्री नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा से शुरू हुआ जीत का सिलसिला उनके बेटे नितिन नवीन तक लगातार कायम रहा लेकिन 2026 के उपचुनाव में यह रिकॉर्ड टूट गया। 2025 में भाजपा ने 52 हजार वोटों से जीती थी सीट महज एक साल पहले हुए 2025 विधानसभा चुनाव में भाजपा के नितिन नवीन ने 98,299 वोट (62.66%) हासिल कर राजद की रेखा कुमारी गुप्ता को करीब 52 हजार वोटों के बड़े अंतर से हराया था। उस चुनाव में राजद प्रत्याशी को 46,363 वोट (29.55%) मिले थे। लेकिन, उपचुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई और भाजपा अपनी सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली सीट भी नहीं बचा सकी। प्रशांत किशोर की पहली चुनावी लड़ाई बनी ऐतिहासिक यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं था। यह जन सुराज के लिए राजनीतिक स्वीकार्यता की पहली बड़ी परीक्षा थी।श्री किशोर पहली बार खुद चुनाव मैदान में उतरे और सीधे भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ में जीत दर्ज कर यह संदेश दिया कि उनकी पार्टी अब केवल आंदोलन या जनसंवाद तक सीमित नहीं बल्कि चुनावी राजनीति में भी चुनौती देने की क्षमता रखती है। बिहार की राजनीति का सबसे प्रतीकात्मक निर्वाचन क्षेत्र बांकीपुर का इतिहास हमेशा बिहार की राजनीति की दिशा तय करता रहा है। आजादी के बाद लंबे समय तक यहां कांग्रेस का दबदबा रहा। 1957 में रामसरन साहू और 1962 में पूर्व मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय इसी सीट से विधायक बने।फिर 1967 में जनक्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा ने कृष्ण बल्लभ सहाय को हराकर इतिहास रच दिया। उसी जीत के बाद बिहार में पहली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और महामाया प्रसाद सिन्हा राज्य के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। राजनीतिक विश्लेषक आज भी मानते हैं कि बिहार में सत्ता परिवर्तन की पहली बड़ी कहानी बांकीपुर से ही शुरू हुई थी। कई दलों का गढ़ रही, फिर भाजपा का अभेद्य किला बनी वर्ष 1969 में भाकपा के ए.के. सेन , 1972 में सुनील मुखर्जी , 1977 में जनता पार्टी के ठाकुर प्रसाद , 1980 में कांग्रेस के रंजीत सिन्हा तथा 1985 और 1990 में निर्दलीय रामानंद यादव यहां से विधायक चुने गए। इसके बाद 1995 में भाजपा के वरिष्ठ नेता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने जीत दर्ज की और पटना पश्चिम विधानसभा क्षेत्र को भाजपा का मजबूत गढ़ बना दिया। उन्होंने 1995, 2000, फरवरी 2005 और अक्टूबर 2005 के चुनाव लगातार जीते। परिसीमन के बाद भी कायम रही भाजपा की बादशाहत नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के निधन के बाद 2006 के उपचुनाव में उनके बेटे नितिन नवीन विधायक बने। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद पटना पश्चिम का नाम बदलकर बांकीपुर कर दिया गया। इसके बाद श्री नितिन नवीन ने 2010, 2015, 2020 और 2025 के विधानसभा चुनाव लगातार जीतकर भाजपा की पकड़ और मजबूत कर दी। उनके राज्यसभा जाने के बाद सीट खाली हुई, जिसके कारण यह उपचुनाव कराया गया। क्या बदल गया बांकीपुर का राजनीतिक समीकरण यह नतीजा केवल एक सीट की हार-जीत नहीं है। भाजपा के तीन दशक पुराने गढ़ का टूटना और श्री प्रशांत किशोर की पहली चुनावी जीत बिहार की राजनीति में नए समीकरणों का संकेत माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस जीत से जन सुराज को राज्यभर में नई राजनीतिक ऊर्जा मिलेगी जबकि भाजपा को अपने शहरी और पारंपरिक वोट बैंक की रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है। बांकीपुर से निकला नया राजनीतिक संदेश वर्ष 1967 में बांकीपुर ने बिहार में कांग्रेस का लंबा शासन खत्म करने की भूमिका निभाई थी। अब 2026 में इसी सीट ने एक बार फिर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार बदलाव की कहानी भाजपा के 30 साल पुराने गढ़ के टूटने और श्री प्रशांत किशोर के राजनीतिक उदय के रूप में दर्ज हुई है।



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