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नई दिल्ली। सेमीकंडक्टर की दुनिया में कंपनियों की चिंता अब केवल चिप की सप्लाई तक सीमित नहीं रह गई है। असली चुनौती चिप को हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के साथ सही तरीके से जोड़ने यानी ‘इंटीग्रेशन’ की बनती जा रही है। एचसीएल टेक की नई ग्लोबल रिसर्च में इंटीग्रेशन को मौजूदा सेमीकंडक्टर समाधानों की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने रखा गया है। मेडिकल डिवाइस और इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन में तो यह सबसे प्रमुख चिंता है जबकि अध्ययन में शामिल चारों सेक्टरों में यह शीर्ष दो चुनौतियों में रही। एचसीएल टेक ने शुक्रवार को ‘द सिलिकॉन शिफ्ट: व्हेन एवरी इंडस्ट्री बिकम्स ए चिप इंडस्ट्री’ नाम से यह ग्लोबल रिसर्च रिपोर्ट जारी की। सर्वे में अमेरिका, यूरोप और एशिया के 300 वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया। ये अधिकारी इंजीनियरिंग, आरएंडडी, सेमीकंडक्टर/हार्डवेयर, प्रोडक्ट, इनोवेशन और टेक्नोलॉजी स्ट्रैटेजी से जुड़े हैं। रिसर्च में ऑटोमोटिव, मेडिकल डिवाइस, नेटवर्क इक्विपमेंट और इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन सेक्टर को शामिल किया गया। एआई का जोर, चिप अब सिर्फ ‘पुर्जा’ नहीं बल्कि बिजनेस स्ट्रैटेजी का हिस्सा रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि सेमीकंडक्टर पर कारोबार की निर्भरता कितनी तेजी से बढ़ रही है। सर्वे में शामिल 98% कंपनियों ने कहा कि तीन साल पहले के मुकाबले उनकी सेमीकंडक्टर पर निर्भरता बढ़ी है। वहीं 99% कंपनियों को उम्मीद है कि अगले पांच वर्षों में यह निर्भरता और बढ़ेगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) भी इस बदलाव का बड़ा कारण बन रहा है। 71% उत्तरदाताओं के मुताबिक एआई की वजह से सेमीकंडक्टर आर्किटेक्चर का चुनाव अब रणनीतिक कारोबारी फैसले के रूप में ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन में बदलाव सबसे तेज है, जहां 75% उत्तरदाताओं ने कहा कि तीन साल पहले की तुलना में उनकी सेमीकंडक्टर पर निर्भरता काफी ज्यादा बढ़ चुकी है। सवाल अब ‘कौन-सी चिप खरीदें’ का नहीं, ‘उसे सिस्टम में कैसे उतारें’ का रिसर्च का अहम संकेत यह है कि बेहतर चिप मिल जाना ही कंपनियों के लिए पर्याप्त नहीं है। मौजूदा समाधानों के कमजोर पड़ने के कारणों में सबसे ज्यादा उत्तरदाताओं ने इंटीग्रेशन को प्रमुख चुनौती बताया। इसने सप्लाई चेन की बाधाओं और परफॉर्मेंस संबंधी सीमाओं को भी पीछे छोड़ दिया। इसी वजह से कंपनियों की इंजीनियरिंग सर्विस पार्टनर्स से अपेक्षाएं भी बदल रही हैं। 67% कंपनियां हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन , 61% सप्लाई चेन और लाइफसाइकिल सपोर्ट और 59% ज्यादा गहरी इंडस्ट्री विशेषज्ञता चाहती हैं। रिपोर्ट के निष्कर्ष के मुताबिक प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त अब केवल सिलिकॉन की परफॉर्मेंस से नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग पार्टनरशिप और इंटीग्रेशन की गुणवत्ता से भी तय हो रही है। पांच साल में बदल सकता है चिप खरीदने का मॉडल रिपोर्ट में भविष्य को लेकर एक और महत्वपूर्ण संकेत मिला है। अभी 79% कंपनियां पूरी तरह तैयार यानी ऑफ-द-शेल्फ सिलिकॉन या बहुत सीमित कस्टमाइजेशन वाले कमर्शियल सिलिकॉन पर निर्भर हैं। लेकिन इनमें से 66% अगले पांच वर्षों में अलग मॉडल अपनाने की उम्मीद कर रही हैं। खास बात यह है कि कंपनियां अकेले अपने दम पर कस्टम चिप बनाने के बजाय पार्टनरशिप की तरफ ज्यादा झुकती दिखाई देती हैं। 59% उत्तरदाताओं को उम्मीद है कि भविष्य में उनका तरीका एक्सटर्नल इंजीनियरिंग पार्टनर, हाइब्रिड मॉडल, को-डेवलपमेंट या इंजीनियरिंग सर्विसेज से जुड़ा होगा। इसके मुकाबले केवल 3% आंतरिक स्तर पर कस्टम सिलिकॉन में निवेश बढ़ाने की उम्मीद करते हैं, जबकि सिर्फ 4% ऑफ-द-शेल्फ कंपोनेंट्स पर निर्भरता बढ़ने की बात कहते हैं। एचसीएल टेक: सेमीकंडक्टर अब इंजीनियरिंग रोडमैप से आगे कॉरपोरेट रणनीति का हिस्सा एचसीएल टेक के कार्यकारी उपाध्यक्ष एवं वैश्विक प्रमुख (सेमीकंडक्टर बिजनेस) अमीर सैथू के मुताबिक सेमीकंडक्टर पर निर्भरता अब सिर्फ इंजीनियरिंग रोडमैप नहीं बल्कि कॉरपोरेट रणनीति को भी प्रभावित कर रही है। उनके अनुसार कंपनियों के सामने सवाल अब केवल यह नहीं है कि कौन-सी चिप खरीदी जाए बल्कि यह है कि लंबे प्रोडक्ट लाइफसाइकिल, कड़े रेगुलेटरी माहौल और जटिल इंटीग्रेशन के बीच सिलिकॉन को लेकर टिकाऊ क्षमता कैसे विकसित की जाए। एसईएमआई के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अजीत मनोचा ने रिपोर्ट के गेस्ट फोरवर्ड में कहा कि जो उद्योग कभी मुख्य रूप से सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते थे, वे अब अगली पीढ़ी के सिलिकॉन से क्या अपेक्षा होगी, इसे तय करने में भी भूमिका निभा रहे हैं।