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नई दिल्ली। बिहार के जमुई जिले के सोनो प्रखंड की पैरा मटिहाना पंचायत के भरतपुर गांव से आई एक छोटी-सी खबर अपने भीतर बड़े सामाजिक परिवर्तन का संकेत समेटे हुए है। गांव के रविदास समाज ने सामूहिक सहमति से मृत्यु भोज की परंपरा का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है। यह केवल एक स्थानीय घटना नहीं बल्कि उस सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति है, जो परंपराओं को अस्वीकार नहीं करती बल्कि उन्हें विवेक, मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय की कसौटी पर परखना चाहती है। ऐसे परिवर्तन कानून या सरकारी आदेश से नहीं बल्कि समाज के भीतर जागृत नैतिक चेतना से जन्म लेते हैं और इसलिए अधिक स्थायी सिद्ध होते हैं। जब परंपरा सहयोग से बोझ बन जाती है भारतीय समाज की शक्ति उसकी सांस्कृतिक निरंतरता में रही है। जन्म, विवाह और मृत्यु से जुड़े संस्कारों ने केवल धार्मिक आस्थाओं को ही नहीं बल्कि सामुदायिक जीवन, पारिवारिक उत्तरदायित्व और सामाजिक सहयोग की भावना को भी जीवित रखा है। किंतु इतिहास यह भी बताता है कि कोई भी परंपरा समय के साथ अपरिवर्तित नहीं रहती। बदलती आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में अनेक परंपराएं अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती हैं। सहयोग की जगह प्रदर्शन, संवेदना की जगह प्रतिष्ठा और सामूहिकता की जगह प्रतिस्पर्धा ले लेती है। तब वही परंपरा, जो कभी सामाजिक सहकार का माध्यम थी, बोझ और कुरीति का रूप धारण कर लेती है। मृत्यु भोज इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। शोक के समय आर्थिक संकट की मार किसी परिवार के लिए मृत्यु केवल एक सदस्य का निधन नहीं होती; वह आर्थिक सुरक्षा, भावनात्मक संतुलन और सामाजिक स्थिरता के टूटने का क्षण भी होती है। विशेषकर ग्रामीण भारत में, जहां अधिकांश परिवार सीमित आय पर निर्भर हैं, किसी कमाने वाले सदस्य की मृत्यु पूरे परिवार को संकट में डाल देती है। ऐसे समय समाज का दायित्व शोकाकुल परिवार को सहारा देना, उसका मनोबल बढ़ाना और आर्थिक रूप से सहयोग करना होना चाहिए। लेकिन व्यवहार में अनेक स्थानों पर इसके विपरीत स्थिति दिखाई देती है। परिवार पर मृत्यु भोज आयोजित करने का सामाजिक दबाव बनाया जाता है। परिणामस्वरूप गरीब परिवार कर्ज लेते हैं, जमीन गिरवी रखते हैं या अपनी वर्षों की जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं। शोक का अवसर आर्थिक विपदा में बदल जाता है। परंपरा का मूल्य उसकी उपयोगिता से तय होगा प्रश्न यह है कि क्या किसी परंपरा का मूल्य केवल उसकी प्राचीनता से तय होगा, या इस बात से कि वह मनुष्य के जीवन को कितना गरिमापूर्ण और सहायक बनाती है? यदि कोई परंपरा पीड़ा कम करने के बजाय उसे बढ़ाने लगे, तो उसका पुनर्मूल्यांकन संस्कृति का विरोध नहीं, बल्कि उसकी आत्मा की रक्षा है। श्रद्धांजलि का सबसे मानवीय रूप भरतपुर गांव का निर्णय इसी कारण विशेष महत्व रखता है। समुदाय ने स्वीकार किया कि मृतक के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि खर्चीला भोज नहीं, बल्कि शोकग्रस्त परिवार के साथ मानवीय सहयोग है। किसी परिवार को कर्ज से बचाना, उसके बच्चों की शिक्षा में सहायता करना, संकट की घड़ी में उसके साथ खड़ा होना और उसे सामाजिक सुरक्षा का भरोसा देना कहीं अधिक सार्थक सामाजिक आचरण है। यह दृष्टि कर्मकांड से अधिक करुणा को महत्व देती है और भारतीय संस्कृति के मूल मानवीय तत्व को पुनः स्थापित करती है। स्थायी बदलाव समाज के भीतर से आता है इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह किसी बाहरी सुधार अभियान का परिणाम नहीं है। सामाजिक परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति समाज के भीतर निहित होती है। कानून व्यवहार को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन चेतना का निर्माण नहीं कर सकता। दहेज निषेध कानून इसका उदाहरण है। कानूनी प्रतिबंध के बावजूद दहेज आज भी अनेक परिवारों की त्रासदी बना हुआ है। इसके विपरीत जहाँ समाज ने स्वयं सादगी और संयम को स्वीकार किया, वहाँ परिवर्तन अपेक्षाकृत अधिक स्थायी सिद्ध हुआ। भरतपुर की पहल इसी आत्मप्रेरित सामाजिक सुधार का उदाहरण है। भारतीय संस्कृति की आत्मसंशोधन की परंपरा भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता उसकी आत्मसंशोधन की क्षमता रही है। उपनिषदों के संवाद, बुद्ध का विवेक, कबीर का निर्भीक प्रतिवाद और संत परंपरा का समतामूलक दृष्टिकोण इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारतीय संस्कृति ने कभी अंधानुकरण का समर्थन नहीं किया। प्रश्न पूछना और समय के अनुरूप परंपराओं की समीक्षा करना हमारी बौद्धिक विरासत का हिस्सा रहा है। यदि समाज ने समय-समय पर अपनी मान्यताओं का पुनर्मूल्यांकन न किया होता, तो सती प्रथा, बाल विवाह और अस्पृश्यता जैसी अमानवीय प्रथाएँ आज भी सामाजिक जीवन का हिस्सा होतीं। मृत्यु भोज: सामाजिक प्रतिष्ठा या आर्थिक बोझ? मृत्यु भोज का प्रश्न केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक संरचना और सामुदायिक नैतिकता से भी जुड़ा हुआ है। सीमित आय वाले परिवार सामाजिक प्रतिष्ठा के दबाव में अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करते हैं। उन्हें भय रहता है कि सादगी को समाज उनकी गरीबी या उपेक्षा के रूप में देखेगा। यही मानसिकता सामाजिक संस्कारों को सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा का माध्यम बना देती है। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीब परिवारों पर पड़ता है। 'सामाजिक दबाव की अर्थव्यवस्था' का दुष्चक्र समाजशास्त्री इसे "सामाजिक दबाव की अर्थव्यवस्था" कहते हैं। इसमें व्यक्ति अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकृति प्राप्त करने के लिए खर्च करता है। यह खर्च उत्पादक नहीं होता, बल्कि क्षणिक प्रतिष्ठा अर्जित करने का प्रयास होता है। आयोजन समाप्त हो जाता है, लेकिन उसका आर्थिक बोझ वर्षों तक परिवार पर बना रहता है। कई बार बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है, खेती में निवेश नहीं हो पाता और परिवार कर्ज के ऐसे चक्र में फँस जाता है, जिससे निकलना कठिन हो जाता है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या समाज का दायित्व अपने सदस्यों को कर्ज की ओर धकेलना है या उन्हें संकट से बचाना? गांधी और आंबेडकर की दृष्टि में सामाजिक सादगी महात्मा गांधी ने सामाजिक जीवन में सादगी को नैतिक मूल्य माना था। उनका आग्रह था कि धार्मिक और सामाजिक संस्कारों का उद्देश्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मसंयम और लोकमंगल होना चाहिए। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी सामाजिक लोकतंत्र का आधार समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को माना। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अतिरिक्त बोझ डालना इन मूल्यों के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। किसी भी लोकतांत्रिक समाज की पहली शर्त यह है कि वह अपने सबसे कमजोर व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करे। रस्म नहीं, जिम्मेदारी निभाने का संदेश भरतपुर के रविदास समाज का निर्णय इसी संदर्भ में उल्लेखनीय है। यह केवल एक रस्म का त्याग नहीं, बल्कि सामाजिक प्राथमिकताओं के पुनर्निर्धारण का निर्णय है। यह संदेश देता है कि मृतक के प्रति सम्मान का सबसे बड़ा रूप भोजन का आयोजन नहीं, बल्कि उसके परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाना है। यदि समाज शोकग्रस्त परिवार के बच्चों की शिक्षा, आजीविका और भविष्य की चिंता करे तो वही किसी भी संस्कार का सबसे मानवीय स्वरूप होगा। सुधार सिर्फ मृत्यु भोज तक सीमित नहीं होना चाहिए यह भी ध्यान रखना होगा कि मृत्यु भोज अकेली समस्या नहीं है। विवाहों में बढ़ता दिखावा, दहेज, तिलक और अन्य सामाजिक आयोजनों में अपव्यय भी उसी मानसिकता की उपज हैं, जिसमें सामाजिक प्रतिष्ठा को मानवीय संवेदना से अधिक महत्व दिया जाता है। यदि समाज वास्तव में सुधार चाहता है तो उसे केवल एक रस्म पर नहीं बल्कि उस पूरी मानसिकता पर विचार करना होगा, जो व्यक्ति की आर्थिक क्षमता से अधिक सामाजिक अपेक्षाएं थोपती है। छोटी पहल, बड़े बदलाव की शुरुआत भरतपुर की पहल इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि परिवर्तन हमेशा बड़े आंदोलनों या सरकारी नीतियों से नहीं आता। अनेक बार वह छोटे-छोटे सामुदायिक निर्णयों से जन्म लेता है, जो धीरे-धीरे सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं। इतिहास बताता है कि टिकाऊ सुधार वही होते हैं, जिन्हें समाज स्वयं स्वीकार करता है। इसलिए ऐसे सकारात्मक प्रयोगों को केवल स्थानीय समाचार मानकर भुला देना उचित नहीं होगा। वे भारत के बदलते सामाजिक मानस के संकेत हैं। संविधान की भावना से जुड़ा सामाजिक प्रश्न यह विमर्श भारतीय संविधान की मूल भावना से भी जुड़ता है। न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व केवल राज्य के लिए निर्देश नहीं हैं; वे समाज के लिए भी नैतिक मानदंड हैं। यदि कोई सामाजिक प्रथा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर असमान दबाव डालती है, तो वह सामाजिक न्याय का प्रश्न बन जाती है। लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों से नहीं बल्कि इस बात से मापी जाती है कि समाज अपने सबसे कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है। परंपरा का सम्मान, परिवर्तन का साहस अंततः किसी समाज की पहचान उसकी परंपराओं की संख्या से नहीं बल्कि उन्हें समय के अनुरूप बदलने की क्षमता से होती है। भरतपुर के रविदास समाज ने मृत्यु भोज का बहिष्कार करके केवल एक खर्चीली रस्म का त्याग नहीं किया बल्कि यह संदेश दिया है कि शोक का अवसर प्रदर्शन का नहीं, सहभागिता का होना चाहिए; संस्कार का उद्देश्य खर्च नहीं, करुणा होना चाहिए; और समाज की प्रतिष्ठा उसके भोजों से नहीं बल्कि उसके व्यवहार से तय होनी चाहिए। यदि यह चेतना अन्य समुदायों तक पहुंचे, तो यह केवल एक कुरीति के क्षरण तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि भारतीय समाज को अधिक मानवीय, न्यायपूर्ण और संवेदनशील बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगी। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)