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नई दिल्ली। भारत और जापान ने अगले 10 वर्षों में भारत में 10 लाख करोड़ येन जापानी निवेश का लक्ष्य तय करते हुए एआई, रक्षा तकनीक, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य, बायोगैस और नेक्स्ट-जेन मोबिलिटी जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई दिशा देने का फैसला किया है। भारत-जापान रिश्तों में नया अध्याय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत की तीन दिन की यात्रा पर आई जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के बीच हुई वार्षिक शिखर वार्ता ने यह साफ कर दिया कि भारत और जापान अब अपने रिश्तों को सिर्फ पारंपरिक कूटनीतिक सहयोग तक सीमित नहीं रखना चाहते। दोनों देश अब निवेश, तकनीक, रक्षा, ऊर्जा और मानव संसाधन जैसे बड़े क्षेत्रों में मिलकर आगे बढ़ने की दिशा में काम करेंगे। इस संयुक्त बयान ने यह संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में भारत-जापान संबंध और ज्यादा व्यावहारिक, रणनीतिक और आर्थिक रूप से मजबूत होने वाले हैं। 10 ट्रिलियन येन निवेश का लक्ष्य क्यों है सबसे बड़ा फैसला इस पूरी वार्ता का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण बिंदु भारत में 10 लाख करोड़ येन जापानी निवेश का लक्ष्य तय किया जाना है। यह सिर्फ एक निवेश घोषणा नहीं बल्कि भारत के उद्योग, विनिर्माण, बुनियादी ढांचे और रोजगार के लिए लंबी अवधि का आर्थिक रोडमैप है। श्री मोदी ने कहा कि पिछले एक साल में 100 से अधिक नए कारोबारी समझौते हुए हैं, जिनसे 10 अरब डॉलर से अधिक जापानी निवेश आने की संभावना है। अब इसी रफ्तार को अगले दशक तक बढ़ाते हुए दोनों देशों ने निवेश और कारोबारी भागीदारी को नए स्तर पर ले जाने का फैसला किया है। भारत में जापानी कंपनियों की संख्या बढ़ाने पर भी जोर दोनों देशों ने केवल निवेश तक बात सीमित नहीं रखी बल्कि भारत में काम कर रही जापानी कंपनियों की संख्या को दोगुना करने का भी लक्ष्य रखा है। इसका मतलब है कि आने वाले समय में भारत में जापान की मौजूदगी सिर्फ पूंजी निवेश तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि नए उद्योग, नई फैक्ट्रियां, नई तकनीकी साझेदारियां और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। यह कदम भारत को वैश्विक विनिर्माण और सप्लाई चेन नेटवर्क में और मजबूत स्थिति दिला सकता है। एआई साझेदारी को मिली नई दिशा वार्ता में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को भविष्य की साझेदारी का अहम आधार माना गया। दोनों देशों ने एआई पर संयुक्त बयान जारी किया और इस क्षेत्र में संस्थागत सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि भारत की सॉफ्टवेयर क्षमता और जापान की प्रिसीजन तकनीक मिलकर वैश्विक एआई विकास को नई दिशा दे सकती है। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में भारत और जापान एआई आधारित समाधान, शोध, उद्योग और तकनीकी नवाचार में साथ मिलकर काम करेंगे। रक्षा क्षेत्र में पहली बड़ी सह-विकास परियोजना भारत और जापान ने रक्षा सहयोग को भी एक नई ऊंचाई दी है। दोनों देशों ने अपने पहले सह-विकास प्रोजेक्ट पर सहमति बनाई है, जो नेवल रेडियो एंटीना से जुड़ा है। यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि इससे साफ होता है कि भारत और जापान अब सिर्फ रक्षा संवाद तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि रक्षा तकनीक के विकास और उत्पादन में भी साझेदार बनेंगे। यह सहयोग हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, स्थिरता और रणनीतिक संतुलन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सेमीकंडक्टर और क्वांटम जैसे क्षेत्रों पर साझा फोकस दुनिया भर में सप्लाई चेन और तकनीकी सुरक्षा की चुनौतियों के बीच भारत और जापान ने आर्थिक सुरक्षा पर भी खास ध्यान दिया है। दोनों देशों ने एक संयुक्त रोडमैप तैयार किया है, जिसके तहत सेमीकंडक्टर, क्वांटम और एडवांस्ड मटेरियल जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जाएगा। इसका मकसद इन क्षेत्रों में सप्लाई चेन को मजबूत बनाना और भविष्य की तकनीकों में साझा क्षमता तैयार करना है। यह भारत के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि सेमीकंडक्टर और क्वांटम जैसे क्षेत्र आने वाले समय की औद्योगिक और तकनीकी ताकत तय करेंगे। ऊर्जा सुरक्षा में बायोगैस से लेकर ग्रीन टेक्नोलॉजी तक सहयोग संयुक्त बयान में ऊर्जा सुरक्षा को भी बड़ी प्राथमिकता दी गई। भारत और जापान ने इंडिया-जापान बायोगैस इनिशिएटिव के तहत भारत में 1,000 बायोगैस और ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर प्लांट लगाने में सहयोग की बात कही है। इससे एक तरफ स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा, तो दूसरी तरफ ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जैविक खेती और रोजगार को भी मजबूती मिल सकती है। इसके अलावा बैटरी, ग्रीन हाइड्रोजन और न्यूक्लियर एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है, जिससे साफ है कि दोनों देश ऊर्जा क्षेत्र में दीर्घकालिक साझेदारी बनाना चाहते हैं। ऑटोमोबाइल से आगे अब नई मोबिलिटी पर नजर भारत और जापान ने नेक्स्ट जेनरेशन मोबिलिटी पार्टनरशिप फ्रेमवर्क पर भी सहमति जताई है। इसके तहत दोनों देश ऑटोमोबाइल सेक्टर में अपनी पुरानी सफल साझेदारी को आगे बढ़ाते हुए अब शिपबिल्डिंग, एविएशन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में भी साथ काम करेंगे। यानी यह साझेदारी अब केवल कारों और ऑटो उद्योग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि परिवहन और लॉजिस्टिक्स की नई तकनीकों तक पहुंचेगी। इससे भारत के औद्योगिक और बुनियादी ढांचा क्षेत्र को भी फायदा मिल सकता है। हेल्थ, फार्मा और बायोटेक में भी बढ़ेगा सहयोग दोनों देशों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है। फार्मा, मेडिकल डिवाइसेज और बायोटेक जैसे क्षेत्रों में समझौतों के जरिए वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करने की बात कही गई है। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में भारत और जापान स्वास्थ्य तकनीक, दवाओं, मेडिकल रिसर्च और नई स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में साझा पहल कर सकते हैं। यह सहयोग महामारी जैसी वैश्विक चुनौतियों के दौर में और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। स्किलिंग, रिसर्च और स्टार्टअप को भी मिलेगा बढ़ावा इस वार्ता में सिर्फ बड़े उद्योगों और रणनीतिक क्षेत्रों की बात नहीं हुई, बल्कि लोगों के बीच रिश्तों और प्रतिभा विकास पर भी जोर दिया गया। दोनों देशों ने स्किलिंग, तकनीकी इंटर्नशिप, रिसर्च, एजुकेशन और स्टार्टअप सहयोग को मजबूत करने पर सहमति जताई है। इससे भारतीय युवाओं, शोधकर्ताओं और स्टार्टअप इकोसिस्टम को जापान के साथ जुड़ने के नए मौके मिल सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा कि भारत-जापान संबंधों की सबसे बड़ी ताकत लोगों के बीच भरोसा और जुड़ाव है। यह संयुक्त बयान भारत के लिए क्यों अहम है अगर पूरे घटनाक्रम को एक साथ देखें तो स्पष्ट है कि यह सिर्फ एक औपचारिक शिखर वार्ता नहीं बल्कि भारत-जापान संबंधों के अगले दशक का विस्तृत खाका है। इसमें सबसे बड़ा फोकस निवेश, तकनीक, रक्षा, ऊर्जा, सप्लाई चेन और मानव संसाधन सहयोग पर है। भारत के लिए इसका महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि जापान जैसा विश्वसनीय साझेदार देश भारत के बुनियादी ढांचे, उद्योग, तकनीक और रोजगार सृजन में बड़ी भूमिका निभा सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो मोदी-ताकाइची वार्ता ने भारत और जापान के रिश्तों को नई रफ्तार देने के साथ यह संकेत भी दिया है कि आने वाले वर्षों में दोनों देश एशिया और वैश्विक स्तर पर एक-दूसरे के और मजबूत रणनीतिक साझेदार बनकर उभरेंगे।



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