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(जन्मदिन 08 सितम्बर पर विशेष) मुंगेर। योग की वैश्विक यात्रा में मुंगेर का नाम एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में दर्ज है। गंगा के किनारे बसा यह शहर लंबे समय से धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है लेकिन बीसवीं सदी में उसने योग को जनजीवन से जोड़ने की ऐसी पहल देखी, जिसका प्रभाव देश की सीमाओं से बहुत आगे तक गया। इस यात्रा के केंद्र में स्वामी शिवानंद सरस्वती की विचारधारा और उनके शिष्य स्वामी सत्यानंद सरस्वती का कार्य रहा। 1938 में स्वामी शिवानंद का मुंगेर आगमन और 1963 में उनके शिष्य द्वारा बिहार योग विद्यालय की स्थापना, इन दोनों घटनाओं के बीच योग के जनोन्मुखी विस्तार की एक पूरी कहानी छुपी है। साधना से जनजीवन तक योग की व्यापक दृष्टि मुंगेर को समझे बिना स्वामी शिवानंद की योग-दृष्टि की व्यापकता को भी पूरी तरह समझना कठिन है। उन्होंने योग को केवल साधकों की निजी साधना नहीं माना। उनका आग्रह था कि योग सामान्य मनुष्य के जीवन में उतरे, उसके स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन का आधार बने और उसे अधिक अनुशासित, संवेदनशील तथा उपयोगी बनाए। बाद में मुंगेर इसी सोच का प्रयोग-क्षेत्र बना। स्वामी शिवानंद का जन्म 8 सितम्बर 1887 को तमिलनाडु में हुआ था। चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने मलाया में चिकित्सक के रूप में काम किया। वहां भारतीय श्रमिकों के बीच काम करते हुए उन्होंने गरीबी, बीमारी और असहायता को करीब से देखा। एक गरीब श्रमिक अपनी बीमार पत्नी को उनके पास लेकर आया। इलाज के पैसे नहीं थे। शिवानंद ने उसका उपचार किया और पौष्टिक भोजन के लिए आर्थिक सहायता भी दी। चिकित्सा उनके लिए केवल पेशा नहीं रही। सेवा उनके जीवन का स्थायी आधार बन गई। आत्मचिंतन से संन्यास की ओर इसी दौरान एक साधु से मिली ‘ब्रह्म विचार’ पुस्तक ने उनके भीतर आत्मचिंतन की नई शुरुआत की। 1924 में उन्होंने मलाया छोड़ दिया। भारत लौटकर वे घर नहीं गए बल्कि गुरु और परमात्मा की खोज में निकल पड़े। अनेक स्थानों से होते हुए ऋषिकेश पहुंचे। वहां स्वामी विश्वानंद सरस्वती से संन्यास की दीक्षा ली और साधना के साथ सेवा का मार्ग अपनाया। वर्ष 1932 में शिवानंद आश्रम और 1936 में दिव्य जीवन संघ की स्थापना हुई। योग, वेदांत, अध्यात्म और जीवन-दर्शन पर उन्होंने बड़ी संख्या में पुस्तकें लिखीं। लगभग 300 पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने जटिल विषयों को सरल भाषा में सामान्य लोगों तक पहुंचाया। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि योग कुछ चुनिंदा साधकों तक सीमित न रह जाए। वह घर-परिवार में रहने वाले सामान्य व्यक्ति की भी जरूरत बने। जब आध्यात्मिक चेतना लेकर मुंगेर पहुंचे शिवानंद यही विचार उन्हें मुंगेर तक लाया। 1938 में स्वामी शिवानंद के मुंगेर आगमन का प्रसंग इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उन्होंने यहां नगर कीर्तन किया और लोगों के बीच आध्यात्मिक चेतना का संदेश पहुंचाया। यह उस समय की बात है जब योग का सार्वजनिक स्वरूप आज की तरह व्यापक नहीं था। शिवानंद का नगर के बीच आना इस बात का संकेत था कि उनकी साधना आश्रम की चारदीवारी तक सीमित नहीं थी। वे आध्यात्मिकता को समाज के बीच ले जाने के पक्षधर थे। मुंगेर में उनके इस आगमन का महत्व बाद की घटनाओं से और स्पष्ट होता है। स्वामी शिवानंद के शिष्य स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने गुरु से योग की शिक्षा ली और फिर देशभर में भ्रमण किया। उन्होंने आधुनिक मनुष्य के जीवन में बढ़ते तनाव, असंतुलन और मानसिक दबाव को देखा। उन्हें लगा कि योग को यदि सरल और वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया जाए तो वह केवल संन्यासियों या साधकों के लिए नहीं, बल्कि आम आदमी के लिए भी उपयोगी हो सकता है। गुरु की आज्ञा से मुंगेर में जला योग का दीप 1956 में स्वामी शिवानंद ने स्वामी सत्यानंद को योग के प्रचार-प्रसार का दायित्व सौंपा। यह जिम्मेदारी आगे चलकर मुंगेर में एक बड़े संस्थागत प्रयास में बदली। 1963 में स्वामी सत्यानंद ने मुंगेर में बिहार योग विद्यालय की स्थापना की। यहीं से मुंगेर योग की आधुनिक भारतीय यात्रा में एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा। बिहार योग विद्यालय ने योग को केवल सिखाया नहीं, बल्कि उसे व्यवस्थित पाठ्यक्रम, प्रशिक्षण और अनुसंधान से जोड़ा। गंगा के किनारे स्थित मुंगेर देश-विदेश से आने वाले साधकों का केंद्र बनने लगा। यहां योग को जीवन के विभिन्न पक्षों से जोड़कर समझाया गया—आसन और प्राणायाम के साथ ध्यान, मन का अनुशासन, जीवन-पद्धति और आत्मचिंतन। इस प्रक्रिया में मुंगेर ने योग को एक ऐसी भाषा दी जिसे आधुनिक समाज समझ सकता था। ऋषिकेश में बोया बीज, मुंगेर में मिला विस्तार यही वह बिंदु है जहां मुंगेर का महत्व केवल एक शहर का नहीं रह जाता। ऋषिकेश में जिस विचार का बीजारोपण हुआ था, मुंगेर ने उसे व्यापक सामाजिक और वैश्विक विस्तार की जमीन दी। स्वामी शिवानंद की सोच थी कि योग जनसाधारण तक पहुंचे; स्वामी सत्यानंद ने मुंगेर में उस सोच को संस्थागत रूप दिया। आगे चलकर स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया। स्वामी शिवानंद की योग-दृष्टि शरीर से शुरू होकर मन और चेतना तक जाती थी। उनके लिए योग का अर्थ केवल आसन नहीं था। स्वस्थ शरीर, शांत मन, संतुलित भावनाएं और जाग्रत चेतना—इन सभी का विकास योग के व्यापक अर्थ में शामिल था। वे मानते थे कि मनुष्य के भीतर अहंकार, भय, अस्मिता, राग-द्वेष, दर्प और निष्क्रियता जैसी मानसिक गांठें होती हैं। योग इन गांठों को ढीला करता है और व्यक्ति को भीतर से अधिक सजग बनाता है। उनकी साधना में सेवा, प्रेम, दान, शुद्धता, सत्कर्म, सदाचार, ध्यान और आत्मानुभूति महत्वपूर्ण थे। कर्मयोग को उन्होंने सेवा और मन की शुद्धि से जोड़ा, राजयोग को चित्त के अनुशासन से और ज्ञानयोग को आत्मबोध से। उनके लिए इनका समन्वय ही संपूर्ण योग था। जब निराश युवा एपीजे कलाम को शिवानंद ने दिखाई नई राह स्वामी शिवानंद के इस विचार को समझने में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से जुड़ा प्रसंग भी उपयोगी है। युवा कलाम वायुसेना में पायलट बनने का सपना लेकर चयन प्रक्रिया में पहुंचे थे लेकिन अंतिम चरण में सफल नहीं हो सके। वे गहरे निराश हुए। ऋषिकेश में स्वामी शिवानंद से मुलाकात के दौरान उन्हें जीवन को एक व्यापक दृष्टि से देखने की प्रेरणा मिली। शिवानंद ने उन्हें समझाया कि एक असफलता जीवन का अंतिम निष्कर्ष नहीं होती। कभी-कभी जिस रास्ते का बंद होना दिखाई देता है, वही किसी दूसरे और अधिक महत्वपूर्ण रास्ते की शुरुआत बन जाता है। डॉ. कलाम ने बाद में इस मुलाकात को अपने जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंग के रूप में याद किया। वायुसेना में चयन न होने के बाद उन्होंने वैज्ञानिक जीवन की राह पकड़ी। आगे चलकर वे अंतरिक्ष और रक्षा कार्यक्रमों से जुड़े, देश के प्रमुख वैज्ञानिक बने और भारत के राष्ट्रपति पद तक पहुंचे। इस प्रसंग में शिवानंद की शिक्षा का मूल दिखाई देता है— परिस्थिति चाहे जैसी हो, मनुष्य को अपने भीतर की शक्ति पहचाननी चाहिए। योग का लक्ष्य—जीवन में संतुलन यही संदेश मुंगेर की योग-परंपरा में भी दिखाई देता है। यहां योग को जीवन से काटकर नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने के साधन के रूप में देखा गया। योग का उद्देश्य केवल शरीर को लचीला बनाना नहीं, बल्कि मन को स्थिर करना, विचारों को स्पष्ट करना और व्यवहार में संतुलन लाना है। स्वामी शिवानंद के लिए सेवा साधना का अनिवार्य हिस्सा थी। ‘मानव सेवा ही माधव सेवा’ उनके जीवन का प्रमुख सूत्र था। ‘बहुजन सुखाय, बहुजन हिताय’ की भावना ने उनकी आध्यात्मिकता को सामाजिक अर्थ दिया। इसीलिए उनका योग व्यक्ति को दुनिया से दूर ले जाने के बजाय उसे समाज के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाने की दिशा में ले जाता है। मुंगेर से विश्व तक पहुंची योग की धारा आज दुनिया के अनेक देशों में योग स्वास्थ्य और जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। योग दिवस जैसे आयोजनों ने इसकी सार्वजनिक पहचान को और व्यापक बनाया है। लेकिन इस वैश्विक स्वीकार्यता की पृष्ठभूमि में मुंगेर जैसे केंद्रों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मुंगेर ने योग को परंपरा से आधुनिक प्रशिक्षण, व्यक्तिगत साधना से संस्थागत शिक्षा और स्थानीय अभ्यास से अंतरराष्ट्रीय प्रसार तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए, स्वामी शिवानंद की जयंती पर मुंगेर को याद करना महज किसी शहर को याद करना नहीं है। यह उस विचार-यात्रा को याद करना है, जिसमें ऋषिकेश के एक संत ने योग को जनसाधारण के लिए उपयोगी बनाने का सपना देखा, उनके शिष्य ने मुंगेर में उसे संस्थागत आधार दिया और वहां से योग की शिक्षा दुनिया के अनेक हिस्सों तक पहुंची। योग की आधुनिक यात्रा का निर्णायक अध्याय स्वामी शिवानंद ने योग को रहस्य और सीमित साधना की परिधि से बाहर निकाला। मुंगेर ने उस विचार को विस्तार दिया। यही इस शहर की सबसे बड़ी पहचान है। गंगा के किनारे बसा मुंगेर इस अर्थ में केवल बिहार का एक ऐतिहासिक शहर नहीं, बल्कि भारत से विश्व तक योग की आधुनिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। स्वामी शिवानंद की विरासत का मूल्यांकन करते समय इस भूमिका को सामने रखना इसलिए जरूरी है कि योग की जनोपयोगी यात्रा में मुंगेर केवल एक पड़ाव नहीं, बल्कि एक निर्णायक अध्याय है। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)