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मुंबई। किसी कलाकार की पहचान उसकी प्रतिभा से बनती है, लेकिन उसे महान उसकी तपस्या बनाती है। हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार रोशन की जिंदगी भी इसी सच की मिसाल है। गुरु उ स्ताद अल्लाउद्दीन खान की एक सख्त सीख, "आठ घंटे रियाज़ नहीं कर सकते तो यहां रहने का कोई फायदा नहीं" ने उन्हें ऐसा संगीतकार बनाया, जिसकी धुनें आज भी वक्त की हर कसौटी पर खरा उतरती हैं। यह सिर्फ एक वाक्य नहीं था बल्कि रोशन की पूरी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक बन गया। इसी सीख ने उन्हें साधारण संगीतकार से असाधारण कलाकार बनने की राह दिखाई। आगे चलकर यही कठोर साधना उनकी धुनों में ऐसी मिठास बनकर उतरी कि उनका संगीत सात दशक बाद भी लोगों के दिलों में उसी ताजगी के साथ गूंजता है। कारोबार नहीं, सुरों की दुनिया थी मंजिल तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में 14 जुलाई 1917 को जन्मे रोशनलाल नागरथ एक ठेकेदार परिवार से थे। परिवार चाहता था कि वह पुश्तैनी कारोबार संभालें लेकिन बचपन से ही उनका मन सुरों में बसता था। उन्हें फिल्मों का भी गहरा शौक था। एक दिन उन्होंने के.एल. सहगल अभिनीत फिल्म 'पूरन भगत' देखी। फिल्म में सहगल का गाया भजन उनके दिल में ऐसा उतरा कि उन्होंने वही फिल्म कई बार देखी। उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि उनकी जिंदगी संगीत को ही समर्पित होगी। 11 साल की उम्र से शुरू हुई संगीत साधना महज 11 वर्ष की उम्र में रोशन ने उस्ताद मनोहर बर्वे से संगीत सीखना शुरू किया। मनोहर बर्वे मंचीय कार्यक्रम भी आयोजित करते थे और रौशन उनके साथ देशभर के संगीत आयोजनों में जाने लगे। इससे उन्हें मंच, संगीत और श्रोताओं की समझ मिली। इसके बाद उन्होंने लखनऊ के प्रतिष्ठित मॉरिस कॉलेज ऑफ म्यूजिक में प्रवेश लिया, जहां उन्होंने संगीताचार्य रतन जानकर से शास्त्रीय संगीत की गहराइयों को समझा। लेकिन, उनकी असली परीक्षा तब शुरू हुई, जब वह मैहर पहुंचे और महान संगीताचार्य उस्ताद अल्लाउद्दीन खान के शिष्य बने। यहीं उन्हें वह सीख मिली जिसने उनके जीवन का पूरा नजरिया बदल दिया। रोशन ने बाद में अपने संगीत में जिस अनुशासन, गहराई और आत्मा को शामिल किया, उसकी नींव इसी कठोर रियाज़ में पड़ी। इसी दौरान उन्होंने मशहूर सारंगी वादक उस्ताद बुंदू खान से सारंगी भी सीखी, जिसने उनकी धुनों को और अधिक भावपूर्ण बना दिया। आकाशवाणी से मुंबई तक का संघर्ष रोशन ने 1940 में आकाशवाणी, दिल्ली में संगीतकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। रेडियो ने उन्हें संगीत रचना का व्यावहारिक अनुभव दिया लेकिन उनका सपना फिल्मों के लिए संगीत तैयार करना था। इसी सपने को लेकर 1949 में वह मुंबई पहुंचे। यहां सफलता उन्हें तुरंत नहीं मिली। लगभग एक साल तक संघर्ष करने के बाद उनकी मुलाकात निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा से हुई। शर्मा ने उनकी प्रतिभा पहचानकर फिल्म 'नेकी और बदी' में संगीत देने का मौका दिया। फिल्म भले सफल नहीं हुई लेकिन संगीत जगत में रौशन की प्रतिभा की चर्चा शुरू हो गई। एक गीत ने बदल दी किस्मत केदार शर्मा ने 1950 में उन्हें अपनी अगली फिल्म 'बावरे नैन' का संगीत सौंपा। फिल्म का गीत 'तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं' , जिसे मुकेश ने अपनी दर्दभरी आवाज दी थी, जबरदस्त लोकप्रिय हुआ। इस एक गीत ने रौशन को हिंदी फिल्म उद्योग में स्थापित संगीतकारों की कतार में ला खड़ा किया। हर धुन में शास्त्रीय संगीत की खुशबू रोशन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने कभी लोकप्रियता के लिए संगीत की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया। उनकी धुनों में भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहराई होती थी, लेकिन उन्हें इस तरह प्रस्तुत किया जाता था कि आम श्रोता भी उनसे जुड़ जाते थे। उन्होंने 'मल्हार' , 'हमलोग' , 'अनहोनी' , 'आरती' , 'बरसात की रात' , 'दिल ही तो है' , 'ताजमहल' , 'चित्रलेखा' , 'ममता' , 'बहू बेगम' , 'भीगी रात' और 'नूरजहां' जैसी फिल्मों को ऐसा संगीत दिया, जो आज भी भारतीय सिनेमा की धरोहर माना जाता है। कव्वाली को दिया नई पहचान रोशन की पहचान सिर्फ मधुर धुनों तक सीमित नहीं रही। हिंदी सिनेमा में फिल्मी कव्वाली को नई ऊंचाई देने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। वर्ष 1960 में रिलीज हुई फिल्म 'बरसात की रात' में उनके संगीत निर्देशन में तैयार हुई 'ना तो कारवां की तलाश है' और 'ये इश्क इश्क है' जैसी कव्वालियों ने ऐसा इतिहास रचा कि आज भी उन्हें हिंदी फिल्मों की सर्वश्रेष्ठ कव्वालियों में गिना जाता है। इसके बाद 'दिल ही तो है' की मशहूर कव्वाली 'निगाहें मिलाने को जी चाहता है' ने भी उनकी प्रतिभा पर मुहर लगा दी। शास्त्रीय संगीत की गहराई, उर्दू अदब की नज़ाकत और सुरों की मिठास को जिस खूबसूरती से रौशन ने कव्वालियों में पिरोया, उसने उन्हें फिल्मी दुनिया का 'कव्वालियों का बेमिसाल संगीतकार' बना दिया। साहिर और मुकेश के साथ बनी यादगार तिकड़ी गीतकार साहिर लुधियानवी के साथ रोशन की जोड़ी ने हिंदी फिल्म संगीत को कई अमर गीत दिए। वहीं गायक मुकेश ने सबसे अधिक उनके गीतों को अपनी आवाज दी। 'जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा' , 'रहे ना रहे हम' , 'जो बात तुझमें है' , 'पांव छू लेने दो' , 'छुपा लो यूं दिल में प्यार मेरा' , 'दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें' और 'जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात' जैसे गीत आज भी संगीत प्रेमियों की प्लेलिस्ट का हिस्सा हैं। फिल्मफेयर सम्मान और अमर विरासत 1963 में रिलीज हुई फिल्म 'ताजमहल' के संगीत के लिए रोशन को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। यह सम्मान उनके वर्षों के समर्पण, कठिन रियाज़ और संगीत के प्रति ईमानदारी का परिणाम था। लेकिन, किस्मत को कुछ और मंजूर था। 16 नवंबर 1967 को महज 50 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उम्र भले छोटी रही लेकिन उनका संगीत अमर हो गया। आज भी प्रेरणा देती है रौशन की कहानी रोशन की कहानी सिर्फ एक सफल संगीतकार की कहानी नहीं है बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि प्रतिभा जन्म से मिल सकती है लेकिन महानता केवल कठोर मेहनत, अनुशासन और निरंतर रियाज से हासिल होती है। गुरु की वह एक सीख—**"आठ घंटे रियाज़ करो"**—आज भी हर कलाकार के लिए उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उस दिन रौशन के लिए थी। यही वजह है कि रोशन आज केवल एक संगीतकार नहीं बल्कि समर्पण, साधना और उत्कृष्टता का ऐसा नाम हैं, जिनकी धुनें आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेंगी।