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यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए नई दिल्ली। देश के तेजी से बदलते सहकारी क्षेत्र को अधिक वित्तीय और संस्थागत सहायता देने के उद्देश्य से संसद ने राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम संशोधन विधेयक, 2026 पारित कर दिया है, जिसके जरिए निगम का दायरा चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित रखने के बजाय व्यापक सहकारी विकास तक बढ़ाने, राज्यस्तरीय संस्थाओं को सहायता देने और प्रसंस्करण, तकनीक तथा आधारभूत ढांचे से जुड़ी सहयोगी इकाइयों के वित्तपोषण का रास्ता खोलने का प्रस्ताव है। किस कानून में होगा बदलाव यह विधेयक राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम अधिनियम, 1962 में संशोधन करता है। वर्ष 1962 के मूल कानून के तहत राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम यानी एनसीडीसी मुख्य रूप से कुछ निर्धारित क्षेत्रों, वस्तुओं और सहकारी कार्यक्रमों को वित्तीय सहायता देता था। नए विधेयक का उद्देश्य इस सीमित व्यवस्था को बदलकर एनसीडीसी को सामान्य और व्यापक सहकारी विकास के लिए अधिक अधिकार तथा लचीलापन देना है। एनसीडीसी क्या है राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम एक वैधानिक संस्था है, जिसका काम सहकारी संस्थाओं से जुड़ी योजनाओं को वित्तीय सहायता देना और उनके विकास को बढ़ावा देना है। यह कृषि, खाद्य, दुग्ध, भंडारण, विपणन और अन्य सहकारी गतिविधियों से संबंधित परियोजनाओं को ऋण, अनुदान तथा दूसरे माध्यमों से सहायता देता है। अब केवल तय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा दायरा पुराने कानून में एनसीडीसी का वित्तपोषण कुछ विशेष क्षेत्रों और वस्तुओं तक सीमित था। संशोधन विधेयक के तहत इसका दायरा बढ़ाकर सहकारी विकास को बढ़ावा देने और वित्तपोषित करने तक किया गया है। निगम यह सहायता सीधे भी दे सकेगा और मध्यस्थ संस्थाओं के माध्यम से भी उपलब्ध करा सकेगा। इससे सहकारी क्षेत्र की नई और विविध जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक विकल्प उपलब्ध होंगे। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ भी होंगे शामिल वर्ष 1962 के कानून में दूध, मांस, अंडा और सब्जियों जैसी खाद्य वस्तुएं शामिल थीं। नए विधेयक में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों, अन्य खाद्य उत्पादों और केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित वस्तुओं को भी शामिल करने का प्रस्ताव है। इससे खाद्य प्रसंस्करण से जुड़ी सहकारी संस्थाओं को भी एनसीडीसी की वित्तीय सहायता मिलने का रास्ता आसान होगा। औद्योगिक इकाइयों से हटेगी ग्रामीण क्षेत्र की शर्त पुराने कानून के तहत कुछ सहकारी और सहयोगी उद्योगों को सहायता तभी मिलती थी, जब वे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित होते थे। संशोधन विधेयक इस भौगोलिक सीमा को हटाता है। अब शहरी या दूसरे क्षेत्रों में काम करने वाली पात्र सहकारी औद्योगिक इकाइयां भी वित्तीय सहायता के दायरे में आ सकेंगी। राज्यस्तरीय सहकारी संस्थाओं को सीधी सहायता पुरानी व्यवस्था में प्रत्यक्ष ऋण और अनुदान मुख्य रूप से राष्ट्रीय तथा बहुराज्यीय सहकारी संस्थाओं तक सीमित थे। नए विधेयक के तहत पात्र सहकारी संस्थाओं और सहकारी विकास में काम करने वाली दूसरी इकाइयों को भी सहायता दी जा सकेगी। इसमें राज्यस्तरीय सहकारी संस्थाएं भी शामिल होंगी। यह बदलाव उन संस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण है, जो राज्यों में कृषि, प्रसंस्करण, विपणन, भंडारण और अन्य सहकारी गतिविधियों को बढ़ावा देती हैं। शेयर पूंजी में निवेश का दायरा भी बढ़ेगा वर्ष 1962 के कानून में एनसीडीसी की शेयर पूंजी भागीदारी मुख्य रूप से राष्ट्रीय और बहुराज्यीय सहकारी संस्थाओं तक सीमित थी। नए विधेयक में केंद्र सरकार की मंजूरी के साथ राज्यस्तरीय सहकारी संस्थाओं और अन्य पात्र इकाइयों में भी निवेश करने का प्रावधान है। इससे कमजोर पूंजी वाली सहकारी संस्थाओं को विस्तार और आधुनिकीकरण में मदद मिल सकती है। सहयोगी संस्थाओं को क्यों जरूरी है वित्तपोषण सहकारी संस्थाओं के विकास में केवल पंजीकृत समितियों की भूमिका नहीं होती। उनके लिए भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन, तकनीक, डिजिटल व्यवस्था, प्रशिक्षण और बाजार संपर्क जैसी सेवाएं देने वाली सहयोगी संस्थाएं भी जरूरी होती हैं। पुराने कानून में ऐसी विशेष इकाइयों को सीधे सहायता देने की सीमाएं थीं। नया विधेयक इस कमी को दूर कर उन्हें भी वित्तीय सहायता के योग्य बनाने की कोशिश करता है। संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी भारत का सहकारी क्षेत्र अब कृषि और ऋण तक सीमित नहीं रहा है। सहकारी संस्थाएं खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, मत्स्य पालन, भंडारण, विपणन, निर्यात, तकनीक और सेवा क्षेत्रों में भी काम कर रही हैं। ऐसे में पुराने कानून का सीमित वित्तीय दायरा नई जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा था। एनसीडीसी को मिलेगा अधिक संस्थागत लचीलापन संशोधन विधेयक का एक प्रमुख उद्देश्य एनसीडीसी को अधिक संस्थागत लचीलापन देना है। अब निगम अलग-अलग माध्यमों, पात्र संस्थाओं और सहयोगी इकाइयों के जरिए सहकारी विकास का वित्तपोषण कर सकेगा। इससे स्थानीय परिस्थितियों और परियोजनाओं की प्रकृति के अनुसार सहायता देने में आसानी होगी। प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य विधेयक का नाम: राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम संशोधन विधेयक, 2026 मूल कानून: राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम अधिनियम, 1962 संबंधित संस्था: राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम प्रमुख उद्देश्य: एनसीडीसी के वित्तीय और विकासात्मक दायरे का विस्तार नए खाद्य क्षेत्र: प्रसंस्कृत खाद्य और अन्य अधिसूचित खाद्य उत्पाद बड़ा बदलाव: औद्योगिक इकाइयों के लिए ग्रामीण क्षेत्र की शर्त हटाना सहायता का विस्तार: राज्यस्तरीय सहकारी संस्थाएं और सहयोगी इकाइयां शेयर पूंजी निवेश: केंद्र की अनुमति से राज्यस्तरीय संस्थाओं में भी संभव मुख्य परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण आयाम मुख्य परीक्षा में इस विधेयक को सहकारी संघवाद, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि मूल्य संवर्धन और संस्थागत वित्त के संदर्भ में समझा जा सकता है। उत्तर लिखते समय यह बताया जा सकता है कि व्यापक वित्तपोषण से सहकारी संस्थाओं को प्रसंस्करण, भंडारण और बाजार तक पहुंच में मदद मिल सकती है। साथ ही यह भी लिखना जरूरी होगा कि वित्तीय सहायता के विस्तार के साथ पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही मजबूत करना आवश्यक है। छात्रों के लिए याद रखने की आसान तरकीब इसे “दायरा–खाद्य–क्षेत्र–सहायता–पूंजी” क्रम से याद रखें: दायरा: विशेष क्षेत्रों से व्यापक सहकारी विकास तक खाद्य: प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद शामिल क्षेत्र: ग्रामीण सीमा समाप्त सहायता: राज्यस्तरीय और सहयोगी संस्थाओं तक विस्तार पूंजी: पात्र राज्यस्तरीय संस्थाओं में निवेश की अनुमति सहकारी क्षेत्र पर संभावित असर विधेयक के प्रावधान लागू होने पर सहकारी संस्थाओं को केवल पारंपरिक गतिविधियों के लिए नहीं, बल्कि तकनीक, आधारभूत ढांचे, खाद्य प्रसंस्करण और विशेष सेवाओं के लिए भी वित्तीय सहयोग मिल सकता है। इससे राज्यों में काम करने वाली सहकारी संस्थाओं की पूंजी और क्षमता बढ़ने के साथ नए रोजगार, बेहतर बाजार संपर्क और स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन को बढ़ावा मिलने की संभावना है। निष्कर्ष राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम संशोधन विधेयक, 2026 का केंद्रीय उद्देश्य एनसीडीसी को बदलते सहकारी क्षेत्र की जरूरतों के अनुरूप अधिक व्यापक और लचीली संस्था बनाना है। यह विधेयक वित्तपोषण का दायरा बढ़ाकर राज्यस्तरीय संस्थाओं, प्रसंस्कृत खाद्य क्षेत्र और सहयोगी इकाइयों को नई संभावनाएं देता है। हालांकि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वित्तीय सहायता का वितरण कितना पारदर्शी, संतुलित और परिणाम आधारित रहता है।